उत्तराखंड का एक ऐसा जिला जहाँ रीठा भी मीठा होता है, पत्थरों की लड़ाई भी होती है जहाँ लेकिन होता नहीं कोई घायल, क्या है राज जानने के लिए पढ़िए आगे………..

Posted by Hayat Singh
March 25, 2017

Self-Published

चम्पावत(उत्तराखंड)/Champawat(Uttrakhand)

भला कौन होगा इस दुनिया में जिसने हिमालय का नाम सुना हो, हाँ इसी हिमालय की तलहटी में स्थितउत्तराखंड(देवभूमि) का नाम कुछ भारतीयों को तक भी मालूम हो शायद कि ये भी भारतीय गणराज्य काही एक हिस्सा हैलेकिन अगर बात की जाये केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे तीर्थ स्थलों की तो शायदलगभग सबने इन दो धामों का नाम जरुर सुना होगा..

अब बात करें उत्तराखंड के ही एक पर्यटन स्थल कीनैनीताल, तो जरुर ये नाम भी कई लोगों के जेहन मेंहोगा और आप में से कई लोग नैनीताल घूमे भी होगें

लेकिन आज में बात करूँगा उत्तराखंड के ही एक सीमान्त जनपद (चम्पावत) की, समुद्र तल सेजिसकी ऊंचाई लगभग . किमी है…. और ये नेपाल देश की सीमा से सटा हुआ है…. बस बीच में अगर कुछ हैचम्पावत और नेपाल के तो वो है महाकाली नदी.. जो कि भारतनेपाल की सीमा का निर्धारण भी करतीहैये भी हो सकता है कि आप में से बहुत कम लोगों ने चम्पावत और महाकाली का नाम सुना होगा..

यूँ तो ऐसा विश्व प्रसिद्ध कुछ भी नहीं चम्पावत में कि जो कि आप सब का ध्यान आकर्षित करने में सक्षमहोमगर बावजूद इसके फिर भी बहुत कुछ है जिससे आप लोग अभी तक अनभिग्य ही होगेंचम्पावत केइतिहास की बात करें तो ये पूर्व में कत्युर और उसके बाद चंद राजाओं की राजधानी यही नगरी थीऔर आजवर्तमान में यही चम्पावत उत्तराखंड का एक जनपद है

चम्पावत जनपद प्रशाशनिक रूप से चार विकासखण्डों में बंटा है, जिनमें से एक का नाम चम्पावत ही है औरबाकि के तीन अन्य लोहाघाट, बाराकोट और पाटी

जलवायु और मौसम

जलवायु और मौसम के लिहाज से चम्पावत को आप जीवन के लिए अनुकूल ही पायेगेंयहाँ पर गर्मियों केदिनों में ज्यादे गर्मी तो नहीं पढ़ती हैमगर जो गाँव वगैरा समुद्र तल से कम ऊंचाई पर हैं वहाँ पर गर्मीलगभग ठीकठाक पड़ती ही हैऔर कुछ ऊँची जगहों पर सर्दियों के दिनों में हिमपात होना आम बात है साथही ऐसे में सर्दी का बढ़ जाना भी लाजिमी है…. बावजूद इसके यहाँ की जलवायु स्वास्थ्य की द्रष्टि सेलाभदायक ही है

त्यौहार और संस्क्रतीहोली, दीपावली, रक्षाबंधन यहाँ के मुख्य त्यौहार हैं, साथ ही कई अन्य क्षेत्रीयत्यौहार जो कि लगभग पूरी कुमाओं में मनाये ही जाते हैं, यहाँ के एक खास रीतिरिवाज का जिक्र करूँगा यहाँपर वो है प्रयेक वर्ष चैत्र के महीने में भाई, बहन के घर जाता है, जिसे यहाँ की भाषा में भिटोलादेने जाना बोलते हैं, पहले भिटोला के लिए घर से ही आटा,तेल चावल, वगैरा ले जाने की रवायत थी,मगर इन दिनों अब धीरेधीरे ये रवायत ख़तम ही हो चुकी हैअब तो मिठाई के डिब्बों को लेकर ही भिटोलामनाया जाता हैबल्कि कई लोग तो अब किसी के हाथों भिजवा तलक देते हैं और खुद समय का हवाला देकरजाते तक नहीं….

चम्पावत ही नहीं बल्कि पूरे कुमाओं में एक और क्षेत्रीय त्यौहार मनाया जाता है कथडकवा, इस बारे में कईकहावतें  प्रचलित है वो ये है कि जिस दिन ये त्यौहार मनाया जाता है ठीक उसी दिन कुमाओं के राजा नेगढ़वाल के कथडकवा नाम के राजा को हरा कर कुमाओं से निष्काषित किया था…. और इसी के चलते आजभी उस दिन किसी चौराहे पर घासलक्कड़ वगैरा एकत्र कर वहाँ पर सभी लोग अपनेअपने घरों से मशाललेकर उस जगह पर जाकर धूनी जलाते हैं और निकोल कथडकवानिकोल कथडकवा-(भाग कथडकवाभागकथडकवा) बोलते हैं..

दूसरी ओर कुछ लोग इसे जानवरों की बीमारी का नाम देते हैं और इसीलिए इस दिन घरों से मशाल लेकर उसबीमारी को भगाते हैं

(पहले की बजाय दूसरा ज्यादा तर्कसंगत लगता है व्यक्तिगत मुझे)..

ढोलदमाऊ यहाँ के मुख्य बाध्य यंत्र कह सकते हो जिन्हें शादीबरातों से लेकर मंदिरों मेंतक बजाया जाता हैमशकबीन यहाँ का एक और प्रमुख बाध्य यंत्र है जो कि विशेषकर शादी बरातों मेंबजाया जाता हैलेकिन अब धीरेधीरे ये ढोलदमाऊ और मशकबीन परिद्रश्य से गायब होते जा रहेहैंइन्हीं ढोलदमाऊ मशकबीन के साथ यहाँ का प्रसिद्ध छोलिया न्रत्य भी अबबहुत कम देखने को मिलता है







... छोलिया न्रत्य मुख्यतः एक छापामार युद्ध पर आधारित न्रत्यकला है जिसमें दो, चार और इससे भीअधिक व्यक्ति विशेष परिधान को पहन कर ढोलदमाऊ की थप के बीच अपनी युद्द कला का प्रदर्शन करते हैंइसी को छोलिया न्रत्य कहा जाता है

इन ढोलदमाऊ के अतिरिक्त एक और बाध्ययंत्र जिसे यहाँ की लोकभाषा में हुडकीकहा जाता है

 जिसे कि यहाँ मुख्यतः देवीदेवताओं के नाम पर लगने वाले जागन (जगरातों)पर बजाया जाता है और आह्वाहन किया जाता है देवीदेवताओं का

रोजगार और आर्थिक स्थति

चम्पावत जिले का मुख्य रोजगार क्रषि कहना भी उचित होगा क्योंकि भौगौलिक असमानता के चलते इसपहाड़ी जनपद में खेतीबाड़ी भी लगभग बरसात पर ही निर्भर करती हैलेकिन अगर समय पर बरसात होजाये और सूखा पढ़े तो या अत्यधिक बहा ले जाने वाली बरसात हुई तो लगभग वर्ष में छह महीनों केखाने के लिए अन्न उपज ही जाता हैहाँ जिले के मैदानी वाले हिस्से में फिर भी लगभग साल भर खाने केलिए गेहूं और धान हो जाता है..

यहाँ की मुख्य फसलों में धान, गेहूं, मडुवा,मादरा, बाजरा और मकई है, साथ ही दलहनी फसलों में उड़द,मूंग,मसूर, गहत, सोयाबीन, लोबिया और भट इत्यादि..

फलों में आम, अमरुद, सेब, नाशपाती, आडू, खुबानी, केला इत्यादि फल प्रचुर मात्र में तो नहीं मगर होते जरुरहैं…. जिले के पहाड़ी और ठन्डे भाग में सेब और नाशपाती ज्यादा होता है तो भाभर कहे जाने वाले मैदानी भागमें आम ज्यादा होता है

बाकि हिसालू, किर्मोडा और बेडू जैसे कुछ फल भी होते हैं जो कि उगाने नहींपड़ते बल्कि जंगलों में खुद ही उग आते हैं ….

शिक्षा और समाज

सरकारी सर्वे के आंकड़ों को अगर सच मानें तो साक्षरता  की दर ९०% की दर से ऊपर ही होगी मगर यतार्थ केधरातल पर ये आंकड़े मेल कम ही खाते नजर आते हैं..

हाँ वर्तमान में इंटरमीडिएट तक की कक्षाओं के लिए कई प्राइवेट विद्यालय खुल चुके हैं, लेकिन उच्च शिक्षाअभी भी कुमाओं विश्वविध्यालय पर ही निर्भर है

एक दो निजी संस्थान जो कि हालफ़िलहाल में ही खुले हैं जो कि उच्च शिक्षा की सुविधाओं के  अपवाद काकारण हो सकते हैं वो भी नाममात्र के लिए

चम्पावत के कुछ प्रसिद्ध स्थल

)पूर्णागिरी मंदिर समुद्र तल से लगभग तीन हजार (३०००) मीटर की ऊंचाई पर और महाकाली नदीके किनारे पर चम्पावत जिले के अंतर्गत आने वाला ये सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैजहाँ चैत्र मास कीनवरात्रि के पावन अवसर पर प्रतिवर्ष लाखों की तादात में श्रद्धालुगण आते हैं और अपनी मन्नतें मांगते हैं औरयूँ कहो कुछ उन मन्नतों के पूरा हो जाने के बाद माँ का आभार व्यक्त करने आते हैं



कहा जाता है कि राजा दक्ष के यग्य में सती की प्राणाहुति देने के बाद भगवन शिव सती के शव को लेकर जबभ्रमण कर रहे थे तो उसी दौरान बिष्णु भगवान सुदर्शन से सती के शव के टुकड़े किये जा रहे थे और उन्हींटुकड़ों में से सती की नाभि यहाँ पर गिरी थी जो बाद में पूर्णागिरी नाम से प्रसिद्ध त्रीर्थ स्थल बना..

)रीठासाहिब जैसे कि नाम से ही जाहिर होता है कि इसका कुछ कुछ सम्बन्ध रीठे से जरुर होगा तोआप सही समझे.. जी हाँ यहाँ पर एक गुरुद्वारा भी है.. और प्रसाद रूप में सबको रीठा ही दिया जाता है,…सबसे बड़ी अचरज की बात ये कि वो रीठा मीठा होता है अब आप पड़ गए अचरज में कि भला रीठा भी कहीं मीठा हो सकता है क्याहाँ जी हो हो सकता नहीं बल्कि हैकहावत है किएक बार गुरुनानक जी अपने शिष्यों बाला और मरदाना के साथ यहाँ से गुजर रहे थे तो उन लोगों को इसीजगह पर रुकना पड़ा क्योंकि साँझ ढल चुकी थी और रात पढने वाली थीगुरु शिष्यों ने यहीं पर डेरा डाललियारात को जब शिष्यों को भूख लगी तो उन्होंने गुरूजी को बताया कि गुरूजी उन्हें भूख लग रही है..गुरूजी ने कहा आसपास जो भी खाने को मिले खा लो.. दोनों शिष्य जब खाने को कुछ खोजने लगे तो उन्हेंपास में वही रीठे का पेड़ मिल गया और दोनों उसी पेड़ में चढ़ गए और खाने लगे




मगर एक और संयोग देखिये कि दोनों एक ही डाल पर चढ़े थे.. और माना जाता है कि तभी से वो रीठा मीठाहोता है.. ये रीठे का पेड़ अभी भी है वहाँ पर जिसके एक डाल का रीठा मीठा होता है और दूसरी डाल का रीठा दुनिया के अन्य रीठों की तरह कसैला

)माँ बाराही मंदिर (देवीधुरा)- हर वर्ष रक्षाबंधन के पावन अवसर पर इस जगह बहुत ही शानदारमेला लगता है.. ये प्रसिद्ध है अपनी बग्वाल के लिएअब आप उलझन में पड़ेगें कि ये बग्वाल क्या हैजी हाँये बग्वाल है पत्थरों का युद्धजी हाँ हर वर्ष यहाँ पर रक्षाबंधन के दिन ही वहाँ के कुछ क्षेत्रीय समुदायों के बीचपत्थरों का युद्ध होता है,.. ये परम्परा वर्षों से चली रही हैइस युद्ध में कोई बाहरी व्यक्ति भाग नहीं लेसकता है… 

साथ ही आप में से कई लोग बैष्णो देवी तो जरुर गए होगें.. जिस तरह बैष्णो देवी जाते समय कटरे नमकजगह के पास एक छोटी सी गुफा पड़ती है जिसे देखने से लगता है कि इसके भीतर से आरपर जाना आसननहीं होगा मगर भक्तगण बड़ी आसानी से आरपार हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार यहाँ पर भी एक गुफा है वैसीही जिससे कि आदमी ही नहीं वरन भैसे भी आरपार हो जाते हैसाथ ही यहाँ पर एक पत्थर भी है.. जिसे छूनेपर अक्सर कुछ चिकनाई सा आभास होता हैजैसे कि आपने अपने हाथों में कोई तेलीय पदार्थ लगा लियाहो.. इसे भी यहाँ के लोग माँ का चमत्कार ही मानते हैं

)बाणासुर का किला चम्पावत जिले के लोहाघाट विकासखंड के अंतर्गत कर्णकरायत (बिशुंग) गाँवमें स्थित ये किला कहा जाता कि चंद वंश के राजाओं की धरोहर रहा इस काल मेंबाकि इसके बारे में कहावतप्रचलित है कि…  बलि के ज्येष्ठ पुत्र का नाम बाण था, बाण ने घोर तपस्या के फलस्वरूप 
शिवजी से अनेक दुर्लभ वर प्राप्त किये थे, अत: वह गर्वोन्मत्त हो उठा था… 


वह शोणितपुर(लोहाघाट का प्राचीन कालीन नाम) पर राज्य करता था….उसकी एक सुंदर कन्या थी,जिसका नाम उषा था… प्रद्युम्न का पुत्र अनिरुद्ध, उस कन्या पर आसक्त हो गया तथा गुप्त

 रूप से उससे मिलता रहा…बाणासुर को विदित हुआ तो उसने दोनों को कारागार में डाल दिया..नारद  नेश्रीक्रष्ण से जाकर कहाआपके पौत्र अनिरुद्ध को बाणासुर विशेष कष्ट दे रहा हैश्रीकृष्ण ने बलराम तथाप्रद्युम्न के साथ बाणासुर पर आक्रमण किया… महादेव बाणासुर की रक्षा के निमित्त वहां पहुंचे किंतु सबकोपरास्त कर तथा बाणासुर की समस्त बांहें काटकर और उसे मारकर श्रीकृष्ण, उषा और अनिरुद्ध को धनधान्य सहित लेकर द्वारका पहुंचे…

)बालेश्वर मंदिर चम्पावत कई वर्षों तक कुमाओं के शासकों की राजधानी रहा, तेरहवीं शताब्दी केआसपास कत्यूरी वंश के शासकों द्वारा स्थापित बालेश्वर मंदिर का शिल्प तत्काली शिल्प कला का एकउत्क्रष्ट नमूना है जो कि अभी के जनपद मुख्यालय से लगभग एक () किमी. की दूरी पर ही है

…. 

वर्तमान में ये मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के पास है और इसके रखरखाव और देखभाल की जिम्मेदारी भीपुरातत्व विभाग के पास ही है

)घटोत्कच मंदिरमहाभारत के प्रसंग में आपने महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच का नाम जरुर सुनाहोगा, जी हाँ घटोत्कच के नाम पर ही इस मंदिर का नामकरण हुआ है..  द्रौपदी के अतिरिक्त भीम की एक और पत्नि थी जिसका नाम हिडिम्बा था, कहा जाता है कि लाक्षाग्रह से निकलने के बाद जब पांडव अपनी माता कुंती के साथ वन को चले गए तो माँ कुंती को प्यास लगने के कारन भीम उनके लिए जल लाने चले गए,रात में सभी थके हारे होने के कारण सो गए और भीम वहीँ पहरा देने लगे, जिस वन में पांडव रुके थे उसी वन में हिडिम्ब नाम का एक राक्षस रहता था, मानवों की गंध के चलते उसने अपनी बहन हिडिम्बा को पता लगाने के लिए भेजा कि पता करे कि कौन आया है वन में… लेकिन हिडिम्बा भीम के विशालकाय और बलिष्ठ शरीर को देखकर उस पर मोहित हो गयी और एक सुन्दर स्त्री का रूप धरकर भीम को आकर सारी बात बता चुकी थी, जब हिडिम्ब को पता चला इस बात का तो वह वहाँ आया और भीम ने उसे युद्ध में मार डाला, कहा जाता है कि उसके बाद माँ कुंती ने भी हिडिम्बा को स्वीकार कर लिया, बाद में उसी हिडिम्बा की कोख से घटोत्कच का जन्म हुआ,इसी घटोत्कच ने महाभारत के युद्ध में कर्ण की अमोघ शक्ति को अपने ऊपर झेल कर अर्जुन की रक्षा की…. घटोत्कच के जन्म के समय उसके सर पर केश (उत्कच) न होने के कारण ही उसका नाम घटोत्कच पड़ा था….

)पंचेश्वरमहाकाली और सरयू  नदी के संगम पर स्थित इस धार्मिक स्थल पर जनवरी के महीने मेंमकर संक्रान्ति के अवसर पर हजारों की तादाद में श्रद्धालुगण संक्रान्ति से एक दिन पहले ही जमा हो जाते हैं..और फिर मकर संक्रान्ति की सुबह को नदी में स्नान कर पूजापाठ के बाद अपने घरों को लौटते हैंवैसे यहाँपर माघ के महीने में भी श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ रहती है.. वो लोग नित्य प्रात उठाकर नदी स्नान केबाद सूर्यदेव को अर्घ्य चढाते हैंइस मंदिर में भी यहाँ की लोकप्रचलित मान्यता के अनुसार चौखाम बाबा कीही पूजा होती हैसबसे बड़ी अचरज और हैरान करने वाली जो बात है वो ये कि यहाँ पर मकर संक्रान्ति केदिन मंदिर में पूजा वगैरा तब शुरू होती है जब तक कि कहीं से कोई शव जायेक्योंकि नदी के ठीकमुहाने पर स्थित होने के कारण यहाँ शमशान घाट भी हैपहले उस शव का शवदाह किया जाता है उसके बादमंदिर में पूजा वगैरा की जाती है.. कहा जाता है कि आज तक ऐसा कभी भी हुआ कि वहाँ पर कोई शव आया होहाँ एक और बात कि कई बार संक्रान्ति की दोपहर तक अगर कोई शव आये तो कोई कोई वहीँपर नदी स्नान करता व्यक्ति डूब जाता हैऔर कई बार संक्रान्ति से एक दिन पहले की शाम को ग़र कोइनशव वहाँ जाये तो उसे अगले दिन ही शवदाह किया जाता हैआप कह सकते हो कि इन सब तमामअंधविश्वासों के बावजूद वहाँ पर श्रदालुओं की अच्छी खासी भीड़ जुट जाती है



(चित्र- पंचेश्वर, सरयू और महाकाली का संगम)

…अगर पर्यटन के हिसाब से देखें तो वहाँ पर आप रिवर राफ्टिंग और फिशिंगका लुत्फ़ उठा सकते हैंये जगह यूँ तो नेपाल बॉर्डर पर है और बीच में सीमा का निर्धारण करने केलिए सिर्फ महाकाली नदी ही है लेकिन बहुत ही शांत बॉर्डर है और वहीँ पास ही सीमा सुरक्षा बल वालों का कैम्पभी हैसाथ ही आप नदी के किनारे तक अपनी गाड़ी लेकर जा सकते हैं

)चमदेवल का चौखाम बाबा का मंदिर यहाँ पर पर्त्येक वर्ष चैत्र महीने की दशमी को एक बहुत ही सुन्दर मेला लगता है, भिन्न-भिन्न स्थानों से श्रदालुगण आते हैं शीश नवाने को…

)नागार्जुन बाबा का मंदिर (नगरुघाट)-  ये मंदिर भी महाकाली नदी के तट पर ही स्थित हैयहाँ पर वैकुण्ठ चतुर्दशी के अवसर पर हजारों की तादाद में श्रदालुगण जमा होते हैं.. वैकुण्ठ चतुर्दशी के दिनही आसपास के लगभग दसबारह गांवों से लोग पूरे जोश और श्रधाभाव के साथ ढोल नगाड़ों के साथजयकारे लगते हुए मंदिर तक जाते हैंफिर मंदिर परिसर की पांचसात परिक्रमाओं के बाद वहीँ मंदिरपरिसर में भजनकीर्तन वगैरा का आयोजन किया जाता है..

और फिर सुबह भोर के प्रथमपहर कहो या रात्रि के अंतिम पहर कहो चार बजे के आसपास नदी स्नान करनेजाते हैं अपने उस डांगर ( यहाँ के अनुसार जिस मनुष्य के भीतर नागार्जुन बाबा आह्वान करने पर आते हैं उसेयहाँ की क्षेत्रीय भाषा में डांगर कहा जाता है ..) को सबसे पहले नदी स्नान करने के बाद फिर सारे श्रद्धालु स्नानकरते हैं और उसके बाद पूजापाठ करके अपने घरों को वापस लौट पड़ते हैं…. यहाँ पर भी एक रोचक बात ये हैकहा जाता है कि जो व्यक्ति डांगर होता है वो सुबह नहाते समय अगर उसे अकेला नहाने को छोड़ दिया जायेतो वो नदी के भीतर चला जाता है.. इसी बात की आजमाइश के लिए आज से लगभग कुछ वर्षों पहले एकडांगर को लोगों ने जानबूझ कर छोड़ दिया ये देखने को कि क्या ये वाकई नदी क्ले भीतर जाता है.. और वोडांगर सच में चला गया .. मतलब नदी में डूब गया.. बहुत ढूँढने के बाद भी शाम तक किसी को मिला और ही किसी को उसका शव कहीं तैरता मिलातो सबने सोचा कि डूब कर मर गया और शव कहीं नदी के भीतरही कहीं फंस गया होगा और उसके घरवालों ने घर आकर उसका क्रियाकर्म शुरू कर दिया (जैसे कि आप सबकोविदित हो या हो उत्तराखंड में किसी की म्रत्यु हो जाने पर तेरह दिन तक उसका बेटा,भाई वगैरा रोजपिंडदान करते हैं) .. उनके क्रियाकर्म का सातवाँ दिन चल रहा था कि वो डांगर घर वापस गया.. लोगों मेंहैरत हुयी और जानने की उत्सुकता जगी मगर वो बताने को पहले तो राजी हुएक्योंकि उनके कहेमुताबिक अगर वो बता देते तो उनकी म्रत्यू होनी तय थी.. फिर बाद में जाने उन्होंने क्या सोचा और बतादिया कि वो इतने दिनों तक वहीँ नदी जके भीतर एक भव्य मंदिर में रहेउनका खूब आदरसत्कार हुआ औरउन्हें सिर्फ इस शर्त पर वापस भेजा गया कि वो जाकर ये सब किसी को नहीं बतायेगे.. जैसे ही उन्होंने ये सबवहाँ उपस्थित अपने परिजनों, बिरादरों और रिश्तेदारों को बताया उनकी आकस्मिक म्रत्यु हो गयीतब सेइस मंदिर की मान्यता क्षेत्रीय लोगों में और बढ़ गयीइन तमाम कहानियों से आगे भी इस जगह की अपनीखूबी ये है कि आप यहाँ पर भी रिवर राफ्टिंग और फिशिंग का लुत्फ़ उठा सकते हैं

१०)अद्वैत आश्रम मायावती (मठ)-  स्वामी विवेकानंद की ध्यानास्थ्ली रही ये जगह, बांज के घनेजंगलों के बीच स्थित है..यहाँ पर चैरिटेबल हॉस्पिटल, पुस्तकालय, गौशाला भी है

११)गुरू गोरखनाथनैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण ये जगह बहुत ही मन लुभावन है.. किवदंतियों केअनुसार कहा जाता है कि इस जगह पर सतयुग से ही आदिगुरू गोरखनाथ की अखंड धूनी प्रज्वलित होती रही है

१२)श्यामला तालस्वामी विवेकानंद की ध्यानास्थ्ली के चलते प्रसिद्ध ये जगह यहाँ पर एक आश्रम भीहै.. साथ ही आप इसके स्वच्छ और नीले जल पर नौका विहार का आनंद भी ले सकते हैं..

१३)झूमाधूरी लोहाघाट के पास ही रायकोट गाँव की चोटी पर स्थित यह मंदिर पहाड़ की चोटी पर बना है,यहाँ से आप दूरबीन की मदद से चम्पावत ही नहीं अपितु बागेश्वर और पिथौरागढ़ जनपद के विहंगम द्रश्यको भी देख सकते हो और साथ ही हिमालय की बर्फ से आच्छादित चोटियों का भी दीदार कर सकते हो..

१४)एबटमाउन्टसमुद्र तल से लगभग सात हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित बहुत ही खूबसूरत जगह है,यहाँ पर अंग्रेजों के ज़माने के बंगले हैं, साथ ही एक चर्च भी है..

१५) नागनाथ मंदिरइस मंदिर में की गयी वास्तुकला भी बहुत ही सुन्दर है, यह भी कुमाओं के पुरानेमंदिरों में से एक है….

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(चित्र गूगल से साभार)

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