उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017

Posted by Shashwat Mishra
March 10, 2017

Self-Published

चुनाव को लोकतंत्र का त्यौहार माना जाता है। गजब की बात यह है कि इस त्यौहार मे होली के रंग, दिवाली की आतिशबाजी, ईद की मिठास से लेकर क्रिसमस के उमंग तक, हर धर्म का यह संगम देखने योग्य होता हैं । इस बात को हम ऐसे भी समझ सकते है कि चुनाव एक इंद्रधनुष की तरह होता है जिसमे आकर्षित करने वाले सात रंग विभिन्न जाति के समान होते हैं, इनमें से अगर एक रंग भी अलग हो जाए तो इंद्रधनुष का वजूद अधुरा होता है। उत्तर प्रदेश चुनाव मे राजनीतिक पार्टियां जिस प्रकार सियासी लाभ के लिए इन अनमोल रंगों को अलग करने की कोशिश करती नजर आईं, यह समाज के हित मे बिल्कुल नहीं है ।

सत्रहवीं उत्तर प्रदेश विधानसभा के गठन के लिए 403 सीटों पर 9 मार्च को 4853 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम मे कैद हो चुकी है । लगभग ढेड़ माह तक चले इस उत्सव मे राजनीतिक पार्टियों ने ऐड़ी से चोटी तक का ज़ोर झोंक दिया था । मतदाताओं को अपने पाले मे खिंचने के लिए पार्टियों द्वारा हर मुमकिन अजमाईश की गई । जब सीधी उंगली से घी निकलती नज़र नहीं आई तो पार्टियों ने उंगली टेंडी भी कर दी । सूत्रों की माने तो यूपी चुनाव मे पार्टियों ने अमीरों, दागियों और बाहुबली नेताओं पर जमकर दाव लगाया था । एनबीटी की एक रिपोर्ट के अनुसार यूपी मे 2017 के विधानसभा चुनाव में 15% हत्या, रेप, अपहरण, दंगा भड़काने जैसे गंभीर अपराधों मे लिप्त प्रत्याशियों के अलावा 20% करोड़पति भी चुनावी रणभूमि मे अपनी किस्मत आजमा रहें थे । पार्टियों को इस बात का अंदाजा पहले ही हो गया था कि यूपी का दाव बड़ा है लिहाजा टक्कर कांटे की मिलेगी ।

राजनीतिक पार्टियों ने यूपी चुनाव मे प्रचार के दौरान जमकर पसीना बहाया है । यहां तक की अंतिम चरण मे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को काशी की सड़कों पर उतरना पड़ गया । प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार खुली जीप मे नरेंद्र मोदी काशी के सड़कों पर निकले हैं । बेशक ईतनी मेहनत मशक्कत तो मोदी ने लोकसभा चुनाव मे नहीं की थी । कभी जिस सपा और कांग्रेस के बिच छत्तीस के आंकड़े चलते थे, वो प्रचार के दौरान एक मंच पर साथ खड़े होकर अपनी दोस्ती की मिसाल देते नज़र आए । मजे की बात तो यह है कि विख्यात सियासी चेहरों के बीच इस बात को लेकर भी बहुत बवाल हुआ कि यूपी का बेटा /बेटी कौन है।

जिसने भी कहा है सही ही कहा है कि यूपी का चुनाव हो और ध्रुवीकरण ना हो यह हो ही नहीं सकता । पार्टियों को जब विकास, सुरक्षा, बिजली जैसे मुद्दों से बात कुछ खास बनती बनती नज़र नहीं आई तो फिर चल पड़े उसी पुराने जातिवाद के पगडंडी पर और शुरु कर दिया हिन्दू – मुस्लिम का राग अलापना ।टिकटों के बंटवारे से लेकर चुनावी सभाओं मे इस्तेमाल किए गए एक एक शब्द तक, हर पहलू से ध्रुवीकरण की जटिल गंध आ रही थी । श्मशान से लेकर कब्रिस्तान तक, आरक्षण से लेकर हिन्दू-मुस्लिम के बीच बिजली के बंटवारे तक, हर आरोप – प्रत्यारोप से लेकर बीजेपी और बीएसपी के गठबंधन के अफवाह तक, सब कुछ जातिवाद ध्रुवीकरण का ही हिस्सा प्रतीत हो रहा था। जनाब, पांव देख लो मंदिरों -मस्जिदों की चौखटें नाप नाप कर छाले पड़ चुके हैं । फिर भी सियासी मंच से ना जाने किस मुंह चिल्लाते थे ” इस चुनाव मे मुद्दा यूपी के विकास, युवाओं के रोजगार और गरिबों के भलाई का है ” । यह तो वही कहावत हुई ना कि ” नौ सौ चुहे खा कर बिल्ली हज को चली “।

यूपी चुनाव के नतीजे 11 मार्च को घोषित होंगे ।लिहाजा राजनीतिक खेमों मे अब एक दम संनाटा पसरा हुआ है। पार्टियों के छोटे चेहरों से लेकर बड़े चेहरों तक बेचनी की सिकन छाई है। मतदान तक तो पार्टियां बड़े जोर सोर से सियासी जनसभाओं मे 300+ के दावे ठोक रहीं थी । पर अब जब हकीकत सामने आने को है तो वो शोर दूर दूर तक कहीं सुनाई नहीं दे रहा है।

यूपी मे शुरुआत से ही अंतिम चरण तक मतदाताओं पर ध्रुवीकरण हावी रहा । साफतौर पर लड़ाई त्रिकोणीय ही नज़र आ रही है । एग्जिट पोल पर नज़र डाले तो यूपी की बाजी बीजेपी के हाथों मे जाती नज़र आ रही है । दूसरे स्थान के लिए गठबंधन और बीएसपी मे कांटे की टक्कर है । यूपी मे विश्लेषकों द्वारा बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी के रुप मे देखने की जायज़ वजह भी हैं। सबसे अह्म वजह यह मानी जा रही है कि राजनीतिक दलों द्वारा यूपी मे जो ध्रुवीकरण का जाल रचा गया था उसका सीधे तौर पर फायदा बीजेपी को हुआ है । बीजेपी के नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे बड़े चेहरे चुनाव के बहुत पहेले से ही दलित समुदाय को रिझाने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर चुके थे । दलित समुदाय को बीएसपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है, परंतु दलित वोट बैंक मे बीजेपी के सेंध मारने से बसपा को खासा नुकसान हुआ है । माना जा रहा था कि अगर मुस्लिम मतदाता एक जुट हो गए तो बीजेपी की राहें मुश्किल हो जाएगी। मगर सपा और बसपा के बीच मुस्लिम वोट बैंक के लिए हुए खिंचातानी के कारण मतदाता दो भाग मे बंट गए । मुस्लिम समुदाय वैसे तो सपा का ही वोट बैंक माना जाता है पर उसमें बसपा के सेंध मारने से सपा की मुश्किलें काफी बढ़ गईं है । जहां तक ब्राह्मण वोट बैंक की बात है तो वो जरूर कभी कांग्रेस के पारंपरिक मतदाता हुआ करते थे, पर कुछ सालों से उनकी नाराजगी कांग्रेस के लिए खुल कर सामने आ गई है । ऐसे मे माना जा रहा है ब्राह्मण वोट बैंक भी बीजेपी का दामन थाम लेंगे । दूसरी तरफ ओबीसी वोट बैंक बीजेपी से जरूर नाराज नज़र आ रहीं है पर ऐसा नहीं माना जा रहा कि इतनी ज्यादे शिकायतें होंगी कि एक दम से मुंह फेर लेंगे । बेशक बीजेपी को मोदी के चेहरे को फ्रंट मे रखने का लाभ मिलेगी । हलांकि लोकसभा वाली लहर इस चुनाव मे नज़र नहीं आई मगर मोदी मैजिक ने मतदाताओं को काफी हद तक प्रभावित किया है ।

दूसरी तरफ एग्जिट पोल के आंकड़ों के बीच सपा मुखिया अखिलेश यादव ने संकेत दिया कि अगर परिणामों के बाद जरूरत पड़ी तो वे बसपा से हाथ मिला सकते हैं । गठबंधन के सवाल पर उन्होंने पहली बार माना कि सपा और कांग्रेस को साथ लाने मे राहुल और प्रियंका दोनो की भूमिका अह्म थी । सब मिला जुला कर बात यह है कि राजनीति मे ना कोई किसी दोस्त होता है ना कोई किसी का दुश्मन । राजनीतिक लाभ के लिए विरोधी से भी यहां हाथ मिला लेते है और अपनो से हाथ छुड़ा लेते हैं । ये ही है राजनीति की हकीकत ।

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