एक बूँद किताब पे आ गिरी

Posted by Shahid Mansoori
March 31, 2017

Self-Published

तुम कब सुधा सी हो गयी और मैं चन्दर में तब्दील होने लगा l पन्ना दर पन्ना पलटते गया। कहने को तो उपन्यास पढ़ रहा था, लेकिन हर पन्ने के अक्षर जब गड्ड – मड्ड होने लगे तो लगा क्या हो रहा है ये ? पता नहीं सुधा ने वो घास की पत्तियाँ उखाड़ी थीं या तुमने कॉलेज के पार्क के करीने से सजी घास के पौदे से घास का एक तिनका उखाड़ लिया था l उसी करीने वाली घास पे तुमने कब अपना सिर टिका दिया और बादलों की तरफ जाने क्या सोचती रही l फिर अचानक उठ खड़ी हुयी l जाने कौन से हक़ से हाथ पकड़ा और सीधे लाइब्रेरी ले गई l पता नहीं तुम्हें क्या सूझा था बच्चों सा खेल जो आँखों से आँखें मिला के बोली देखते हैं किसकी पलकें पहले झपकती है l याद नहीं शायद मेरी ही पलकें पहले झपकी थीं l न जाने कौन सी चमक तुम्हारी आँखों में आ गई और मैं पहेली सी बुझाता रहा l

याद है मैंने जिओटेक और मैटेरियल की किताब इश्यू कराई और तुमने अमृता प्रीतम की दो किताबें लाइब्रेरियन से ले ली थी l हम पैदल चलते रहे, चलते रहे, कब कॉलेज की पगडण्डी ख़त्म हुई और हम रोड पे आ चुके थे l पैरों में धूल ही धूल और बगल के खेत से सरकंडे की डंडी तोड़ के रोड पे इधर – उधर तुम मारती रही l पता नहीं क्या – क्या रास्ते भर सुनाती रही, शायद कोई कहानी थी, लेकिन लगा ये कहानी यूँ ही चलती रहे l हम चलते रहें, कहानी चलती रहे l पता नहीं ज़िन्दगी चल रही थी या कहानी चल रही थी l पता नहीं कई बसें आईं कन्डक्टर ने आवाज़ दी मगर हम जैसे चल रहे थे वैसे ही चलते रहे l

आज याद पड़ता है कन्डक्टर ने कुछ कहा भी था l देखो दो पागल जा रहे हैं l हाँ यार हम वाक़ई पागल थे l आज जब उसी उपन्यास के पन्ने पलट रहा था l फिर जब अक्षर आँखों के क़रीब आने लगे, अब सब धुंधला सा हो रहा था, हाथों से आँखें मलने ही वाला था कि टप से एक बूँद किताब पे आ गिरी l क्या समझा ? क्या जाना ? पता नहीं लेकिन नसों को एहसास हो गया था, वो धूल भरे पैरों की थकन नहीं थी, प्यार की ताक़त थी जो चला रही थी, जो हमें रोड पे आगे बढ़ा रही थी l

शाहिद अजनबी

25.03.2017  01:20 am

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