मज़हब और सरकार के आहत होने का इतिहास पुराना है

Posted by Abhishek Naman in Hindi, Society
March 6, 2017

आहत होने हवाने का सिलसिला कोई नया नहीं है, ये कोई 10-20 साल पुरानी बात भी नहीं है बल्कि सदियों का इतिहास रहा है। अगर यूं कहें, कि मानव सभ्यता के शुरुआती दौर से ही हमेशा समाज में एक तबका ऐसा रहा जो आहत हो जाता था। मगर आहत करने वाले भी कहां मानने वाले थे, वो आहत करते रहे। आहत होना खालिस धर्मनिरपेक्ष बात है और मज़ेदार तो ये है कि इसमें विश्वबंधुत्व की भावना भी मौजूद है।हर मज़हब में आपको आहत होने वाले मिल जायेंगे और दुनिया के हर कोने में भी। हां कहीं थोड़ा बहुत फर्क हो सकता है, कि कोई ज़्यादा आहत हो जाए तो कहीं कोई कम हो!

अब उदाहरण के तौर पे गैलीलियो या कॉपरनिकस को ही लें, उनकी बात से चर्च आहत हो गया था। अब धरती सूर्य का चक्कर लगाती है ये कहने की क्या ज़रुरत थी? इससे चर्च पे खतरा पैदा हो गया था और ऐसा नहीं था कि चर्च के पाले में कम लोग थे, अच्छी खासी संख्या थी उनके समर्थकों की। हालांकि बाद में ये साबित हो गया कि धरती सूरज का चक्कर लगाती है तो चर्च ने इस बात से आहत होना बंद कर दिया है, वे अब नई बातों पे आहत होते हैं। धरती का चक्कर लगाना छोड़िये कुछ लोग उसके गोल होने से भी आहत हो जाते हैं। तालिबान को ये एंटी इस्लामिक लगता है कि स्कूलों में पढ़ाया जाए कि धरती गोल है और इस बात के लिए वे मारने काटने को तैयार हैं।

हमारे देश में भी आहत होने के इतिहास की किताब काफी मोटी है। कुछ धर्माधिकारी इस बात से आहत हो गए थे कि तुलसीदास रामायण का अनुवाद कर रहे थे। अब आधी जनता तुलसीदास कृत रामचरितमानस को रामायण कहती है जिसमें धर्म के ठेकेदार भी हैं। आज लोग इससे आहत नहीं होते बल्कि रामायण का पाठ “बैठवाते” हैं और उसमें रामचरितमानस की चौपाई गाते हैं। हालांकि मुझे बचपन में पढ़ाया गया था कि हम बहुत सहिष्णु देश रहे हैं और ये बात कुछ हद तक सही भी है तभी तो हमारे यहाँ इतनी विविधता आज भी है। लेकिन गुरुदेव रविन्द्रनाथ का कहना था कि खुद को धोखा देकर आत्ममुग्ध होना किसी काम का नहीं। तो माने ये है कि जिस दौर में हम खुद को बहुत सहिष्णु बता रहे हैं, उसी दौर में हम कभी लोगों की परछाई पड़ने से तो कभी किसी जाति के पढ़ने-लिखने से आहत हो जाते थे। जब अम्बेडकर ने इन बातों को उठाया तो लोग उनकी बात से आहत हो गए।

वैसे अगर सरकारों की बात करें तो सभी दौर में सरकारें सबसे ज़्यादा संकटग्रस्त हैं इस मामले में, वे सबसे जल्दी आहत हो सकती हैं। अब इंदिरा गांधी को ही याद कर लीजिये, वो जयप्रकाश नारायण से इतना इतना ज़्यादा आहत हो गई थी कि उन्हें देश विरोधी बता दिया और गिरफ्तार भी करवा दिया। आज भी सरकार बहुत जल्दी आहत हो जाती है, जैसे विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों के आन्दोलन से।

एक बात जो महत्वपूर्ण है वो ये है कि किसी को भी आपसे असहमत होने का अधिकार है और ये भी मुमकिन है कि सामने वाले व्यक्ति की भावना आहत भी हो जाए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया। अब आप भगत सिंह और गांधी को ले लीजिये। भगत सिंह को महात्मा गांधी की बातों से असहमति थी, और वे गांधी द्वारा असहयोग आन्दोलन वापस लिए जाने से आहत भी हुए लेकिन उनकी प्रतिक्रिया क्या थी? क्या उनकी प्रतिक्रिया नाथूराम गोडसे जैसी थी?

अब आते हैं वर्तमान दौर में; अभी कुछ दिन पहले एक लड़की को केवल इस बात के लिए बलात्कार की धमकी दी गयी कि वो धुर राष्ट्रवादी माहौल में कुछ गांधीवादी बातें कर रही थी। अब ये तो गांधीवादी सोच ही है न कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं! इसी लॉजिक के मुताबिक़ पाकिस्तान से नहीं युद्ध से नफरत करो। आप इस विचार से असहमत हो सकते हैं लेकिन आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या अगर आज गांधी होते और ये बात कहते तो आप उन्हें ट्रोल करते या धमकियां देते या गद्दार घोषित कर देते?

एक ख़ास बात जो मैंने इन लोगों में देखी है कि आहत होने के साथ ही किसी न किसी पर खतरा भी पैदा हो जाता है। मसलन कभी आप सुनेंगे इस्लाम खतरे में है तो कभी हिन्दू खतरे में हो जाते हैं और जब सरकार आहत हो जाती है तो देश खतरे में हो जाता है। यकीन न हो तो आप सरकार का विरोध करिए और वो कब देश के लिए खतरा बन जाए आपको पता नहीं चलेगा। वैसे ये अक्सर तब होता है जब सरकारें राष्ट्रवाद के तम्बू में अपनी नाकामी छिपाने की कोशिश करती हैं। इसी तरह कभी चर्च खतरे में होता है तो कभी जाति, जो कभी खतरे में नहीं रहती और आहत नहीं होती वह है मानवता। मसलन आप ये तो सुनेंगे अमरीका ने ईराक पे हमला इसलिए किया क्योंकि दुनिया पे खतरा मंडरा रहा था लेकिन वहां मारे गए निर्दोष लोगों से मानवता आहत नहीं हुई। मसलन छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की मौजूदगी देश के लिए खतरा तो है उससे सरकार परेशान हो जायेगी लेकिन एक साथ 16 निर्दोष लड़कियों के बलात्कार से न तो देश को खतरा पैदा होता है न तो मानवता को। कश्मीर के लिए यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन से देश खतरे में हो सकता है लेकिन वहां लोग अंधे हो जाएं उससे किसी को कोई ख़तरा नहीं पैदा होता।

दरअसल मसला ये है कि किसी भी समाज में हर समय एक ऐसी ताकत मौजूद रहती है जो यथास्थिति बनाए रखना चाहती है। वहीं दूसरा पक्ष उस यथास्थिति को बदलने वाला होता है और इन दोनों के बीच टकराव निश्चित है। जो यथास्थिति को बनाए रखना चाहते हैं, उनके अपने हित हैं उस व्यवस्था को बनाए रखने में। जैसे चर्च का हित इस बात में था कि लोग ज़्यादा विज्ञान न पढ़ें नहीं तो चर्च की सत्ता कमज़ोर हो सकती थी उसी तरह क्षेत्रीय भाषा में रामचरितमानस लिखे जाने से संस्कृत वालों के एकाधिकार को चुनौती मिलनी थी।

वर्तमान आधुनिक समाज में जो बात मानी जानी चाहिए वह है मनुष्य का तर्क और विवेक। इसी तर्क और विवेक के बल पर मनुष्य ने आज इतनी वैज्ञानिक प्रगति की है। अगर आइंस्टीन ने न्यूटन के सिद्धांतों को चुनौती न दी होती और लोग इस बात से आहत होने लगते तो किसी प्रकार की वैज्ञानिक प्रगति तो संभव न होती। आज के दौर में भी जो प्रगतिशील तबका है उसे तर्क और विवेक के सहारे मानवीय समस्याओं के हल खोजने के लिए, हर मुमकिन बेहतरी के लिए स्थापित मानदंडों को चुनौती देते रहना चाहिए, बशर्ते कि वे मानवता के लिए हों। जहां तक आहत होने वालों की बात है तो वो कभी मज़हब के बहाने तो कभी इन्सान के रंग के बहाने तो कभी किसी और बहाने दुखी होते रहेंगे। अगर आपके दिल में भी आहत होने की आरजू़ जागने लगे तो मानवता के लिए, इंसानियत के लिए ही होईयेगा।

फोटो आभार: गेटी इमेज़ेस 

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