क्या आप बेईमान के समर्थक हैं।

Posted by Mohammad Anas
March 18, 2017

Self-Published

किसी ज़माने में राम मंदिर के नाम पर करोड़ों का चंदा इकट्ठा किया गया था। आजतक उस चंदे का पता नहीं चला। आज भी ठीक उसी तरह से धर्म / शिक्षा तथा अन्य सामाजिक कार्यों के लिए लोग देश और विदेश से करोड़ों का चंदा जोड़ते हैं। एहसास भड़काते हैं। भोले भाले मासूम लोगों के मज़हबी जज़्बात को भड़का कर उन्हें तथाकथित अच्छे दिनों का ख्वाब दिखाते हैं। ऐसे लोगों तथा उनके परिवार के सदस्यों की जांच हो तो ईमानदारी और भावुकता के पीछे बहुत सारी बेईमानी मिलेगी। अफसोस इस बात का है कि लोग आज कल ऐसे लोगों के दिवाने भी हो जाते हैं। यह हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह के समाज पर बराबर से लागू होती है।

बहुत हद तक इस तरह की बेईमानी के ज़िम्मेदार हमारे जैसे लोग होते हैं। असल में हम सब बेईमान ही हैं। बेईमानी करने का मौका मिले तो शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जो बेईमानी नहीं करना चाहेगा। हम समाज की फिक्र तो करते हैं लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर खुद की फिक्र सबसे ज्यादा होती है। बड़े नेता या बाहुबली का साथ या फिर किसी खिलाड़ी और ये सब न सही तो किसी पैसे वाले की गलबहियां करने और उससे फायदा उठाने में देरी नहीं करते। जबकि पता होता है कि जिसके साथ हम टहल घूम रहे हैं उसकी फितरत चंद पैसों की ग़ुलाम है, उसके लिए रिश्ते या एहसास कोई मायने नहीं रखते। यह वाइस वर्सा रिलेशनशिप होते हैं। कुछ फायदा हम जैसों का होता है तो बहुत बड़ा फायदा सामने वाले को। हम उसे कार्यकर्ता या फिर भक्त के तौर पर मिल जाते हैं। उसके गलत को सही बनाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। लेकिन इसमें घाटा किसे हो रहा होता है? हमारे जैसों का? उस बड़ी शख्सियत का? न। नुकसान समाज का होता है। आम लोगों का होता है। उन जज़्बातों का होता है जिसकी मासूमियत और सच्चाई से दुनिया चल रही होती है।
आलोचनाओं का दौर भी शुरू होता है, क्यों शुरू होता है? क्योंकि नेता जी दोगलई कर जाते हैं, तो सवाल लाजिमी है कि नेता जी के साथ लगे ही क्यों ? चंदा में पॉर्टनर्शिप तय थी। तय था कि कार्यकर्ता को भी मिलेगा। फिर नहीं मिला तो दल बदल होगा ही। राजनैतिक पार्टियों की आपसी खींचतान में फंसने वाले लोगों के प्रति जनमानस हमेशा से एक पक्ष का विरोध और दूसरे का समर्थक बन कर उभरती रही है। यह सिर्फ इसलिए संभव है कि हमें खांचों में फिट करने की आदत हो गई है। कांग्रेस से तमाम बड़े नेता बीजेपी की तरफ जा रहे हैं, छोटे दलों में चुनाव के वक्त कुछ नेता किसी दल में तो कभी किसी दल में शामिल हो जाते हैं। हम उस नेता के प्रति इतने ज्यादा आस्थावान होते हैं कि ऐसे समय पर उसकी विचारधारा, उसके इरादे और उसके कार्यों पर कोई टिप्पणी नहीं कर पाते, कई बार तो यह भी देखा गया है कि दल बदलने पर हम नेता से सवाल के बजाय उसके समर्थन में बिछ जाते हैं।
मुसलमान हमेशा से क्यों धोखा खाता है? या फिर हिंदुओं की बड़ी आबादी हमेशा क्यों छली जाती है? नेतृत्व करने वालों कि वजह से। हमारे जैसों की वजह से जो सुविधा सम्पन्न होने के बावजूद अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाहन नहीं करते। व्यक्तिवाद के फेर में हमसे ऐसी गलतियां हो जाती है जिसकी भरपाई होनी बहुत मुश्किल होती है पर नामुमकिन नहीं। जब जिसका ज़मीर जाग जाए, वजह कुछ भी रही हो। उस मोटे चंदे में हिस्सा न मिलना, ठेकेदारी में कम कमीशन का आना, पहचान का संघर्ष, व्यक्तिगत रिश्तों का बिगड़ना आदि। फ्रेंच लेखक शायाद्री पेत्रोवा ने लिखा है,’आप तब तक गलत हैं जब तक गलत कर रहे हैं या उस गलत में हिस्सेदार हैं, यदि आप उस गलत का विरोध करते हुए खुद को नुकसान भी पहुंचा लेते हैं तो वह सारी गलतियां समाज भुला देता है।’
देश जिस तरफ बढ़ रहा है उसे उस तरफ जाने से कोई रोक नहीं सकता। न कोई समाजसेवी न कोई लेखक न ही कोई पत्रकार। मज़हबी लीडर या फिर सियासी धुरंधर तक अब मुआशरे को ज़हर से नहीं बचा सकते। क्योंकि इन सबकी अपनी अपनी ख्वाहिशें हैं, दुनिया भला किसे प्यारी नहीं। दुनिया के लिए लोग क्या कुछ नहीं बेच देते। दीन ओ ईमान बेचने और गिरवी रखने की रवायत बड़ी पुरानी रही है। एहसास और जज़्बात निलाम करने की कहानियों से किताबें भरी पड़ी हैं। हम अपने आसपास देखते रहें। हममें से कई लोग बेचने और निलाम करने की राह पर बहुत आगे जा चुके हैं। अब यह आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि ऐसे लोगों की पहचान खुद से करें, सवाल करें, लोगों को बताते रहें। दौर बहुत बुरा है। इस दौर में आपके नेता या सामाजिक रूप से बड़ा बना दिए गए व्यक्ति का नुकसान नहीं होगा। वह हर दौर में फायदे में रहेगा। वह आपको बेच कर खुद का जेब भरेगा। आप भरने मत दीजिएगा। अगर ऐसा ही चलता रहा तो परेशानी हमारे जैसों की नहीं, आपकी होगी। आप किस ट्रैप में फंसा दिए गए हैं, वह आपको भी नहीं पता। जिन्होंने फंसाया है उसमें हर उस बड़े का नाम शामिल है जिसने आपकी लड़ाई लड़ने का दम भरा। मेरा भी। मेरे जैसे बहुतों का।
अब आप को निकलना है। निकल सकते हैं तो निकल जाइए। जज़्बात इतने सस्ते मत कीजिए की कोई भी आकर बेच जाए। मौका मत दीजिए। किनारे लगाइए। बताइए की हम हमारी छोटी मोटी लड़ाईयां लड़ लेंगे। आप लड़ाई के नाम पर, साथ देने के नाम पर हमसे हमारी मासूमियत और मोहब्बत का सौदा मत कीजिए। बताते रहिए। इस दौर से निकलना है तो मेरी भी बातों को मत मानिए। खुद से तय कीजिए की कौन किस तरह से किसका व्यापार कर रहा है। मज़हब का धंधा सबसे चोखा है। मुझे मौका भी मिला पर मैंने नहीं किया। यही एक चीज़ कमाई है। बाक़ि तो गंवाया ही है। कुछ लोगों के लिए मज़हब ही सबसे पहला और आखरी धंधा है। अफसोस, इस धंधे की पहचान सरेआम है पर जनमानस चुप बैठा रहता है।
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परिचय –
मोहम्मद अनस राजीव गाँधी फाउंडेशन में बतौर रिसर्च असोसिएट तथा ज़ी मीडिया में एक्ज्युकेटिव रह चुके हैं। वर्तमान में वे पब्लिक पॉलिसी मेकिंग पर एक गैर राजनीतिक संस्था के साथ काम कर रहे हैं। माखनलाल पत्रकारिता विवि से पत्रकारिता में मॉस्टर्स डिग्री हासिल अनस सोशल मीडिया पर अपनी बेबाक लेखनी के लिए पहचाने जाते हैं।

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