क्या गुल्मोहर कौर हार गयी ?

Posted by Abhilash Rekha Raju
March 9, 2017

Self-Published

२१ साल की लड़की है वो जिसने पिछले दिनो पुरे देश को झकजोर के रख दिया था | उसके एक फोटो ने सारे देशभक्तो की भावनाये आहात की थी|
फेसबुक से लेकर सड़को तक , चाय नुक्कड़ से लेकर टेलीविज़न की बहसो तक सिर्फ उसी लड़की का नाम था | वीरेंदर सहवाग भी क्रिकेट की पिच
छोड़कर ट्विटर पर छक्के मारने लग गए थे , रणदीप हूडा भी कहा पीछे रहने वाले थे | अगर उस वक़्त पाकिस्तान की टीम भारत दौरे पर होती तो खुद ही
हारकर जान बचाकर पाकिस्तान भाग जाती | इस पुरे दौर में लोगॉ ने गुरमोहर पर जिस ख्याति के व्यंग किये है उसे देखकर तो कपिल शर्मा भी शर्मा जाये |
इन सब लोगो में कुछ ने बहादुरी दिखाते हुए गुरमोहर को बलात्कार और जान से मारने की धमकिया भी दे दी | एंटी- नेशनल का पुरस्कार तो उसे पहली
फुरसत में दे दिया गया था | और अंत में फोगाट बहनो के हरियाणवी देशभक्ति के अखाड़े में गुरमोहर कौर ने आख़िरकार हथियार दाल दिए |
गुरमोहर देशभक्ति की लड़ाई में हरी हुई घोषित की गयी | देशभक्त उसकी आवाज़ दबाने में कामयाब रहे, जश्ने !! गर्व से सीन चौड़ा हुआ जा रहा था !
लेकिन गुरमोहर की दबी हुई आवाज़ ने इस लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है |अभिव्यक्ति की आज़ादी भर देश के एकात्मता को तोडना गलत है
, परंतु  “पाकिस्तान दीद नॉट किल माय फादर , वॉर दीद”; न देश की एकात्मता तोड़ता है और ना ही राष्ट्रीय भावनाओ को आहात करते हुए दीखता है |

४ मिनट २४ सेकंड के उस विडियो में और भी बहोत कुछ कहा गया पर आदत से मजबूर हम परिस्थितियों की गहराइयो को समजे बिना ही निर्णय दे दिए |
युद्ध होता है तो सिमा के उस पर भी किसी का बाप मरता है , कोई पत्नी विधवा होती है , तो किसी माँ की कोख सुनी हो जाती है | सिमा के इस पआर
भी यही भयावह मंजर रहता है | युद्ध भूमि पर कभी ऐ.सी रूम में बैठकर भाषण हाकने वाले नेता नहीं होते , क्षति तो उसी सैनिंक की होती है जिसके
बॉर्डर पर खाने के भी लाले पड़े होते है | राष्टवाद के कट्टरवाद में इन मासूम सैनिको की बलि देना कहा का इंसाफ है | टैगोर जी ने कहा था की "राष्ट्रवाद
एक बहोत बड़ा खतरा है" और आज वही हो रहा है , राष्ट्रवाद मानवतावाद से उप्पर उठ चूका है | राष्ट्रवाद के नाम पर इंसान ही इंसान का दुश्मन बन चूका
है | जब दो देशो की सरकार डिप्लोमेसी से कलह शांत करने में असफल होती है तो राष्ट्रवाद की आड़ लेकर अपनी अक्षमता छुपाना उनका पुराना पैतरा है |क्या गलत कहा था गुलमोहर ने की अगर फ्रांस और जर्मनी दो विश्व युद्ध के बाद भी दोस्त बन सकते है तो भारत और पाकिस्तान जिनका मूल ही एक मिटटी से बना है वो क्यों नहीं दोस्त हो सकते ? लेकिन आज इस दोस्ती की कल्पना करना भी राष्ट्रविरोधी है | युद्ध सिर्फ विनाश लाता है और यह विनाश गद्दीधारी सरकारों का नहीं बल्कि मासूम जनता का होता जो सिर्फ और सिर्फ शांति चाहती है | गुरमोहर की आवाज़ को भले ही आज दबा दिया गया हो परंतु शायद आज से कुछ सालो बाद जब युद्ध का भयावह मंजर सामने होगा तो उसके इस शांति सन्देश की जरुरत हमें जरूर महसूस होगी | इसीलिए उस विडियो को कही सेव कर के जरूर रख दीजियेगा |

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