राजनीति की गंगा में गधों का स्नान

Posted by Sunil Jain Rahi in Hindi, Politics
March 10, 2017

राजनीति की गंगा में गधे स्नान करके घोड़े बन जाते हैं। जो स्नान नहीं करते वे गधे के गधे रह जाते हैं। मतदान हो चुका है। अब बाकी है कौन गधा है और कौन घोड़ा। हर बार की तरह चुनाव में गधों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। गधों की गधा संख्या पर एस.एम.एस. बनाए जा रहे हैं, उन्हें देखने के लिए निमंत्रण पत्र भेजे जा रहे हैं। खुशी ज़ाहिर की जा रही है कि उनकी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। उनकी बढ़ती संख्या से देश को कोई खतरा नहीं है। क्योंकि गधा किसी धर्म/मजबह का नहीं होता, वह तो केवल गधा होता है।

गधा आतंकवादी नहीं होता, गधा रेल में सफर नहीं करता जो विस्फोट में मारा जाए या घायल हो जाए। उसकी जान को कोई खतरा नहीं है। गधा शेयर मार्केट में बुल और बियर की तरह सट्टा नहीं लगाता। उस पर भी कोई सट्टा नहीं लगा सकता। अश्व शक्ति नाम से प्रख्यात घोड़े भी गधे के आगे पानी भर रहे हैं। गधों का वजूद इस बार उभर कर सामने आया है। इस चुनाव को गधामय चुनाव कहने पर टी.वी. चैनल आपस में गुथे पड़े हैं। कौन गधे का प्रचार कर रहा है, कौन गधे का प्रचार नहीं कर रहा है।

बड़ा मार्मिक प्रसंग है, कुछ गधों के रिश्तेदार उनका प्रचार नहीं कर रहे हैं तो कुछ अकेले ही गधे का प्रचार करने में जुटे हैं। इस देश में गाय की जितनी पूजा होती है उससे कई गुना गधे की आरती उतारी जा रही है। सभी भयभीत हैं कौन सा गधा गंगा स्नान कर घोड़ा बन पीएचडी डाॅक्टर बनकर राज्य की चरमराई अर्थ व्यवस्था से लेकर गडढों से सुसज्जित सड़कों और बांके गुन्डे छोरों का इलाज करने आएगा। यह तय है कि गधों को सुधारना गधों के बस की बात नहीं है। गधे सुधर भी गए तो क्या देश सुधर जाएगा?

आज तक बताओ किस गधे ने रेड लाइट पार की है, किस गधे ने दूसरी प्रजाति के प्राणी को अपशब्द कहें हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब राजनीति में जाने के लिए गधा होने का प्रमाण पत्र लेना पड़े। राजनीति का दूसरा अर्थ ऐड़ा बनकर पेड़ा खाना। दूसरे शब्दों में सबसे ज्यादा दुखी है नेता। उसे हर बात का दुख है। वह अपने दुख से दुखी नहीं है, वह जनता के दुख से दुखी और जनता के दुख में ही अपना सुख ढूंढता है। जनता दुखी है तो वह सुखी है। वह एक बार दुखी होता है और जनता पांच साल दुखी होती है। मास्टर जी अब क्लास में गधा कहने में सौ बार सोचते हैं कि इसे गधा कहा जाए या नहीं और अगर यह चुनाव में घोड़ा साबित हो गया तो मेरा क्या होगा।

गधे का गैंग नहीं होता है, उसका वकीलों से कोई संबंध नहीं होता। आज तक विश्व के इतिहास में किसी गधे पर दुष्कर्म, चोरी, डकैती, लूट, आदि का इल्जाम नहीं लगा है। वह गधा है उसे इन सब उच्चकोटि की चीजों से क्या लेना-देना। उसे कोई गधा ही समझेगा ना, इससे ज्यादा और क्या होगा। मास्टर जी ने जिसे गधा कहा वह आज मास्टर जी को प्रमाणित कर सकता है।

इस बार पांच राज्यों के चुनाव में जिस प्रकार गधों की महत्ता सामने आई है, वह किसी से छिपी नहीं है। गधे की विशेषताओं से लेकर उसके अवगुणों पर चर्चा के नए मापदण्ड खड़े हो गए। जो कभी गधे को निरीह, लाचार, बेबस मानते थे, वे ही उनका प्रचार करते नजर आए। उनकी विशेषताओं में कसीदे कढ़े, उनकी चाल, दुड़की, मध्यम गति, जनमासे की चाल, उनका निहारना/देखना उनका चरना। ऐसा कोई विषय नहीं बचा जिस पर चर्चा न की गई हो।

जब इतनी चर्चा और शोहरत मिलेगी तो गरूर तो आ ही जाएगा। पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि -खुदा जब हुस्न देता है तो नजाकत आ ही जाती है। यही कारण है कि कोई भी गधा इन्टरव्यू देने के लिए आसानी से तैयार नहीं हो रहा है। साथ में फोटो भी नहीं खिंचवा रहा है। कई आतंकवादी गुट इन गधों के साथ फोटो खिंचवाकर अपना उल्लू सीधा करना चाह रहे हैं। पर गधा इतना भी गधा नहीं है कि वह आसानी से बात को न समझ पाए।

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