चुनाव सुधार को लेकर मौजूदा सरकार कितनी चिंतित?

Posted by gaurow gupta
March 28, 2017

Self-Published

भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण और मजबूत इकाई के तौर पर चुनाव आयोग को देखा जाता है। सबसे विश्वसनीय इकाई के रूप में देखे जाने वाले चुनाव आयोग अभी कुछ सवालों में उलझता हुआ देखा गया। सवाल उस समय खड़े हुये, जब 2017 के यूपी चुनाव में बीजेपी के भारी बहुमत से जीत हासिल करने पर, बसपा सुप्रीमो मायावती ने ई.वी.एम. से छेड़छाड़ किए जाने की बात कही। इसके पक्ष में कई राजनीतिक दल भी सामने आए और ई.वी.एम. की जांच कराई जाने की मांग की गई। प्रमुख चुनाव आयुक्त से पूछा गया तो उन्होंने भरपूर जोर देकर कहा कि, “ई.वी.एम. से कोई छेड़छाड़ नही हुई है। सबसे विश्वसनीय माध्यम के रूप में ई.वी.एम. के अलावा और कोई चुनाव का तरीका नही है।”

क्या यह सवाल नया है?

राज्य सभा भाषण के दौरान शरद यादव ने कहा कि ई.वी.एम. को लेकर सवाल कोई नया नही है। इसके सुधार की मांग तब से की जा रही है, जब जदयू और बीजेपी साथ में थे। लाल कृष्ण आडवाणी, वेंकैया नायडू तक ने इसकी लड़ाई लड़ी है और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया पी. सतशिवम ने वी.वी.पी.ए.टी. (VVPAT) लागू करने का निर्देश दिया था।

VVPAT क्या है?

VVPAT यानी Voter Verified Paper Audit Trail चुनाव प्रक्रिया में एक नए सुधार की पहल है। इस व्यवस्था में मतदान मशीन (evm) के साथ एक प्रिंटर को जोड़ा जाता है। मतदाता जैसे ही किसी भी पार्टी को वोट करेगा तो संबंधित पार्टी को दिए गए वोट की पर्ची मशीन से निकलकर आएगी। बाद में पर्ची मशीन से जुड़े एक बॉक्स में जमा हो जायेगी, जिसे मतदाता यह देख सकेंगे की उनके वोट सही जगह गए है।

VVPAT की शुरुआत भारत में पहली बार नागालैंड के विधानसभा क्षेत्र नोकसेन में हुई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ, गांधीनगर, बेंगलुरु साउथ, चेन्नई सेंट्रल, जादवपुर, रायपुर, पटना साहिब और मिज़ोरम में भी VVPAT का उपयोग किया गया। 2017 के चुनाव में गोवा के सभी चुनावी क्षेत्रों में इसका उपयोग हुआ। पर पूरे भारत में इसे लागू करने में मौजूदा सरकार अब तक कोई कदम नही उठा रही है। लोकतंत्र में और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का पालन पूरी तरह से अभी तक नही किया गया है? नैतिकता और निष्पक्षता की बात करने वाली मौजूदा सरकार इस मामले पर क्यों निष्क्रिय है?

चुनाव आयोग द्वारा अन्य सुधार को लेकर मांग

चुनाव आयोग ने अब तक 47 सुधार सुझाव भेजे हैं, ताकि उन पर सशक्त कानून बनाकर इसकी विश्वसनीयता को बरकरार रखा जा सके। इनमें राजनीती को बाहुबल और अपराध से मुक्त करना, चुनावी समय में पैसो के दुरूपयोग पर रोक, बिकाऊ खबर को आपराधिक मामले के रूप में देखा जाना आदि हैं और इलेक्शन कमीशन को और शशक्त बनाये जाने को लेकर मांग की गयी है। बार-बार सुझावी पत्र लिखे जाने के बावजूद भी सरकार इस पर कानून बनाने से भाग रही है।

पूर्व चुनाव आयुक्त एस.वाय. कुरैशी ने राज्यसभा की एक टीवी बहस के दौरान कहा, “अगर चुनाव आयुक्त का चुनाव कॉलेजियम प्रणाली के तहत होगा तो इसकी विश्वश्नियता और बढ़ेगी।” इसको लेकर उन्होंने सुझाव भी दिये है पर अब तक इस पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नही देखने को मिली है। उन्होंने ज़ोर देते हुये कहा कि, “यह बहुत जरुरी है कि सरकार पक्ष, विपक्ष और एक अन्य सदस्य के कॉलेजियम सिस्टम की आवश्यकता है।”

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि चुनाव आयोग, पार्टी को रजिस्टर करने की ताकत तो रखता है लेकिन उनके किसी भी प्रकार की अनैतिक और गलत हरकत के कारण डी-रजिस्टर नही कर सकता। अगर चुनाव आयोग को और विश्वशनीय बनाए जाने की ज़रूरत है तो इसको लेकर सरकार कोई ठोस कदम चुनाव आयोग के खुद के सुझाव दिए जाने पर भी काम नही कर पा रही।

वर्तमान चुनाव आयुक्त ने भी कहा है एक सुगठित चुनाव कानून की आवश्यकता है जो चुनावी प्रक्रिया को और विश्वसनीय मजबूत बनायेगा और भारतीय लोकतंत्र मजबूत बनेगा।

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