अल्पसंख्यकों को मिटाने के लिए बहुसंख्यकों की फितरत में रहा है जेनोसाइड

1919 में ली गई आर्मीनियाई अनाथ बच्चों की एक तस्वीर। फोटो आभार: फेसबुक पेज Old Armenia.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों में सुनियोजित तरीके से यहूदियों का वर्चस्व खत्म करने के साथ-साथ इस समुदाय को पूरी तरह से मिटाने की कोशिश की गई। इसी संदर्भ में 1944 में, पेशे से वकील पोलिश-यहूदी राफेल लेमकिन ने अपनी किताब में इस अपराध की एक नए शब्द ‘जेनोसाइड’ (जनसंहार) के रूप में व्याख्या की।

मूलतः जेनोसाइड को दो शब्दों जेनो और साइड से मिलकर बना है। ग्रीक शब्द जेनो (genos) का अर्थ कुल, जाति, पीढ़ी या लोगों का समूह (समाज) होता है, वहीं दूसरे शब्द साइड (cide) का अर्थ लैटिन में शिकार या हत्या है। अलग-अलग दौर में दुनियाभर में इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया गया है, जिसे जेनोसाइड का नाम दिया जा सकता हैं। इनमे लाखों की तादाद में लोगो को मारा गया, बेघर किया गया, बलात्कार हुए, लेकिन ये अपराध व्यक्तिगत ना होकर पूरे समुदाय को अपना शिकार बनाता है।

अगर 1915 के समय पर नजर डालें तो पहले विश्वयुद्ध के दौरान तुर्की पर ये आरोप लगा था कि इस देश ने एक भाषा और धर्म के सिद्धांत पर उन लाखों लोगो का कत्ल कर दिया जो इस समीकरण में नहीं आते थे। इनमें मुख्य रूप से असीरियंस (Assyrians), पोंटियन (Pontian), अनातोलियन ग्रीक्स (Anatolian Greeks) मौजूद हैं। लेकिन जिस समुदाय को सबसे ज्यादा जान-माल का नुकसान पहुंचाया गया वह था अर्मेनियंस (Armenians)।

तुर्की में अर्मेनियंस सातवीं शताब्दी से मौजूद थे और इन्होने अपनी ज़मीन बचाने के लिए कई बार मंगोलिया, तुर्की और रूस से लड़ाई भी की थी। साल 1890 के आते-आते अर्मेनियंस और तुर्किश सरकार जिसके मुखिया सुल्तान अब्देल हामिद थे, इनके बीच कड़वाहट बढ़ने लगी और 1894 में 8000 और एक साल बाद 2500 अर्मेनियन समुदाय के लोगो का कत्ल किया गया। साल 1914 में तुर्की, जर्मनी के साथ मिलकर पहले विश्वयुद्ध में शामिल हो गया। तुर्की सेना के अफसरों ने अर्मेनियन समुदाय पर आरोप लगाए कि ये रूस से जज्बाती रूप से जुड़े हुए हैं और देश विरोधी होने का आरोप लगाकर, सुनियोजित ढंग से तकरीबन 15 लाख अर्मेनियन समुदाय के लोगों का कत्ल कर दिया।

1945 में आश्वित्ज़ (यहूदियों के लिए बनाए गए जर्मन कांसनट्रेशन कैंप) की ली गई एक तस्वीर। फोटो आभार : फेसबुक पेज यूनेस्को

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान इसी तरह यहूदियों का कत्लेआम किया गया। पहले विश्वयुद्ध में करारी हार के बाद जर्मनी पर, विजयी मित्र देशों ने कई तरह की पाबंदियां लगा दी। जहां जर्मनी पर यूरोप में प्रभावक्षेत्र कम होने के दबाव में था, वहीं सामाजिक स्तर पर बेरोज़गारी और बाकी समस्याओं के कारण जर्मन जनता में निराशा अपने चरम पर थी। इसी समय हिटलर की लोकप्रियता भी बढ़ रही थी और 1928 में केवल 2 सीट जीतने वाली नाज़ी पार्टी, 1932 के चुनावों में 230 सीट जीतने में कामयाब रही थी।

हिटलर ने आते ही उन सभी कानूनों में बदलाव कर दिया जिनसे यहूदियों को फायदा पहुंच रहा था। सरकारी नौकरी से बेदखल करना, उच्च दर्जे के कार्यक्षेत्र से वचिंत करना और यहूदी समुदाय के लोगों की किसी अन्य समुदाय में शादी पर प्रतिबन्ध आदि तरीकों से यहूदियों को जर्मनी से निष्कासित करने के योजनाबद्ध फैसले लिए गए। वहीं जर्मन जनता को प्रचार के माध्यम से बताया गया कि, यहूदी समुदाय के कारण ही जर्मनी को पहले विश्वयुद्ध में हार का मुंह देखना पड़ा था।

जर्मनी में यहूदियों के लिए नफरत और बढ़ गई जब नाज़ी राजनेता एर्न्स्ट वोम राथ (Ernst vom Rath) की 1938 में एक पोलिश-यहूदी किशोर ने हत्या कर दी। इसके बाद यहूदियों को शिक्षण संस्थानों से भी दूर कर दिया गया। इस साल के अंत तक तक़रीबन 1 लाख यहूदी जर्मनी छोड़ चुके थे। वहीं दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब जर्मनी ने रूस पर हमला किया तो इसे यहूदी समुदाय के खिलाफ लड़ाई के रूप में देखा गया।

यहां शुद्धिकरण के नाम पर नाज़ी सरकार द्वारा लगभग 50 लाख यहूदियों का कत्ल किया गया। कत्ल करने के लिए ऐसे तरीके अपनाए गए जो पहले देखने में नहीं आए थे। मसलन अमानवीय मेडिकल टेस्ट करना, ज़हरीले गैस चेम्बर में लोगों को डालकर मारना, बहुत कम खाना देकर सारा दिन मजदूरी करवाना, यहां तक की कड़कड़ाती ठंड में बिना कपड़ों के लोगो को रहने के लिए मजबूर करना आदि।

रवांडा में एक सामूहिक कब्र के पास खड़ा एक बच्चा। फोटो आभार : फेसबुक पेज Alfonzo Words

इसी तर्ज पर 1975 में कंबोडिया, नब्बे के दशक के शुरुआती दौर में रवांडा, बोस्निया और 2003 में दारफुर (पश्चिमी सूडान) में हुए जनसंहारों पर अध्ययन किया जाए, तो ये सभी बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसख्यंक समाज को खत्म करने के लिए किए गए। इन सभी में ये आरोप समान है कि ये सभी जनसंहार व्यवस्थित तरीके से सत्ता में मौजूद ताकतों द्वारा करवाए गए। लेकिन इन घटनाओं पर नज़र डालें तो एक सवाल ज़हन में आता है कि, बहुसंख्यक समाज का एक आम नागरिक कैसे इस तरह के कत्लेआम को स्वीकार कर सकता है?

इन घटनाओं के समय पर गौर करें तो यह सामने आता है कि, ये सारी घटनाएं यकायक नहीं हुई, काफी समय से समाज में इन अल्पसख्यंक समूहों के खिलाफ नफरत फैलायी जाती रही। इस नफरत को ज्यादा उग्र करने के लिए, यह दिखाने की पूरी ईमानदारी से कोशिश की जाती रही, कि ये अल्पसंख्यक समुदाय देश के लिए खतरनाक हैं। मसलन 1915 में तुर्की और 1939-44 में जर्मनी, दोनों जगह अल्पसंख्यक समुदाय पर दुश्मन देश से सहानुभूति के आरोप लगाकर इनके खिलाफ समाज में नफरत फैलाई गयी। इसके चलते एक समय ऐसा आया जब समाज की निराशा और गुस्से ने जनसंहार को अंजाम दिया और इसे स्वीकार भी किया गया।

इस तरह की घटनाएं, विश्व के कोने-कोने में किसी ना किसी समय अंतराल में होती रही हैं और आज भी हो भी रही हैं। ये भी एक सच है कि इन जगहों पर एक बार इस तरह की घटना होने के बाद ऐसे ज़ुल्म बार-बार देखने को नहीं मिले। तो क्या ये जेनोसाइड तब हुए जब सत्ता में बैठे एक इंसान या सत्ता की विचारधारा एक विशेष समुदाय से नफरत रखती थी? पक्के तौर पर यह कहना मुश्किल है, लेकिन इसे झुठलाया भी नहीं जा सकता।

फोटो आभार:फेसबुक पेज  UNESCOAlfonzo Words और  Old Armenia

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