तेरी है जमीं, तेरा आसमां

Posted by asingh
March 31, 2017

Self-Published

हमारे समाज में अक्सर सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठता रहता है। लड़कियों को भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से परहेज करने की सलाह दी जाती है। मन में इस तरह के डर का बीज बचपन में ही बो दिया जाता है। यह डर बढ़ती उम्र के साथ और गहरा होता जाता है। कोचिंग क्लासेज जाना हो या म्यूजिक क्लास या फिर ड्राइविंग ही क्यों न सीखनी हो। साथ में भाई या परिवार के किसी बड़े पुरुष सदस्य का होना अनिवार्य कर दिया जाता है। स्कूल या कॉलेज या फिर दफ्तर से लौटने में देर हुई नहीं कि शंकाओं के बादल मंडराने लगते हैं। लेकिन इसके लिए अभिभावकों को संपूर्ण रूप में कसूरवार ठहराना, उनकी भावनाओं के साथ अन्याय करना होगा। आसपास, समाज का माहौल ही ऐसा होता है कि वे बच्चों औऱ खासकर बेटियों के लिए हद से ज्यादा फिक्रमंद हो जाते हैं। बेटों को लेकर भी अनरगल खयाल आते हैं…देर हुई नहीं। फोन आया नहीं….कि अनहोनी की आशंका वाले खयाल घेर लेते हैं। इसलिए उन्हें भी हिदायतें एवं नसीहतें दी जाती हैं। यह अलग बात है कि उन्हें मानना या न मानना…बेटों के अधिकार में होता है। यह अधिकार दिया नहीं जाता, बल्कि वह स्वत: इसे हासिल कर लेते हैं। अभी कुछ महीने पहले बेंगलुरु में लड़कियों को जिन अवांछित परिस्थितियों से जबरन गुजरना पड़ा…उससे उनका मन ही नहीं, आत्मा भी लहुलुहान हुए। समाज की अन्य लड़कियों-महिलाओं और पुरुषों ने इस पर प्रतिकार, विरोध प्रकट किया। गुस्से का इजहार हुआ। अब सड़क पर उतरने की तैयारी भी है…। दोषी पकड़े गए हैं। सजा होगी या नहीं…यह बड़ा सवाल है…पुरानी बानगी ! लेकिन इस वाक्ये के बाद अनेक लड़कियों ने बालपन से युवावस्था की दहलीज तक पहुंचने के क्रम में हुए कटु अनुभवों को सोशल मीडिया पर बेझिझक साझा किया। फिर वह राह चलते घटी हो, स्कूल के रिक्शे में, ऑटो में या बस में…विडंबना है कि यह सच किसी एक का नहीं और न ही नया है…वर्षों से लड़कियां व महिलाएं इस झेलते, नजरअंदाज करते, आपस में चर्चा करती आईं हैं। सड़कों पर सिरफिरे, एकतरफा प्रेम करने वाले मजनू हों या अधेड़ उम्र के  ‘व्यक्ति ‘ । शिकार करने में कोई पीछे नहीं रहता। यह नि:संदेह शर्म की बात है कि हर रूप एवं स्वरूप में विकसित होते समाज में ऐसी घिनौनी हरकतें बदस्तूर जारी हैं। कुछ दिनों पहले बेंगलुरु में रह रही शीरीन ने जब मुझसे पूछा कि हम क्यों ऐसी वारदातों पर खुलकर चर्चा नहीं करते? सिर्फ लड़कियां ही आपस में चर्चा क्यों करती हैं? लड़के भी उसमें शामिल क्यों नहीं होते? हम आवाज क्यों नहीं उठाते? चुपचाप सहते क्यों हैं? मैं दफ्तर के अति आवश्यक काम में उलझी थी। पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा था उसके सवालों का जवाब देने का। लेकिन इन दिनों में हर दिन यही सोचा कि उसके प्रश्न वाजिब थे। उसने बाकी लोगों की तरह खुद को सिर्फ फेसबुक पन्ने पर टिप्पणी करके सीमित नहीं रखा, बल्कि व्यापक जनसमूह को सड़क पर उतरने के लिए प्रेरित भी किया। अपनी खामोशी तोड़ने के लिए विवश किया। क्या हालात बदल रहे हैं। अगर हम आसपास नजर दौड़ाएं, तो कुछ अर्से पहले तक दफ्तरों के बाहर, सड़क किनारे के टी स्टॉलों के बेंचों पर अधिकांशत: पुरुषों का ही कब्जा दिखाई देता था। लेकिन अब उन बेंचों पर महिलाओं ने भी अपनी जगह बना ली है। फिर वह कोई कॉलेज स्टूडेंट हों या वर्किंग प्रोफेशनल। कॉलोनी के पूरे मार्केट में, जहां सिर्फ पुरुष कारोबार कर रहे थे, आज वहां महिला अकेले दम पर, बिना किसी बॉडीगार्ड के अपनी बूटीक या पार्लर चला रही हैं। निशात को लगता है कि सार्वजनिक स्थानों, ट्रेनों, बसों में महिलाओं की उपस्थिति जितनी ज्यादा होगी, असुरक्षा का डर उतनी जल्दी मिट सकेगा। पहल स्त्रियों को स्वयं करनी होगी। समाज में अपने लिए छोटी-बड़ी जगह बनानी होगी। देश के जाने-माने लेखक रवि कहते हैं कि हम जब बच्चों, विशेषकर बेटियों को अकेले, उनकी नजरों से दुनिया देखने का अवसर देंगे, तभी उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा। डर और संकोच खत्म हो पाएगा। उम्मीद कायम है। 

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