नदी में डूब जाने के बाद सातवें दिन जिन्दा बाहर निकल आया, कैसे?

Posted by Hayat Singh
March 7, 2017

Self-Published

यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं बल्कि हक़ीक़त है। हिमालय की तलहटी में स्थित जनपद चंपावत में एक गाँव है डुंगरालेटी। लगभग आज से छः दशक पहले की बात है।
एक व्यक्ति नदी में डूब जाता है और सातवें दिन वापस जिन्दा घर लौट आता है।
दरसअल प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक मेला लगता है।
आस-पास के तकरीबन बारह गाँवों के निवासी अटूट श्रद्धा-भक्ति के साथ अमावस्या के दिन वहाँ पर एकत्रित होते हैं।
हर एक गाँव के लोग अपने लोक देवता की झाँकी के साथ आते हैं। झाँकी में डंगरिया होता है। ढोल-दमाऊ और जयकारों के साथ लोग अपने-अपने गाँवों से मंदिर तक आते हैं।
महाकाली के किनारे नागार्जुन बाबा के इस मंदिर की निकट के क्षेत्रों में बहुत मान्यता है।
मान्यता प्रबल है कि अगर कोई निसंतान दंपति गुरुपूर्णिमा के अवसर पर अमावस्या की शाम को ही यहाँ आकर पूजा-पाठ करे तो उसे संतान सुख मिल जाता है।
वर्तमान में नागार्जुन के डंगरिया गंगा दत्त जी के दादा जी उस समय डंगरिया थे।
होता यह है कि पूर्णिमा की सुबह के प्रथम पहर में डंगरिया में नागार्जुन बाबा प्रकट हुए रहते हैं।
कुछ लोग मिलकर डंगरिया को स्नान के लिए नदी में ले जाते हैं।
इस दौरान डंगरिया नदी में प्रविष्ट होने की कोशिश करता है। लेकिन लोग पकडे रहते हैं।
उस समय कुछ युवाओं ने परस्पर सलाह-मशविरा किया और डंगरिया को परखने के लिए उसे छोड़ दिया।
परिणाम स्वरूप यह हुआ कि डंगरिया नदी में प्रविष्ट हो गया।
इसके बाद दो तीन दिन तक नदी के किनारे-किनारे लोग निगरानी रखते रहे कि शायद कहीं लाश उतर आये किनारे। मगर ऐसा नहीं हुआ।
अमूमन नदी में डूबकर मरने वाले की लाश किनारे उतर ही आती है।
आख़िरकार डंगरिया के घरवालों को भी यकीन हो गया कि वह मर गया है। उन्होंने इसके बाद हिन्दू रीतिरिवाजों के अनुसार उसका क्रिया-कर्म शुरू कर दिया।
लेकिन हैरत की बात तब हुई जब डूबने के ठीक सातवें दिन वही डंगरिया वापस घर लौट आया।
डुंगरालेटी और जमरसों गाँव के लोग इस बात के साक्षी हैं।
घर पहुँचने पर उन्होंने देखा कि उनको मृत मानकर उनके घर वालों ने उनका क्रिया-कर्म शुरू कर दिया है।
घर-परिवार वालों ने उनसे पूछा कि वह जिन्दा कैसे बच गए और इतने दिनों तक थे कहाँ?
डंगरिया ने कहा कि उन्हें बताने को मना किया गया है।
लेकिन घर-परिवार में सबके बार-बार अनुरोध करने पर उन्हें बताना पड़ा।
उन्होंने बताया कि इन सात दिनों के बारे में बताते ही उनकी मृत्यु हो जायेगी। उन्होंने बताया कि नदी के भीतर एक भव्य-आलीशान स्वर्ण महल है, जहाँ नौकर-चाकर की सारी सुविधाएं हैं।
इस तरह से घटनाक्रम का उल्लेख करते-करते ही उनके प्राण निकल गए।
तब से तो इस नागार्जुन मंदिर की महिमा और अधिक प्रसिद्ध हो गयी।
लेकिन चर्चा के अभाव में शायद ही बहुत कम लोग जानते होंगे इस अनूठे मंदिर के बारे में।
शेष अगले भाग में….

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