नरेंद्र भाई मोदी, पहली बार गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री कैसे बने थे.

Self-Published

गुजरात राज्य, जो आज भाजपा का गढ़ माना जाता हैं एक समय कांग्रेस का विजयी परचम यहाँ लैहराया करता था. अगर ज्यादा दूर ना जाये तो १९८० और १९८५ में यहाँ राज्य चुनाव में कांग्रेस ने अपनी बहुमत दर्ज करवाई थी. और इसी बीच साल १९९० में हुये राज्य चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत ना मिलने से, गठबंधन सरकार का बोल बाला रहा. लेकिन १९९०-१९९५, इस समय दौरान बाबरी मस्जिद का ध्वस्त होना, इसी के पश्चात देश के कई हिस्सों में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे भड़क चुके थे, १९९३ में मुंबई में हुये ब्लास्ट जिस के आरोप के छिट्टै अहमदाबाद के गैंगस्टर लतीफ पर गिरे जिस के कारण इसे भारत छोड़कर पाकिस्तान भागना पड़ा था और सूरत में प्लेग बिमारी का फैलना की लोगो को शहर छोडने के लिये मजबूर होना पड़ जाये. ये, सारी घटना, मतदाता में बदलाव के संकेत दे रहे थे और इसी के तहत, १९९५ के राज्य चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत से चुन कर, राज्य सरकार की रचना करने जा रही थी.

यहाँ, भाजपा को सत्ता तो मिल गयी थी लेकिन भाजपा गुजरात राज्य के दो मोहरी नेता शंकर सिंह वाघेला और नरेंद्र भाई मोदी, को दरकिनार कर केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलायी  गयी, यहाँ मोदी जी को भाजपा की दिल्ली मुख्य इकाई के साथ जोड़  कर  गुजरात से दूर कर दिया गया वही, कुछ समय बाद शंकर सिंह वाघेला ने गुजरात भाजपा राज्य इकाई को तोड़ कर, अपनी नयी पार्टी बनाई और कांग्रेस के समर्थन से केशुभाई की भाजपा सरकार को गिरा कर, अपनी सरकार बनाने में कामयाब रहे, राज्य की राजनीति नया मोड़ ले रही थी, जहाँ कांग्रेस ने शंकर सिंह वाघेला और उनकी पार्टी से अपना, समर्थन वापस ले लिया इसी के तहत विधानसभा भंग होने से, १९९८ में राज्य चुनाव हुये, यहाँ, भाजपा फिर से अपनी बहुमत दर्ज करवा चुकी थी.

यहाँ, वाघेला जी, अपना नाता भाजपा से तोड़ चुके थे और मोदी जी को अभी भी, भाजपा केंद्र इकाई दिल्ली से ही जोड़ रखा था और केशुभाई पटेल, को ही यहाँ मुख्य मंत्री की शपथ दिलायी गयी. केशुभाई पटेल की सरकार को अब ना विपक्ष से ना राज्य सरकार की भाजपा राज्य इकाई के किसी बागी से डर था, यहाँ पटेल होने के नाते, इनकी पटेल समुदाय और इसी के तहत राज्य सरकार पर अच्छी पकड़ बनी हुई थी लेकिन क़ुदरत को कुछ और ही मंजूर था, यहाँ तारीख २६-जनवरी-२००१, को सुबह, करीब ८-९ के दरम्यान जबरदस्त जमीनी भूकंप ने पूरा गुजरात हिला दिया था,जहाँ इसका केंद्र बिंदु कच्छ-भुज में था लेकिन अहमदाबाद शहर की कई गगन चुम्बी इमारत भी धारा शाही हो चुकी थी.

भूकंप, से पूरा गुजरात धाराशाही हो चूका था. व्यक्तिगत रूप से मैने ऐसी इमारते देखी थी जहाँ दो जुड़ी हुई इमारत में से एक पूरी धारासाही हो चुकी थी और दूसरी इमारत सही सलामत खड़ी थी, ऐसी इमारत भी थी जो पोश मानी जाती थी लेकिन अब इनका नामो निशान भी नहीं था. कई, लोग जो उस समय सहायता के लिये भुज गये थे, उन्होने बताया की शहर मलबे में बदल चूका था, दर्द की चीक पुकार हर तरफ थी, अस्पतालों में जगह ना होने से, कई जगह खुले मैदानों में टेंट लगा कर मरीज की देख भाल करने की कोशिश की जा रही थी. आर्मी, अर्ध सैनिक बल, इत्यादि सुरक्षा बल के जवान मलबे को हटाने में लगे हुये थे. क़ुदरत ने इतनी तबाही मचायी  थी की इस से निपटने के लिये, सरकारी कार्य गुजारी और साधनों की कमी हो रही थी.

आम तोर, पर भारतीय आम नागरिक सरकारी व्यवस्था से मुंह फेर कर ही खड़ा होता हैं और ये क्या कार्य गुजारी कर रही हैं, इससे किसी भी तरह का तालुकात नहीं रखना चाहता, लेकिन जब तबाही का ये मंजर हो और व्यवस्था हर पीड़ित तक पहुँचने में नाकामयाब हो तो विद्रोह के सुर उठते ही हैं. यहाँ, सरकारी तंत्र के सिवा भी कई गैर सरकारी सस्थानो ने आर्थिक, खाद्यान, इत्यादि रूप में सरकार को मदद की, यहाँ कई लोगो ने व्यक्तिगत रूप से बताया की पहुच रही मदद में व्यापक तरीके से भ्रष्टाचार अपने पैर पसार रहा था, अमूमन उस समय में ये आम सी बात थी की विदेशों से आये फल जिन पर बाकायदा विदेशी मोहर लगी थी, अहमदाबाद की सब्जियों की मंडी में महँगे दाम पर बिक रहे थे. लेकिन यहाँ आम नागरिक इसे संदेह की नजर से देख रहा था, क्युकी ये विदेशी फल भूकंप के  आने से पहले कभी भी सब्जी मंडी में नहीं देखे गये थे, अचानक से ऐसी कई वस्तु ये, फल, बाजार में दिख रहे थे. यहाँ, ये तर्क भी हो सकता हैं, सरकारी सन साधन इतनी बड़ी सहायता को संभालने में विफल हो रहा हो था.

इस से ज्यादा, भयंकर स्थिति गिरी हुई इमारतो के मलबे की थी जिसे अभी भी हटाया नहीं जा पा रहा था. कई जगह,कई दिनों तक मलबे को हटाने की मशीन नहीं पहुच रही थी और जवान हाथों से और छोटे औजार से ही मलबे को हटाने में लगे हुये थे. दूसरी तरफ, बेघर हुये लोगो को रखने के लिये स्कूल, कॉलेज, इत्यादि सरकारी जगह का लाभ लिया जा रहा था लेकिन यहाँ जीवन की मूलभूत सुविधाएं की कमी होने के कारण, जीवन की तकलीफ बढ़ गयी थी. एक तरफ बेघर होने का गम और दूसरी तरफ, सरकारी तंत्र द्वारा हो रही अनदेखी, भूकंप द्वारा दिये गये घाव को और गहरा कर रही थी.  सरकार के पास इनको वापस स्थाई करने की समस्या थी और इसी के तहत, सरकार ने कई तरह की घोषणा भी की, लेकिन ऐसा कम ही देखने में आया था की कही कोई कॉलोनी सरकार द्वारा बनाई गयी हो और वहां इन बेघर लोगो को घर दिये गये हो, हाँ, मुआवजा कई लोगो को दिया गया लेकिन मुआवजा की रकम इतनी नहीं थी जितना नुकसान हुआ था.

भूकंप, में जान-माल को नुकसान तो बहुत पैमाने पर हुआ था लेकिन इस आपदा से निपटने में सरकार की कार्य गुजारी पर सवाल भी उठ रहे थे. इसी के अंतर्गत, २००१ में हुये विधानसभा राज्य उप चुनाव की सभी ३ सीट पर भाजपा हार गयी थी और कांग्रेस यहाँ जितने के साथ-साथ, अगले राज्य चुनाव में बहुमत मिलने का दम भी भर रही थी. इस हार, से भाजपा की राज्य इकाई में भी केशुभाई पटेल के खिलाफ सुर उठ रहे थे जिसकी जानकारी भाजपा की केंद्र इकाई को भी थी और अगले चुनाव में हार का अंदेशा भी था, इसी के कारण  राज्य सरकार में बदलाव की जरूरत हैं. यहाँ, केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और २००१ के आखिर के महीनों में भाजपा केंद्र इकाई  ने श्री नरेंद्र भाई मोदी को गुजरात का मुख्य मंत्री बनाकर गुजरात की विधान सभा में भेज दिया.

मोदी जी के बतौर मुख्यमंत्री बनने के शुरूआती दिनों में ये क़यास लगाये जा रहे थे, की ये गुजरात में कुछ दिनों के मेहमान हैं. यहाँ, मुख्यमंत्री के रूप में इन्हें सुशोभित तो कर दिया गया था लेकिन एक नेता के रूप में कही भी इनकी गुजरात के नागरिक के बीच में पहचान नहीं बन पा रही थी. यहाँ, हर ज़ुबान बोल रही थी, की अगले राज्य चुनाव में भाजपा का गुजरात से पत्ता साफ़ हो जायेगा, उस समय शायद ही किसी ने ये क़यास लगाये होंगे की मोदी जी, ये आने वाले दिनों में गुजरात का चेहरा बन कर उभर आयेगा और अगले ३ विधान सभा चुनाव के साथ-साथ २०१४ के लोकसभा चुनावों में भी बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में एक नया चेहरा बन कर उभरेगा.

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