पहले गोरे कुचलते थे अब काले आ गये हैं ।

Posted by Sachin Bhardwaj
March 11, 2017

Self-Published

बात तब की है जब देश आज़ाद नहीं हुआ था तो आंदोलन को कुचलना कोई बड़ी बात नहीं हुआ करती थी, पर अब गोरे तो जा चुके हैं तो अब कोन इस आंदोलन को कुचल रहा है, अजी जब काली चमड़ी मे गोरे जैसी नीयत के लोग हों तो बाहर से किसी को बुलाने की जरूरत नहीँ पड़ती। हमारे देश में किसी मजबूर को कुचलने मे सबको बहुत मज़ा आता है, जी बात हो रही है  Erom sharmila की जो कि इस बात को समझाती है कि आप अगर कितने भी बलिदान दें सब इस देश में बेमानी लगती हैं।

मणिपुर में 86 फीसदी वोट पड़े थे, लेकिन 16 साल तक ऐतिहासिक संघर्ष करने वालीं इरोम शर्मिला को सिर्फ 90 मतदाताओं का मत ही मिल सका, जिस उम्र में लोग आने वाले कल के सपने देखने और उन्हें सच करने में जुटे रहते हैं, उस दौर में वह तपस्या पर बैठ गई. भूखी-प्यासी. अपने लिए नहीं, बल्कि सिर्फ एक इतनी सी मांग लेकर कि जिस मिट्‌टी में वह पैदा हुई, जिसमें पली-बढ़ी,वहां के लोगों पर अत्याचार बंद हो. वह सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) हटा लिया जाए जो सुरक्षा बलों को सिर्फ शक के बिना पर ही किसी को गिरफ्तार कर लेने और गोली मारने तक की इजाजत दे देता है.

इसके बाद पूरे 16 साल तक इरोम शर्मिला अकेले लड़ती रहीं, अगस्त 2016 में इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल खत्म कर ऐलान किया कि वे चुनाव लड़ेंगी. आम लोगों से मिलने वाले प्यार-सम्मान पर उन्हें कुछ ज्यादा ही भरोसा जो था.तभी तो चुनाव नतीजों के तुरंत बाद उन्होंने अपनी पीड़ा जताई, ‘मैं जैसी हूं, उस तरह लोगों ने मुझे स्वीकार नहीं किया. मैं खुद को ठगा हुआ महसूस करती हूं. मैं अब राजनीति से बुरी तरह थक चुकी हूं. इसलिए अगले कुछ दिन तक आश्रम में रहकर आराम करना चाहती हूं.’ कहना न होगा कि अपने आगे के संघर्ष में वे एक बार फिर अकेली नजर आ रही है.

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