जब चीज़ें समझने लगी तब पता चला कि बचपन में मेरे साथ यौन हिंसा हुई थी

मेरे आस-पड़ोस में, घर में या किसी रिश्तेदारी में लड़की के पैदा होने पर बहुत बार सुनने को मिलता है कि ‘लक्ष्मी हुई है।’ ऐसा लगता है कि सभी लोग लक्ष्मी की ओट लेकर लड़की के पैदा होने पर मिली निराशा को कम करना चाह रहे हों। लड़की हुई है, तो हम यह कह कर क्यों उसकी पहचान छुपा देते है कि वह लक्ष्मी है? क्या कभी लड़के के पैदा होने पर हम उसका इस तरह की उपमाओं से स्वागत करते हैं? नहीं ना! लड़कियों के पैदा होने से ही उन पर हम कुछ ऐसे टैग्स लगा देते हैं, जिससे वह अपने आपको एक व्यक्तिगत इंसान की तरह देख ही नहीं पाती। ना ही वो अपने आस-पास की उन तमाम जगहों को अपना बना पाती है जो असल में उनकी होनी चाहिए।

लेकिन मैं इस मामले में अपने आप को खुशकिस्मत समझती हूं, क्यूंकि मेरे पैदा होने पर माँ-बाप, दादा-दादी, चाचा-चाची और भी बहुत सारे रिश्तेदार और पड़ोसियों ने ख़ुशी मनाई लड़की होने की। अब यह ख़ुशी इसलिए थी कि मुझसे पहले एक भाई घर में आ चुका था या सच में ही सबको लड़की का इंतज़ार था, यह मैं नहीं जानती। मेरा बचपन भी बहुत अच्छा बीता और कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि मैं एक लड़की हूं, खेलने-कूदने पर कोई रोक-टोक नहीं, पूरा दिन कहीं भी किसी के भी साथ खेल सकती थी। लेकिन खेल-खेल में कब मेरे साथ कुछ गलत हुआ, इसका एहसास उस समय नहीं कर पाई।

बहुत सालों बाद जब कुछ समझ बनी तब पता चला कि पड़ोस वाले भैया खेल के बहाने से अपनी इच्छाएं पूरी कर रहे थे। जब समझ आया तब बता नहीं पाई इस डर से कि कोई मेरी बात को सच नहीं मानेगा या अगर मानेगा भी तो मुझे चुप करवा दिया जाएगा यह बोल कर कि किसी को बोलना मत। तब पहली बार अहसास हुआ कि मेरी बात, मेरी आवाज़ के लिये मेरे घर में ही कोई जगह नहीं है। आज भी जब घर जाती हूं और वो दिखता है तो मन करता है ज़ोर से चिल्ला दूं, चांटा मार दूं, उसकी माँ और बीवी को बता दूं या अपनी माँ को बता दूं, लेकिन नहीं बता पाती। हर बार यह गुस्सा मन में ही रख लेती हूं। इस गुस्से के साथ ही अपनी बात नहीं कह पाने की टीस भी मन में लगातार बढ़ती चली जाती है, यही सोचती रह जाती हूं कि क्यों नहीं हैं मेरे पास वो जगह जहां मैं इसके बारें में खुलकर बता सकूं।

लेकिन ऐसा सिर्फ उन पड़ोस वाले भैया के मामले में नहीं, बल्कि ना जाने कितनी बार सड़क पर चलते, साइकिल पर जाते समय, पार्क में खेलते वक्त कितने लड़कों ने और मर्दों ने यह एहसास दिलाया है कि यह जगह हमारी नहीं है। यदि हम इन जगहों पर दिखेंगे तो हमारे साथ यही सब होगा। कभी कोई छाती पर ज़ोर से मार कर चला जाएगा तो कभी कोई रास्ता रोक कर किस करने को बोलेगा। कभी कोई घर तक तुम्हारा पीछा करेगा और बार-बार तुम्हे याद दिलाएगा कि यदि तुम यहां दिखी तो तुम्हारे साथ यही होगा। अगर किसी को बताया तो कोई तुम्हारी नहीं सुनेगा बल्कि कल से खेलने, स्कूल जाने और दोस्तों से मिलने तक पर पाबंदी लग जाएगी।

यह सब आज भी बदस्तूर होता है, रोज़ होता है, हर जगह होता है और ना जाने कितनी और लड़कियों के साथ होता है। ट्रेन में अकेले चढ़ती हूं तो ऐसा लगता है सारी नज़रें मेरी ओर हैं और मुझसे पूछ रही हैं कि लड़की होकर अकेले सफ़र कर रही हो? डर नहीं लगता? हां, डर तो लगता है लेकिन किसी को बताना नहीं चाहती, क्यूंकि बताने के लिये ज़रूरी जो स्पेस चाहिये वो तो है ही नहीं। स्टेशन पर उतरो तो लगता है कि आधी से ज़्यादा जनता का ध्यान मेरी तरफ ही है। कभी हवा खाने के लिए गेट पर खड़े हो जाओ तब चलते-फिरते कोई अंकल आपको अन्दर बैठने की मुफ्त सलाह दे देंगे या ट्रेन के बाहर की जनता आपको देखकर कुछ ऐसा कहेगी कि आप खुद ही अपनी सीट पर जा कर बैठ जाएंगे। नहीं तो और कोई सहयात्री यह भी समझ सकता है कि आप आसानी से ‘उपलब्ध’ हैं।

मैं घर से दूर रहती हूं, अपने लिये कमाती हूं, अकेले कहीं भी आ जा सकती हूं लेकिन फिर भी मुझ डर लगा रहता है इन लोगों का। नहीं मालूम कहां से, किस समय, किस वेश में मेरे सामने आ जाएंगे। जब आ जाते हैं तो मैं पहले ही पल तो हिम्मत दिखाती हूं, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत सहम जाती हूं। अजीब ख्याल मन में आने लगते हैं- कहीं इसने मेरा पीछा कर लिया तो? इसको पता है मैं अकेली रहती हूं कभी मेरे कमरे के बाहर आ गया तो? और भी ना जाने कैसे-कैसे ख्यालों से उलझती हूं हर समय। यह सब ख्याल अभी भी मैं अपने अन्दर ही रखती हूँ, किसी से अपना यह डर नहीं बांट पाती, अपने परिवार से भी नहीं क्योंकि अपने डर को बताने का कोई स्पेस ही नहीं पाती वहां। उन्हें बताया कि मुझे अकेले रहने में डर लगता है तो ना मैं नौकरी कर पाउंगी और ना कहीं अकेले आ-जा पाउंगी।

कितना अजीब है ना, अकेले रहो तो भी डर लगता है और कोई आस-पास हो तब भी। बचपन से ही लगातार डराया जाता है थोड़ी हिम्मत करके उससे आगे बढ़ने की कोशिश करो तो सब आपको धक्का देकर फिर से पीछे करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। मैंने अपने इन अनुभवों से यही सीखा है कि यदि अकेले रहना है तो बहुत सारी ऐसी परिस्थितियों से गुज़रना पड़ेगा। अकेले नहीं रहेंगे तो यह सारी जगह हमेशा हमसे छिनी रहेंगी, हमारी नहीं बन पाएंगी। हम नहीं निकलेंगे तो हमारे घर, गलियां, मोहल्ले, कस्बे, गांव और शहर आज से भी कहीं ज़्यादा खतरनाक हो जाएंगे।

मुझे अनुराधा बेनीवाल की किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ में लिखी बात ध्यान आ रही है जिसे इस पीढ़ी की हम सभी लड़कियों को गांठ बांध लेना चाहिये। वो  लिखती है कि, “यदि हम निकलेंगे तो हमारी, आपकी हम सबकी बेटियां भी निकल पाएंगी, बेफिक्र घूम पाएंगी। और यदि हम भी ना निकले तो यह सब ऐसा ही चलता रहेगा। मुझे यही लगता है कि हमारे अन्दर के डर से हम तभी निजात पायेंगे जब उन डरों से लड़ेंगे। यह लड़ाई आसान नहीं होगी, मेरे लिए भी नहीं है, किसी के लिए भी नहीं होगी। लेकिन लड़ाई तो करनी ही होगी, नहीं तो हम इन डरों से हमेशा डरते रहेंगे, यह ऐसे ही बढ़ते रहेंगे और हम अपने को कहीं दबा हुआ पाएंगे।”

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