बेरोजगारी के लिए समाज और अभिभावक भी जिम्मेदार

Self-Published

देश की जटिल समस्याओं की लिस्ट में अपना नाम टॉप समस्याओं में शुमार करा चुकी बेरोजगारी की समस्या देश के लिये कैंसर जैसी बीमारी है। बढ़ती बेरोजगारी के लिये भले ही हम सब इसका जिम्मेदार होने का ठीकरा सरकार के सिर फोड़ते हो लेकिन कड़वा सच यह है कि बढ़ती बेरोजगारी के लिये सिर्फ और सिर्फ सरकार जिम्मेदार नही है काफी गहन मंथन एवं खोजबीन करने के बाद मै खुद को इस निष्कर्ष पर खड़ा पाता हूँ कि बेरोजगारी के लिये सरकार के साथ-साथ समाज और अभिभावक भी विशेष जिम्मेदार है यह तीनों इसे प्राथमिकता से लेकर हालातों का निष्पक्ष आंकलन कर ठोस कदम उठाएं तो मुझे आशा ही नही वरन पूर्ण विश्वास है कि बेरोजगारी का साम्राज्य विस्तृत होने के वजह घटता नजर आएगा। एक युवा होने के नाते बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे अपने उन युवा साथियों का दर्द गहराई के साथ साँझा करते हुये बेरोजगारी के असल वजह तक पहुँचने का प्रयास किया तमाम बेरोजगार युवा साथियों से इस पर विस्तृत संवाद करने के बाद मन में उपज रहे सवालों का जवाब यह आता है कि बेरोजगारी के लिये हमारी सरकार के साथ साथ समाज और अभिभावक जिम्मेदार है। मुझे मालूम है कि जरूर यंहा आपके जहन में मेरी इस बात पर सवाल जन्म ले रहे होंगे कि बेरोजगारी के लिये समाज और अभिभावक कैसे जिम्मेदार हो सकते ? क्योंकि सरकारी विभागों में रिक्त पदों पर नियुक्ति कर रोजगार उपलब्ध कराना तो सरकार का फर्ज है।
आपके सम्वेदनाओं के जहन में उठ रहे जायज सवाल का हल भी यह है कि हमारे समाज ने सरकारी नौकरी करने वाले युवाओं को विशेष महत्व देते हुये उन्हें सर्वोच्च एवं शिक्षित होने का ठप्पा लगा दिया है सर्वोच्च एवं शिक्षित होने का सत्यापन करते वक्त इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नही दिया कि जिस व्यक्ति को वह श्रेष्ठ साबित कर उसकी पीठ थपथपा रहे है क्या वाकई वह उस पोस्ट के लिये योग्य है जिस पर उसकी नियुक्ति कर दी गई है या फिर वह योग्यता के बलबूते पर नही बल्कि अनुचित सामग्री का प्रयोग कर उस मुकाम तक पहुँचा है। शिक्षित युवा और कागजों में शिक्षित युवा (शिक्षित गधा) को समाज के द्वारा एक ही नजर से देखने का चलन युवाओ को इस दिशा में प्रेरित कर रहा है कि जैसे भी हो उचित एवं अनुचित तरीके से किसी न किसी तरह से सरकारी विभाग में रिक्त पद पर खुद को नियुक्त कराना है यह होड़ बेरोजगारी की समस्या को संजीवनी प्रदान करने का काम कर रही है। अधिकांश अभिभावक भी इस समस्या को अप्रत्यक्ष रूप से अपना समर्थन देते हुये नजर आ रहे है। देखने को मिलता है कि अधिकांश अभिभावक अपनी संतानों पर अपनी इक्छा थोपने का काम बिना ये जाने कर रहे है कि वह उसको कितना प्राथिमकता देता है। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जँहा अभिभावक अपनी सन्तान को इंजीनियर बनने का फैसला थोपते है जबकि उसकी सन्तान चाहती है कि वह डॉक्टर बने। अभिभावक और सन्तान के बीच  लक्ष्य को लेकर विरोधवास रहता है और आखिर में उसे अपने संजोये लक्ष्य को कालकोठरी में फेंककर अपने अभिभावक के संजोये सपने के लिये मजबूर होना पड़ता है और परिणाम स्वरूप उसकी उस क्षेत्र में दिलचस्पी न होने के कारण वह पूरे मनयोग एवं लगनशीलता के साथ उसे प्राथमिकता नही दे पाता है जिससे वह अपनी मंजिल तक पहुँचने में अक्षम साबित हो जाता है। और उसकी यह नाकामयाबी उसके आत्मविश्वास और उत्साह को कमजोर कर देती है जिससे वह युवक आखिरकर बेरोजगारी का मित्र बनने को मजबूर हो जाती है। बेरोजगारी का दिन प्रतिदिन ग्राफ बढ़ाने में अहम भूमिका अदा कर रही हमारी सरकार इस दिशा में कदम तो उठाती है लेकिन दुर्भाग्य और अफ़सोस इस बात का कि उनका उठाया गया कदम सकारात्मक न होकर नकारात्मक होता है जो कि बेरोजगारी के वजूद को मिटाने के वजह उसकी जड़ो को और मजबूत करने का काम करती है। इस बात को प्रमाणित करने के लिये देश के सबसे बड़े राज्य में संचालित हुई बेरोजगारी भत्ता योजना से ही ले लीजिये। जँहा बेरोजगारी भत्ता लेने के लिये स्वरोजगार अपनाये युवाओं ने भी खुद को बेरोजगार बताकर सेवायोजन कार्यालय में अपना पंजीकरण कराया जिससे बेरोजगार युवाओं की संख्या में दिन दुगनी रात चौगुनी वृद्धि हो गई वंही इसी योजना का नाम बेरोजगारी भत्ता की जगह स्वरोजगारी भत्ता रख दिया जाता तो परिणाम ठीक इसके विपरीत देखने को मिलते। भत्ता लेने की चाह रखने वाले युवा स्वरोजगार के लिये प्रेरित होते जिससे बेरोजगार युवकों के ग्राफ में बड़ी गिरावट देखने को मिलती। वोट बैंक के दलदल में निजी स्वार्थों को सिद्ध करने के लिये हमारे जिम्मेदारों द्वारा कब तक बेरोजगारी की समस्या को जीवित रखा जायेगा इस सवाल का जवाब इंतजार करने पर ही मिल सकता है।

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