मुंबई के कोली समाज से ज़मीन छीनकर बनाया जा रहा है मनोरंजन पार्क

Posted by Abhay Pandey in Hindi, Society, Staff Picks
March 19, 2017

कौन होते हैं कोली ?

कोली प्रजाति के लोग, महाराष्ट्र , गुजरात, आंध्र प्रदेश और भारत के कई हिस्सों में बसे हुए हैं। महाराष्ट्र में बसे कोली जनजाति के लोग क्रिस्चन या हिन्दू धर्म के हैं। वे मराठी भाषा से मिलती हुई कोली भाषा बोलते हैं। कोली प्रजा में , कोली, मंगला कोली , वैती कोली, क्रिस्चन , महादेऊ कोली और सूर्यवंशी हैं।

मछुआरों के देवी के नाम पर ही मुंबई का नाम है। मुंबा देवी के नाम पर ही मुंबई रखा गया है। जिसे देश की आर्थिक राजधानी के नाम से जाना जाता है। और इसे स्वपन का शहर भी कहा जाता है।

हालत से परिचय

मुंबई के कोली की हालत वही है जो देश के किसान की! जहाँ देश के किसान अपनी उगाई फसल से दूर हो रहे है ,वही मुंबई के कोली अपनी मछली से दूर हो रहा है। मछली कोली(मुंबई) के जीवन वो एक ऐसा हिस्सा जिसके बिना वो जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते । आज वो मछली से दूर होते जा रहे हैं , लगातार होते निर्माण और शहर के कचरे ने उन्हें मछलियों से दूर कर दिया। इन्हें भी अब किसानी की तरह मछली पकड़ना भी घाटे का सौदा लगने लगा है। जैसे अब किसान अपने बच्चो को किसान नहीं बनाना चाहता वैसे अब कोली नहीं चाहता की उसका बच्चा इसमें आये।

आस पास जो मछलियां हुआ करती हैं अब उन्हें “विकास ” ने मार डाला । जब से, महाराष्ट्र सरकार ने जून 2009 में, बांद्रा वर्ली सी लिंक खोल दी, शहर में इस बड़े ढांचागत परिवर्तन से निश्चित रूप से लाभ हुआ है। लेकिन माहिम में कोली समुदाय मछली पकड़ने के व्यवसाय को बनाए रखने के लिए चिंता में पड़ गए ।

मछुआरों को समुद्र के पास मछली पकड़ना मुश्किल लग रहा है और उन्हें अब आगे समुद्र में जाना पड़ता है। समुद्र लिंक प्रत्येक दिन 40,808 वाहनों को सफर पूरा करता है। समुद्र के लिंक पर वाहनों का शोर मछली को डराता है, जो अनिच्छा से उन्हें पुल के दूसरी तरफ ड्राइव करता है पुल के दूसरी तरफ की यात्रा लंबी है, और मछुआरों को उच्च डीजल लागत, समय और समुद्र में कोई पकड़ नहीं होने की संभावना का सामना करना पड़ता है।

दोनों को रसूखवालों ने मारा

एक तरफ बड़े ज़मीनदार तो दूसरी तरफ बड़े – बड़े ट्रोलर। किसानों को जहाँ आज बड़े – बड़े ज़मीनदारों पर निर्भर होना पड़ता है, वहीं कोली मछलियों के लिए इन्ही ट्रोलर पर निर्भर हो गए हैं। जहां एक ओर सरकारों के लाभ ज़मीनदारों को मिलते हैं वही दूसरी ओर भी यही हाल है। जहां बड़े ट्रोलर अपने जाल में दावा लगा कर सब मछली पकड़ लेते हैं वही स्थानीय समुदाय के लोग इनका मुकाबला नही कर पा रहे हैं। ट्रोलर को यहां के लोग बड़े मगरमच्छ बोलते हैं।

आधुनिकता के मारे..

हम लगातार सुनते आ रहे हैं कि किसानों की ज़मीनों पर अधिग्रहण बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। कुछ यही हाल इस समुदाय का भी है । सरकारों और बिल्डरों की नज़र अब कोली समाज की ज़मीन पर आ गई है इसका बड़ा कारण है कि ये समुदाय समंदर के किनारे रहता है। मछली पकड़ने के मैदान पर अतिक्रमण करने के बाद, अब सरकार गांवों पर कब्जा करना चाहती है। यहां एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के लिए पांच मछली पकड़ने / कृषि गांवों से भूमि अधिग्रहण करने की योजना है जहां एस्सेल समूह द्वारा संचालित एक मनोरंजन पार्क बनाया जाएगा।

ये बात गोराई की है, ऐसा ही लगभग सब जगह हो रहा है। ‘खार’ के कोली तो इतने डरे हुए हैं कि वो किसी बाहर वाले को देख डर जाते है कि कहीं उसकी नज़र उसकी जमींन पर न हो।
समुदाय के लोगों ने बताया- “अमीर हमारी भूमि को हथियाने के बाद अमीर बन रहे हैं, लेकिन हम भूखे होने जा रहे हैं ।”

मनोरंजन पार्क, हाई स्पीड ब्रिज, प्रदूषण – यह मुंबई के अभिजात वर्ग के लिए जीवन है। और ये समुदाय अभिजात की जीवन शैली के नतीजों से पीड़ित हैं। मुंबई के शहरी नियोजकों के सपने मुंबई के मछुआरों और अन्य वंचित समुदायों के लिए दुःस्वप्न में बदल रहे हैं

सरकार के कदम

सरकार ने इतने कठोर कदम उठाये कि उन कदमों के नीचे कोली ही दब गए जैसे किसान दबे हैं। सरकार ने कोली को डीज़ल पर कुछ रियायत तो दी लेकिन वो पहेले कोटा (जैसे दिल्ली में राशन की दुकान) को मिलती है जो इनको देती है , सरकार की सब्सिडी 30 रुपए तक है लेकिन मिलती 1 या 2 रुपये है कभी-कभी पूरी भी मिलती है।

दूसरी बात बिमा की। सरकार बिमा देती है बोट के लिए लेकिन कोली को सबसे ज्यादा नुकसान उसके जाल चोरी या खराब होने से होता है ।

इस पर एक कोली की कुछ बात “हम हमेशा कठोर लोग रहे हैं हम मरने के लिए तैयार समुद्र में जाते हैं, किसानों के विपरीत, हम आत्महत्या नहीं करते लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारी दुर्दशा किसी भी बेहतर है। हम भी ऋण में हैं और बमुश्किल जीवित रहने के लिए प्रबंध करते हैं। लेकिन सरकार नोटिस नहीं लेती। वे हमारे लिए किसी भी योजना की घोषणा नहीं करते हैं वास्तव में, उनकी परियोजनाएं हमारे लिए चीजें बदतर करती हैं”

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