मेनका जी, आप हमारी आदर्श भी हो सकती थीं!

Editor’s note: ये लेख हमें  Youth Ki Awaaz के इस हफ्ते के विषय #WomensDay के तहत मिला है। मकसद है एक बहस शुरु करना कि हम समाज में कैसे लिंग आधारित समानता/जेंडर इक्वॉलिटी ला सकते हैं। अगर आप भी लिंग आधारित हिंसा, लिंग आधारित भेदभावपूर्ण टिप्पणियाें के शिकार हुई/हुए हैं और चाहती/चाहते हैं किसी पॉलिसी में बदलाव आए या परिवार, दोस्तों, दफ्तरों में कैसे लिंग आधारित भेदभाव को रोका जा सकता है, इसपर है कोई सुझाव तो हमें लिखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

बाल विकास एवं परिवार कल्याण मंत्री मेनका गांधी के ‘हार्मोनल आउटबर्स्ट’ वाले बयान के बाद उनका सोशल मीडिया पर जमकर विरोध किया जा रहा है। इसी विरोध के चलते आज यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘पिंजड़ा तोड़ अभियान’ से जुड़ी छात्राओं ने दिल्ली में एक मार्च निकाला। वे महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के उस बयान का विरोध कर रही हैं, जिसमें उन्होंने लड़कियों की सुरक्षा के लिए एक ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचे जाने की ज़रूरत बताई थी। यही नहीं, दिल्ली यूनिवर्सिटी में लड़कियों को हॉस्टलों में शाम के बाद बाहर निकलने देने के लिए मुहिम चला रही पिंजड़ा तोड़ अभियान की एक सदस्य ने केंद्रीय मंत्री को ये चिट्ठी लिखी है-

प्रिय मेनका गांधी जी,

मीडिया और समाज को दी गई आपकी नसीहत के लिए मन से एक ही आवाज़ निकलती है, मोहतरमा, अख़बार खोलिए या गूगल कीजिए- ‘वीमेन स्टूडेंट प्रोटेस्ट’। आपके ख़्यालों पर अनेक भाषाओं में सैकड़ों छात्राओं की विस्तृत टिप्पणी आपको अपने आप ही मिल जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दो-तीन दिन पहले टीवी, अख़बारों और फ़ेसबुक पर, कहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी के आंदोलन में महिलाओं के बड़े तबके की भागीदारी की तस्वीरें थीं, तो कहीं मुंबई यूनिवर्सिटी में आंदोलन की मांगें पूरी होने पर छात्राओं के संघर्ष में एकजुटता भरे पोस्ट। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में छात्राओं का चल रहा आंदोलन भी बुलंद खड़ा है। इस महिला दिवस की तैयारी हम इस उत्साह से कर रहे थे कि महिलाओं की आज़ादी और नारीवादी सोच के तर्क-वितर्कों की रेखा में थोड़ा ही सही, परिवर्तन तो आया।

 तभी आपके बयान ने हमें जैसे बचपन की रामायण की कहानियों में फिर धकेल दिया, जहां कोई हमें ‘लक्ष्मण रेखा’ का हवाला देकर हमारे दायरे और उनका महत्व समझा रहा हो। आपके बयान ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि इन आंशिक सफलताओं के बावजूद हम अब भी एक जाति और वर्ग विभाजित पितृसत्तात्मक समाज में जी रहे हैं, जहां लोगों की सोच, अधिकार और आज़ादी के पहरेदार सरकार में ही बैठे हैं।

आप जिस सरकार की महिला और बाल कल्याण विकास मंत्री हैं, वो महिला सशक्तिकरण, सेल्फी विद डॉटर और मेक इन इंडिया जैसे कैंपेन के ज़रिए महिलाओं के विकास की बात करती है। आपका बयान इस विकास को बख़ूबी परिभाषित करता है। मंत्री महोदया, हमारे ग़ुस्से के पीछे हमारे हारमोन्स नहीं बल्कि आपकी भेदभावपूर्ण सोच है, जो आज शहर-शहर में छात्राओं को संघर्ष के रास्ते पर उतरने को मज़बूर कर रही है। साथ ही लक्ष्मण रेखा खींच कर, नस्ल की शुद्धता बरक़रार रखने की चिंता को आप शांत कर लें, क्योंकि छात्राओं के आंदोलनों के साथ ही दलित छात्र-छात्राओं का आंदोलन भी कॉलेज-दर-कॉलेज ज़ोर पकड़ रहा है और इन आंदोलनों के बीच बातचीत भी।

 रही बात ‘सुरक्षा’ की। सड़कें तो तब सुरक्षित होती हैं जब ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं सड़कों पर होती हैं। जब उन पर अंधेरा नहीं स्ट्रीट लाइट्स होती हैं, न कि तब जब यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली महिलाओं को हॉस्टल प्रशासन और पीजी ओनर्स, सड़कों को असुरक्षित बता कर क़ैद कर लें। फिर जो चंद महिलाएं बचें उनके लिए ऐसा माहौल बना दें कि वे अपनी आज़ादी का दावा करके भी उसे अपना नहीं पाएं।

एक बात तो आपने ठीक कही पर बहुत ख़राब ढंग से कही। आपने कहा, “महिलाओं की सुरक्षा दो बिहारी सिक्योरिटी गार्ड के डंडों पर नहीं छोड़ी जा सकती।” हां सच है, दो या बीस बिहारी हों, तमिल हों, पंजाबी हों, आपकी अपनी दिल्ली के हों या आपके ‘अपने देश भारत’ के किसी राज्य के हों। उनको गेट पर खड़ा करने से आज़ादी नहीं मिलेगी, न ही महिलाओं को क़ैद करने से। मगर आपकी ये असम्मानजनक टिप्पणी दर्शाती है कि न ही आप छात्राओं की इज्ज़त करती हैं, न ही देश में आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों की, न ही मेहनत करने वाले लोगों की।

यूनिवर्सिटी में कार्यरत मज़दूर प्रशासन द्वारा बार-बार छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ खड़े किये जाते हैं। किंतु दरअसल वह भी हमारी तरह आपके विभेदकारी तंत्र के भुक्तभोगी हैं। हमारी कॉलेज-हॉस्टल की बढ़ती फ़ीस हो या उनके घटते वेतन, यह आपकी सरकार द्वारा शिक्षा के बजट में की गई कटौती के ही परिणाम हैं।

अभी तक तो आठ मार्च को आप लोग महिलाओं को छुट्टी देकर, फूलों के गुलदस्ते देकर, कम से कम एक दिन नाममात्र उन्हें ‘सम्मान’ देने की बात करते थे। पर अब शायद आपकी सोच आप ही की बनाई ‘लक्ष्मण रेखा’ के अंदर अटक गई है।

याद रखिएगा जिस यूनिवर्सिटी में महिलाओं के लिए यह रूढ़िवादी क़ानून आप बना रही हैं, इनकी नींव ही जाति, वर्ग व्यवस्थित और पितृसत्तात्मक समाज को दी गई सावित्री बाई की चुनौती में पड़ी है। शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी ऐसी तगड़ी संघर्षरत नींव पर बढ़ रही इमारत है। आपकी संकीर्ण सोच के पिंजड़े इसे क़ैद नहीं कर सकेंगे। आप जो कहिए, जो करिए, हम तो ये पिंजड़े तोड़ेंगे, इतिहास की धारा मोड़ेंगे!

वहीं दूसरी तरफ, केरल के एक नर्सिंग कॉलेज ने हॉस्टल की लड़कियों के लिए एक फरमान जारी किया है।  इस अजीबोगरीब फरमान के अनुसार, लड़कियां अपने रूम के दरवाजे बंद न करें, उस वक्त भी नहीं “जब वो कपड़े बदल रही हों”। अब इस आदेश के पीछे दिया गया तर्क हैरान करने वाला है. कॉलेज प्रिंसिपल प्रिंसिपल एमपी. जेस्सीकट्टी कहती हैं कि लड़कियों के कमरे के दरवाजे बंद होने की वजह से होमोसेक्सुअलिटी की प्रवृत्ति बढ़ती है।

यही नहीं, छात्राओं को शाम में बाहर निकलने पर रोक लगनी चाहिए, उन्हें कपड़े ढंग के पहनने चाहिए और अब कमरे का दरवाजा भी बंद नहीं करना है। हॉस्टल में लडकियां मोबाइल फोन पर छुप कर बात करती हैं और इससे आपस में ‘होमोसेक्सुअलिटी’ जैसी चीजें भी बढ़ सकती हैं। प्रिंसिपल लड़कियों की पर्सनल डायरी चेक करती हैं और इसे पूरे क्लास के सामने जोर-जोर से पढ़ती भी हैं। कॉलेज में मोबाइल फोन बैन है। कॉलेज की लाइब्रेरी में इंटरनेट की सुविधा नहीं दी गई है। इस पर भी वैसा ही दिलचस्प तर्क दिया गया है कि, इंटरनेट मिलेगा तो लड़कियां सिर्फ पॉर्न देखेंगी।

ताज्जुब की बात यह है कि छात्राओं द्वारा लगातार किये जा रहे प्रोटेस्ट को कॉलेज प्रशासन द्वारा अनदेखा किया जा रहा है। इस नर्सिंग कॉलेज को उपासना चैरीटेबल सोसायटी के द्वारा चलाया जाता है, जो एक अरबपति बिजनेसमैन रवि पिल्लई का है।

दरअसल, हमारे समाज की पुरुषवादी विचारधारा रखने वाली यह महिलाएं हैं, जिनकी कुंठा और तानाशाही का ठीकरा अंततः महिलाओं पर ही आकर फूटता है। इसका इन्हें पीढ़ियों का अभ्यास है। इन महिलाओं की छिछली सोच, सरकार का नकारात्मक रवैया और कानून का कमज़ोर होना महिलाओं के बढ़ते कदमों को एक बार में कई गुना पीछे धकेल देता है।

महिला दिवस के दिन सड़कों पर उतरी इन लड़कियों, कॉलेज के बाहर धरना देती छात्राओं और कॉलेज प्रशासन से अपने हक की लड़ाई लड़ती तमाम लड़कियों के लिए मेनका गांधी एक आदर्श बन सकती थी। लेकिन उन्होंने संघर्षरत महिलाओं का साथ देने से बेहतर एक तानाशाह, आक्रामक और क्रूर नेता होना स्वीकार किया जो अपनी कायर सरकार की तरह ही कायर है।

 

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