मोमबत्ती पर 10 रूपए खर्च करने से अच्छा है पहले ही उस हाथ को थामा जाए जिसके लिए बाद में मोमबत्ती जलानी पड़ती है.….

Posted by Shippra Mishra
March 15, 2017

Self-Published

“हमें महिलाओं का सम्मान करना चाहिए, उनके बालिदानो का आभारी होना चाहिए हमें, उनकी इज़्ज़त करनी चाहिए” अभी कुछ ही दिन पहले पूरी दुनिया में ये नारे गूंजते हुए नज़र आ रहे थे. क्योंकि हमारे इस समाज में हर त्यौहार को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है तो उस दिन भी एक त्यौहार ही था“वीमेन’स डे” नाम का जिस दिन औरतों की पूजा की जाती है उसे देवी का अवतार कहा जाता है. उनकी वीरताओं की कहानी सुनाई जाती है, उनके स्वाभिमान को ऊँचा रखने के लिए कवितायें कही जाती है.

दिन बीतते ही त्यौहार को कैसे भूला दिया जाता है इसका उदाहरण हम दिल्ली में हुए हाल ही की एक दुर्घटना के ज़रिये देख सकते है. “जहा 8 मार्च को महिलाओं के सवावलंबी होने, उनकी हिम्मती होने और परिस्थियों से लड़ने के जज़्बे की वाह वाही करते नहीं थक रहे थे वही उसके कुछ दिनों बाद ही एक नेपाली लड़की अपनी आबरू बचाने के लिए निरवस्त्र ही छत से कूद गयी और तब वो लोग जो महिला दिवस के उपलक्ष में महिलाओं के रक्षक होने का दावा कर रहे थे उन लोगों से मदद की गुहार करने लगी किंतु किसी ने तन ढकने के लिए रूमाल तक नहीं दिया. उलटे उसके नग्न हालातों का वीडियो बनाते हुए नज़र आये.

नारी सम्मान की बातें जो हम महिला दिवस पर करते है क्या वो सिर्फ उसी क्षण के लिए होती है…या वो लड़की भारतीय नहीं थी इसिलए हम उसकी मदद करना नहीं चाहते थे…अगर ऐसा है तो धिक्कार है ऐसी कथित इंसानियत पर…वजह चाहे जो हो पर इस दुर्घटना से ये तो स्पष्ट हुआ कि 8 मार्च सिर्फ एक त्यौहार की तरह हमारे जीवन में आता जाता है जिसका दिन खत्म होते ही महत्व भी खत्म हो जाता है. फिर पूरे साल वही हालात रहते है.

कहानी यहीं खत्म नहीं होती जब अक्सर ऐसी घटनाओं में वो लड़की बेरहमी से अपना दम तोड़ दे या बच भी जाये तो हमारे समाज के कथित शुभचिंतको की टोली हाथों में मोमबत्तियां लिए निकल पड़ती है, फिर पूरे विश्व में “इन्साफ दो” “वी वांट जस्टिस” के नारे गूंजते है..

आरोपी को सज़ा मिले भी तो क्या सिर्फ वही आरोपी है जिसने बलात्कार किया है….. जी नहीं!!!!! ज़रा गौर करिएगा वो सभी लोग जो तमाशा देखते है, तड़पता गिड़गिड़ाता देख कर कन्नी काट लेते है वो भी अपराधी है, वो अपनी नज़रों से इंसानियत का बलात्कार करते है.

जनता की जिस एकता से कानून और सरकार भी डगमगा जाती है, वही एकता उन पाखंडियों को उनकी सीमा में क्यूँ नहीं बांध सकती, क्यों हम जुर्म होने का इंतज़ार करते है??? क्यों नहीं उसी समय हम अपने हिस्से की इंसानियत दिखाते हुए मदद का हाथ बढ़ाते है.

इस दुर्घटना में लड़की के साथ लड़ना तो दूर उस पर किसी ने दया भी नहीं दिखाई…बहुत बड़ी गलती हुई उससे चंद लोगो से आबरू बचाने चली थी इंसानियत के भरोसे, पर उसी समाज में उसकी आबरू को तार तार कर दिया गया उसकी मदद न करके.

“पिंक” जैसी फिल्मों को देख कर हम उन लड़को पर गुस्सा तो दिखाते है, पर अमिताभ बच्चन के द्वारा निभाए किरदार पर गौर नहीं करते जिस तरह उन्होंने बिना मदद मांगे उन लड़कियों की मदद की थी. समाज में औरत की स्तिथि सिर्फ कह देने से बेहतर नहीं होती है इसके लिए बदलाव की ज़रूरत है. पर बड़े अफ़सोस की बात है यह बदलाव के लिए हम दूसरे घरों से शुरुआत होने की आशा लिए बैठे रहते है.

मोमबत्ती पर 10 रूपए खर्च करने से अच्छा है पहले ही उस हाथ को थामा जाए जिसके लिए बाद में मोमबत्ती जलानी पड़ती है.….

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