राजनीतिक दलों के द्वारा सवालों की हत्या एक सोची-समझी साज़िश है

इसे न सिर्फ नैसर्गिक रूप से समाज के भीतर स्वीकार्यता प्राप्त है बल्कि यह एक विडंबना भी है। हमारे देश के भीतर जब किसी भी समाजिक सरोकारिता के मुद्दे को विमर्श के परिधी में लाने की कोशिश की जाती है तो कुछ विशेष नर-मुंडों के द्वारा उसे अन्य परिघटना के तुलनात्मकता की तराजू पर रख कर तौलने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसी कृत्रिम संयोग स्थापित करने के पीछे मंतव्य भी बिलकुल स्पष्ट होता है कि पूछने वाले को उस विमर्श की परिधी से बाहर निकालकर यह जता दिया जाए कि महाशय आप प्रश्न करने योग्य नहीं है क्योंकि हमारी कमीज़ आपके कमीज़ से कम मैली है। इस तर्क के साथ उस व्यक्ति को जबरन किसी राजनीतिक दल के दल-दलीय विचारधारा में डुबा दिया जाता है और विमर्श को अप्रासंगिक बना कर अनुचित ठहरा दिया जाता है।

मसलन हर सवाल और विमर्श के उत्तरीय निष्कर्ष को उदहारण स्वरूपी असला के साथ अपनी बात समझाने की कोशिश की जाती है। धीरे-धीरे वह उदाहरण रूपी मसला औजार बनता जाता है। लिहाज़ा आपको सनद रहे कि उदहारणों का प्रयोग जब औजार के रूप में होने लगे तो नागरिकों को सचेत होकर ऐसे लोगों से मुखालफत करनी चाहिए,क्योंकि यह सिर्फ घातक ही नहीं अनुचित भी है। खैर अब आइए आपको एक हालिया प्रयोग किए गये उदहारण को याद दिलाने की कोशिश करता हूँ।

वर्ष 2016 के 8 नवम्बर को पाँच सौ और हज़ार के नोटबंदी का फरमान आया। इस फरमान की जमकर आलोचना,समालोचना और विवेचना भी हुई। और लोकतंत्र की खूबसूरती भी इन्हीं तीनों से संवरती है। किन्तु उदाहरणों की बाढ़ आ गई। किसी ने सैनिकों की मुश्किलों का उदाहरण देकर बैंकों के आगे भीड़ को धैर्य रखने का पाठ पढ़ाया,तो किसी ने आज़ादी की लड़ाई में शहीद हए लोगो से तुलना कर उदाहरण प्रस्तुत किया। कई लोगों ने नसीहत भी दिया कि कष्टों और संघर्षों से ही आज़ादी नसीब होती है। ऐसे अनेकों उदाहरण आपको हर विषय पर राजनैतिक धुरंधरों के द्वारा आए दिन सुनने को मिलेगा। ऐसे अनेकों हास्यास्पद उदाहरण मेरे पास मौजूद है लेकिन सबसे हालिया उदहारण यही है। क्योंकि हम तमाम भारतीयों में एक बड़ी दिक्कत है। हम पुरानी घटनाओं को जल्दी भूल जाते हैं और किसी अन्य मसलों पर जल्दी उकता जाते है।

खैर,मैं सेना का बहुत सम्मान करता हूँ और सेना का योगदान ही हमारे देश को अक्षुण और अखंड रखता है। मुझे पता है कि सेना का पूरा जीवन संघर्ष का होता है। बेशक उनके जीवन से संघर्षों की प्रेरणा लेनी चाहिए। लेकिन एक दुसरा पहलू भी है कि सेना का संघर्षशील जीवन ही उन्हें असैनिक नागरिकों से अलग भी करता है। उन्हें संघर्षों के मुश्किल हालात से जूझने के लिए कई तरह के प्रशिक्षण दिए जाते है,ताकि उनका मनोबल कम न हो,वे हमेशा उर्जावान रहे। लेकिन विचार करने योग्य यह भी है कि हमारे समाज की आम हक़ीकत क्या है ? क्या हमारे असैनिक नागरिकों को किसी प्रकार के प्रशिक्षण दिए जाते है मानवीय और प्राकृतिक आपदा से संघर्ष करने के लिए है ? एक साधारण नागरिक को सड़क पर सही से चलने तक के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है तो वे विषम परिस्थितियों में संयम कहाँ से बरतेंगे।

सबसे ज्यादा पीड़ा तो तब होती है जब किसी भयावह आपदा आम जन पर गिरती है और प्रतिनिधित्व सेवक सिवाय संवेदना और बक्शीश के कुछ नहीं देते। मुखरता के साथ कहना होगा कि हमें संवेदना नहीं चाहिए बल्कि हमारे सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाए ताकि हमें संवेदनहीन संवेदना की दरकार न रहे। क्योंकि आपके संवेदना से कानपुर ट्रेन दुर्घटना में 100 से ज्यादा मरे नागरिकों को क्या अपने खुशहाल परिवार से मिला पाएँगे। ऐसे अनेकों घटना मेरे ज़हन को कचोट रहा है। उस भयावह तस्वीर और परिणाम को लिखने में मेरी उँगलियाँ कांप रही है। हृदय की धड़कने तीव्र है। मन बहुत विचलित है।जब भी ऐसी घटना के बारे में सुनता हूँ तो पूरी रात तनाव से आँखें तनी रहती है। कई दिनों तक अनिद्रा का शिकार रहता हूँ।

मसलन आप पिछले 20 बरसों का या उससे ज्यादा के हताहत की घटना को याद करें,ज्यादातर हादसा संयम खोने से ही हुआ है और हज़ारों के तादात में लोग मौत के मुंह में समा गये। बहरहाल अब मेरा प्रश्न उन तथाकथित उदाहरण और तुलना करने वाले लोगों से है कि आखिर कष्ट और संघर्ष हमेशा आम लोगों के हिस्से ही क्यों आता है ? नेता,बड़े अफसर,बड़े व्यवसायी संघर्षों से दो-दो हाथ करते क्यों नहीं नजर आते है ? उदाहरणों का प्रयोग ज्यादातर तथ्यों को छिपाने के लिए ही किया जाता है। संसाधन की अनुपलब्धता और हमारी कमजोर तैयारी को छिपाने के लिए उदाहरणों का प्रयोग कर आमलोगों के दिमाग पर पर्दा डाल दिया जाता है। इसलिए हमें अपने भीतर के मानसिक दुर्बलता और समाज के भीतर फैले तथाकथित कूप-मंडूकों से बिना किसी उदाहरण रूपी औजार का शिकार बनें स्वयं को संरक्षित रखना पड़ेगा।

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