राष्ट्रवाद का सिमटता दायरा

Posted by Devendra Suthar
March 28, 2017

राष्ट्रवाद का सिमटता दायरा देश के लिए घातक राष्ट्र को उन्नति की दिशा में अग्रसर करने के लिए किसी भी राष्ट्र के नागरिकों के अंत:करण में राष्ट्रवाद के बीज का प्रस्फुटन होना स्वाभाविक क्रिया है। राष्ट्र के प्रति अगाध विश्वास और जमीन से जुड़ाव प्रतिस्थापित कराने वाला सेतु राष्ट्रवाद आधुनिक समय में बेहद ही संकीर्ण और संकुचित अर्थो में व्यक्त किया जाने लग गया है। यह कहे तो अतिश्योक्ति नहीं होंगी कि आज राष्ट्रवाद का दायरा केवल भारत माता की जय के जयघोष तक ही सिमट कर रह गया है। विशेष मौकों पर हमारी दबी राष्ट्र चेतना की चिंगारी सुगबुगा उठती है और फिर सालों के लिए ठंडे बस्ते में जाकर आराम फरमाती है। जब-जब हमारे भीतर का भारत मरा तब-तब हमारे मानचित्र हमारी मां कहे जाने वाली भूमि का विधर्मी शक्तियो के द्वारा कटाव हमें कई गहरे जख्म दे गया। अन्यथा क्या कारण है कि हमसे दो साल बाद आजाद हुआ चीन आज वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी प्रमुख दावेदारी के साथ खड़ा है और भारत आज भी आंतरिक व बाह्य समस्याओं से लडने को विवश है। जबकि भारत और चीन दोनों में ही खनिज भरा पड़ा है, फिर भी चीन इतना आगे है और उसका मुख्य कारण सिर्फ एक ही है और वो है चीन का राष्ट्रवादी देश होना और भारत का सेक्युलर देश होना। चीन में आप चीन मुर्दाबाद कह कर देखें, देखते ही गोली मारने का निर्देश है। चीन में आप दुश्मन देश का झंडा फहराये, इस्लाम के नारे लगाये , सीधे गोली खाएंगे और भारत में जमकर पाकिस्तान के झंडे फहराये, भारत मुर्दाबाद कहें, आईएसआईएस के झंडे लहराये, सेकुलरिज्म की सुरक्षा आपको प्राप्त हो जायेगी और सेक्युलर हीरो आप हो जायेंगे। चीन में क्या हुर्रियत हो सकता है, अलगाववादी हो सकते है, ऐसा वहां सोचा भी नहीं जा सकता और सेक्युलर भारत में ये सब मुमकिन है। असल मायनो में भारत चीन के सामने एक भूखा नंगा देश बनकर रह गया है और उसका एक ही कारण है और वो है सेक्युलर भारत, जहाँ सेकुलरिज्म के नाम पर आतंक भी जायज है। भविष्य में सेक्युलर भारत का कोई अस्तित्व नहीं है, 1947 के जैसे कई टुकड़े होंगे सेक्युलर भारत के जबकि चीन दुनिया का सबसे ताकतवर देश 2020 तक हो जायेगा। भले आज वो जीडीपी दर हो या विकास दर‚ प्रति व्यक्ति आय हो या विदेशी मुद्रा भंडार‚ रक्षा बजट हो या निर्यात-आयत सब में चीन भारत को पीछे धकेलता जा रहा है। सैन्य शक्ति और विश्व की सबसे बड़ी आबादी के बूते धाक जमाने वाला चीन वैश्विक स्तर पर तीव्र गति से अमेरिका को वर्चस्वहीन करने की फिराक में है। लेकिन भारत आज भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए हाथ-पैर मार रहा है। हमें जापान जैसे देश से सीखना चाहिए जिसका भले ही क्षेत्रफल भारत के बिहार के बराबर हो पर राष्ट्र के प्रति जोश और रवानगी के साथ जीने की कला दुनिया के समस्त देशों के लिए आज मिसाल है। जापान में सबसे घटिया किस्म का चावल का उत्पादन होता है और अमेरिका में सबसे अच्छी गुणवक्ता वाला चावल का उत्पादन होता है। फिर भी जापानी लोगों को अमेरिका से चावल खरीदना मंजूर नहीं है। जिसका कारण अमेरिका द्वारा नागासाकी और हिरोशिमा पर किया गया परमाणु बम हमला। भले ही मरना कबूल पर शत्रु देश की गरज करना जापान के सिद्धांतों से परे है। अब भारत को सोचना है उसकी अति उदारवादी और हद से अधिक सहनशीलता भविष्य के लिए खतरा तो मौल नहीं ले रही है ? अतेएव आज भारत को बचाना है तो सेकुलरिज्म को मिटाना होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर धर्मांतरण देशद्रोही ही पैदा करता है