हमारे मुँह पर ताली पीट-पीट कर नाचती है “अनारकली ऑफ़ आरा”

कल बहुत दिन बाद थिएटर में गया, अनारकली ऑफ़ आरा देखने। अमूमन मैं लैपटॉप पर ही फिल्में देख लेता हूँ। शायद आखरी फिल्म जो थिएटर में देखी थी वो चैतन्य की ‘कोर्ट’ थी और उससे पहले ‘मसान’ देखी थी। ये सब इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मैं कुछ सालों से बहुत कम हिंदी फिल्में देखता हूँ। मुझे लगता है कि उसमें सिखने के लिए बहुत कम होता है।

बहुत ही अच्छी कहानी और बहुत ही लोकल तरीके से गढ़ा गया एक संगीतमय सिनेमा। अनारकली ऑफ़ आरा के स्क्रीनप्ले को उसका संगीत ही आगे बढ़ाते हुए उसके अंत तक ले जाती है। अनार की माँ जब स्टेज पर पहला सुर छेड़ती है वो उसकी शुरुआत, अनारकली जब टेप रिकॉर्डर में कैसेट लगाकर रेखा भारद्वाज का गाना प्ले करती है वो मेरे लिए मध्यांतर और जब अनारकली वीसी साहब के आगे ताली बजा-बजा कर ऊँचे सुर में हुंकार भरती है वो मेरे लिए क्लाइमैक्स था।

संगीत का ऐसा मजबूत प्रयोग बहुत कम देखने को मिलता है। अनारकली एक विशुद्ध भारतीय सिनेमा है जो भारत के उस समाज की कहानी कहता है जहाँ फ्यूडलिटी, पैट्रिआर्कि, पूंजी और ह्यूमर के बीच एक विद्रोही मन हरपल अपने पूरे वजूद में नज़र आता है। ये फिल्म इन सबको अपने साथ लेकर आगे बढ़ता है और अंत तक उसी की कहानी कहता है।

फिल्म का क्लाइमेक्स वैसा है जैसे कोई साज अपने क्रेसेंडो पर हो। फिल्म के अंत में स्वरा उसी क्रेसेंडो पर हैं। कमाल का क्लाइमेक्स !! हिरामन जब रोता है तो हमें भी थोड़ा रुला देता है। जब अनार हिरामन का हाथ पहली बार छूती है उसपे हिरामन की प्रतिक्रिया ठीक वैसी होती है जैसे अनार ने मुझे छू लिया हो। हिरामन जैसी ही प्रतिक्रिया हम भी अपने अंदर महसूस करते हैं। यहीं अनार हम सबको अपने साथ जोड़ लेती है और अब हम सब उसकी लड़ाई में उसके साथ हो जाते हैं। अब अनारकली के साथ हम भी वीसी साहब से बदला लेना चाहते हैं उन्हें पराजित होते हुए देखना चाहते हैं ।

यही इस फिल्म की सफलता है। जब किसी फिल्म के सेंट्रल कैरेक्टर की डिजायर आपकी डिजायर हो जाए तो समझ लीजिए कि वो फिल्म अपनी बात कहने में सफल हो गई है। अविनाश अनारकली के बहाने हम सबको अपने साथ जोड़ लेते हैं ।

फिल्म के सेट पर स्वरा भास्कर और अविनाश दास

स्वरा ने कमाल का काम किया है। अभिनय के मामले में इस फिल्म का कोई जवाब नहीं। कैमरा थोड़ा और बेहतर हो सकता था। इस फिल्म के क्लाइमेक्स को बार-बार देखने को मन करता है। क्लाइमैक्स पर आकर सबकुछ अपने पूरे वजूद के साथ मौजूद है। क्लाइमैक्स मे एक सिनेमा के सारे एलिमेंट्स अपने पूरे परफेक्शन के साथ है। और जब आप बाहर निकलतें हैं तो वो परफेक्शन आपके साथ बाहर निकलता है ।

जब अविनाश सर की फिल्म देखने जा रहा था तो वो एक उत्सव की तरह था। अनारकली ऑफ़ आरा बस एक फिल्म नहीं थी। वो किसी का सपना, किसी का संघर्ष और मेरे लिए एक लंबे इंतज़ार की तरह था। अविनाश दास को एक लंबे समय से जानता हूं। उनसे बहुत कुछ सीखा है । बहुत कुछ सुना है। उनकी यात्रा मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है। मेरे लिए अनारकली ऑफ़ आरा ऐसा था मानो जैसे मैं परदे पर खुद अविनाश सर से मिलने और उन्हें ही देखने जा रहा था।

अनारकली ऑफ की पूरी टीम को इस सफलता के लिए बधाई।

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