“दहेज लेने वालों महिला सम्मान की बात मत करो”

Posted by Ashutosh Jha in Dowry, Feminism, Hindi
March 9, 2017

बहुत हद तक ये इंसानी फितरत है कि किसी सफलता का श्रेय हम अक्सर अकेले लेना चाहते हैं। और इस दौरान भूल जाते हैं उनको जिनकी ज़बरदस्त मदद और त्याग से हम कामयाबी की परिभाषा में खुद को फिट पाते हैं। मेरी नज़र में किसी भी इंसान के जीवन में चाहे वो कोई भी काम कर रहा हो जिस भी मकाम तक पहुंचा हो, महिलाओं का ज़बरदस्त योगदान होता है। पहले मां के रूप में फिर बहन, प्रेमिका या पत्नी किसी भी रूप में।

जिस महिला विरोधी समाज की हमने संरचना की है, उसमें महिलाओं की दिनचर्या में शामिल संघर्ष की बात तो हम कर सकते हैं, उसपर ज्ञान भी वाच सकते हैं लेकिन शायद उसे पुरुष होकर समझ पाना नामुमकिन सा लगता है। विपरीत लिंग का सम्मान करने में जैसे पुरुष समाज काफी पीछे रह गया है। ये हमारे समाज की विडंबना ही है कि नारी शिक्षा अभी भी एक मुद्दा है। और सदियों  तक महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखकर इसे मुद्दा बनाया है पुरुष समाज ने। मुझे याद है उस बेबस पिता का जवाब जब उनसे ये पूछा गया कि “आप अपनी बेटी को पढ़ाते लिखते क्यों नहीं हो ताकि वो काबिल और आत्म निर्भर बन सके..”
उनका जवाब था …

बेटवा.. अगर अभिये सब पैसा पढ़ाई में खर्च कर देम तो लईकी के शादी में का करम..जमाना बड़ा ख़राब है हो बिना पैसा के कुछु ना होवत है…

तब समझ में आया की नारी प्रगति को रोकने का सबसे बड़ा श्रेय हम सबको जाता है। वो कैसे?
तो एक जवाब है जनाब .. दहेज रूपी दानव का साथ देकर.. यही वो दानव है जिसकी काफी अहम् भूमिका है भ्रूण हत्या में, नारी अशिक्षा में बाल विवाह में।

अगर हम पूरे ज़ोर-शोर से इसका विरोध करें तभी इसे कम किया जा सकता है, मैं जड़ से खत्म होने का दावा इतनी जल्दी तो नहीं कर सकता। और हां, अगर ये समस्या खत्म हो गयी तो यकीन मानिये महिलाओं के शिक्षा का स्तर एक नए आयाम पर होगा। यकीन ना हो तो बोर्ड एग्ज़ाम्स के नतीजों को कंपेयर करके देख लीजिए। सिर्फ भारत ही नहीं ग्लोबली।

एक और दकियानूसी रिवाज़ है शादियों में मोटी रकम खर्च करने की। हालांकि ये समझ से परे है कि दो लोगों की शादी में इतने लोगों को दिखावे की क्या ज़रूरत है। खैर ये भी एक काल्पनिक दुनिया जैसी बात होगी अगर मैं कहूं कि उन पैसों से किसी गरीब की पढ़ाई का खर्च उठा सकते हैं आप। लेकिन यकीन मानिये उसके बाद जो ख़ुशी मिलेगी, उसका कोई ज़ोर नहीं होगा।

हालांकि भूस की ढेरी में राई के दाने की तरह ही सही नारियों की स्थिति सुदृढ़ भी हो रही है। हाल में ही सऊदी अरब के एक बड़े शेख़ साहब से बात करने का मौका मिला और ये जान के ख़ुशी हुई कि वो नारी शिक्षा , उनके काम करने और प्रगति के बारे में सोच ही नहीं बल्कि उसपर अमल भी कर रहे हैं।

हमारा उद्देश्य पिछड़ों को प्रेरित करना और बढ़ावा देना होना चाहिए। चाहे वो पुरुष हों या महिला। अगर महिला सक्षम हैं तो उन्हें भी दोनों समुदाय की प्रगति की सोच रखनी चाहिए।

काफी अच्छी पंक्तिया पढ़ी थी कहीं मैंने, उम्मीद करता हूँ ये आपके उत्साह को बढ़ावा दे।

नारी तुम प्रेम हो, आस्था हो, विश्वास हो,
टूटी हुई उम्मीदों की एकमात्र आस हो,
हर जन का तुम्हीं तो आधार हो,
नफ़रत की दुनिया में मात्र तुम्हीं प्यार हो,
उठो अपने अस्तित्त्व को संभालो,
केवल एक दिन ही नहीं,
हर दिन नारी दिवस बना लो।

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