“हाउ मच क्लीवेज इज़ गुड?”

Posted by Siddhartha Shukla in Cake, Hindi, Media, Society
March 20, 2017

पिछले दिनों अभिनेत्रियों स्वरा भास्कर और तापसी पन्नू का एक वीडियो आया “हाउ मच क्लीवेज इज़ गुड”। कुछ महीनों पहले एक महिला ने आरोप लगाया कि उसे एक अमेरिकी एयरलाइन के जहाज से इसलिए उतार दिया गया क्योंकि उसका क्लीवेज बहुत ज़्यादा दिख रहा था। ढेरों आर्टिकल्स और लेख लिखे गए जहां महिलाओं ने शिकायत की, कि कुछ पुरुष उनके क्लीवेज को गंदी नज़र से देखते हैं। ट्विटर पर #FreeTheCleavage नाम से एक हैशटैग भी चलाया गया। हर रोज़ ढेरों वीडियोज़, तस्वीरें और आर्टिकल्स आते हैं जो ये कहते हैं कि महिलाएं समाज का एक प्रताड़ित वर्ग हैं।

संस्कृति नारीवाद और आधुनिकता पर छिड़ी तमाम बहसों में हम टीनएजर्स को बड़ी समस्या होती है। हम अक्सर कंफुजियाए रहते हैं कि हमारे परिवार वालों की संस्कृति-सभ्यता वाली बातें सही हैं या फिर सोशल मीडिया और मीडिया पर चल रही आधुनिकता की मुहिम। दोनों ऐसे तर्क देते हैं कि हम खुद की एक स्वस्थ मानसिकता नहीं बना पाते।

एक बच्चा जो भी सीखता है वो अपने आस-पास से ही सीखता है। एक फ़िल्म देख रहा था… एक बहुत ही आकर्षक नायिका फ़िल्म के हीरो से बात कर रही है और हीरो को टोकती है कि वो उसकी आंखों में देखे न कि उसके स्तनों पर। फिर कैमरा हीरोइन की क्लीवेज पर रुकता है… फिर हीरो की आंखों पर, पीछे से एक मज़ाकिया टोन बजती है और दर्शकों की हंसी छूट जाती है। कितना फनी था ना? एक महिला के क्लीवेज को हीरो घूर के देख रहा था और सेंसर बोर्ड ने इसे फनी सीन हो जाने दिया। अगर न होने देता तो फ़िल्म वाले अभिव्यक्ति की आज़ादी मांगते।

एक बड़े खान अभिनेता की फ़िल्म में एक आइटम सॉन्ग आता है… कैमरा एकदम नर्तिका के उभारों पर ज़ूम होता है और धीरे-धीरे एक बर्फ का टुकड़ा उसके क्लीवेज से फिसलता हुआ अंदर तक जाता है। इस तरह से सिनेमा दर्शकों के दिमाग में अप्रत्यक्ष रूप से ये भावना डालने में सफल हो जाता है कि क्लीवेज परुषों की सेक्सुअल फंतासियों को जगाने की वस्तु है। विडम्बना ये है कि यही नायक, नायिकाएं और निर्माता-निर्देशक टीवी और ट्विटर पर आकर बोलते हैं कि क्लीवेज शरीर का एक अंग मात्र है और इसका दिखना एक सामान्य बात है।

मेरा कहने का मतलब ये है कि कुछ छुपाने की ज़रुरत नहीं है, सभी को अपनी मर्ज़ी से जीने की आज़ादी है। परन्तु सुन्दरता और स्त्री के प्रति जो भोग वाला दृष्टिकोण हमारे मष्तिष्क में भरा जा रहा है वो गलत है, विशेषतया सिनेमा के द्वारा। हम जब पैदा हुए तो हमारे लिए जननांगों से लेकर हाथ कान, नाक, मुंह सब सामान्य अंग थे। हमने तो क्लीवेज को भी सामान्य ही माना लेकिन साहब हमारे सिनेमा ने बार-बार ज़ूम करके बचपन से हमें जो दिखाया उसने हमारी सोच बदल दी।

चलिए सिनेमा की एक और कारस्तानी देखिये- बचपन में टीवी पर एक कॉन्डम का विज्ञापन आता था, कभी हिम्मत हुई पापा से ये पूछने कि ये कॉन्डम होता क्या है? नहीं, क्योंकि अधिकतर समय वो विज्ञापन आते ही टीवी का चैनल बदल जाता था। आज भी जब कॉन्डम का विज्ञापन आता है तो सनी लियॉन के उतरते कपड़े, हम परिवार के साथ बैठ कर नहीं देख सकते। कॉन्डम के विज्ञापन में सनी लियोन की क्या ज़रूरत? सीधे अमिताभ बच्चन आकर बोलें कि “कॉन्डम का उपयोग करें, यौन रोगों से दूर रहें”, तो भी तो चलेगा।

पर नहीं हमारे सामने सामान्य चीज़ों को भी ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि हमें उनके बारे में बात करते हुए आत्मग्लानि होने लगती है। क्लोज-अप और सेंटर फ्रेश के विज्ञापन में एक लड़का, लड़की को आकर्षित कर रहा है। बर्गर के विज्ञापन एक नायिका कामुक और उत्तेजक अंग प्रदर्शन कर रही है। कई साबुन और इत्र विज्ञापनों में तो महिलाओं को “ए थिंग” ऑफ़ ब्यूटी बनाकर पेश किया जाता है और ये सब धड़ल्ले से टीवी पर दिखाया जा रहा है। आप इनको बंद नहीं करा सकते क्योंकि शायद ये सबसे बड़ा बाज़ार है।

फिर आते हैं कुछ ऐसे लोग जो संस्कृति नाम पर ऐसे तर्क देंगे कि सुनकर आपकी हंसी छूट जायेगी। जैसे-लड़कियां अगर नॉनवेज खायेंगी तो अशुद्ध हो जायेंगी, ये हमारी संस्कृति नहीं है वगैरह-वगैरह। किन्तु ये लोग नहीं जानते कि जिन संस्कृतियों का ये ज़िक्र कर रहे हैं वो वास्तव में वैदिक काल के बाद आई हुयी सामजिक विसंगतियां हैं। ऐसे रूढ़िवादी लोग, भारतीय संस्कृति को युवाओं के बीच बदनाम करते रहते हैं।

लोग भूल जाते हैं कि भारत वो देश है जहां कामसूत्र जैसा ग्रन्थ लिखा गया। खजुराहो के मन्दिर भी हमारी ही संस्कृति है। कभी कोई पौराणिक धारावाहिक देखा है? उसमें महिलाओं का पहनावा देखना, परन्तु इनका प्रस्तुतीकरण अलग है। इतने विशाल इतिहास और दर्शन से सबंधित होकर भी हमारी मानसिकता संकीर्ण कैसे हो सकती है? पिछले डेढ़ हज़ार सालों से जबसे यहां विदेशियों का आना जाना शुरू हुआ तबसे यहां की संस्कृति में कई अतार्किक परम्पराएं आना शुरू हुई। हमें आज ज़रूरत है ऐसे युवाओं की जो इस गुमराह करने वाले सिनेमा की गिरफ्त से बाहर हों और एक सुशिक्षित समाज का निर्माण करे जो परम्परा, संस्कृति और आधुनिकता में से उसका अनुसरण करें जो अधिक तार्किक और अधिक सभ्य हो।

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