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तो क्या बेंगलुरु से छिन जाएगा लेक सिटी का खिताब?

Posted by Hitesh Motwani in Environment, Hindi, Society
March 6, 2017

बेंगलुरु, जिसकी पहचान भारत की सिलिकॉन वैली और गार्डन सिटी जैसे कई नामों से है पूर्व में इसे ‘लेक सिटी’ के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन अब इसकी लेक सिटी की यह पहचान लगातार धुंधली पड़ती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से यहां की झीलें गलत कारणों से ही चर्चा का विषय बनी। कभी बेलंदुर लेक में आग लगने की घटना से, कभी प्रदूषण के बढ़ते स्तर से तो कभी इन पर हो रहे अतिक्रमण के कारण।

इन झीलों के को देखें तो हम पाएंगें कि इनमें अधिकतर झीलें मानव-निर्मित हैं जिनका विकास कई सदियों से होता रहा। इनका मुख्य उद्देश्य खेती पर निर्भर समुदाय की ज़रूरतों को पूरा करना था। क्यूंकि समाज अपनी सभी ज़रूरतों के लिये इन झीलों पर प्रत्यक्ष रूप से निर्भर था तो इनके रख-रखाव की जिम्मेदारी भी लोगों द्वारा स्वतः ही निभाई जाती थी।

अगर हम पिछले दो दशकों को देखे तो हम पायेंगे कि बैंगलोर की इन झीलों के अस्तित्व पर एक संकट खड़ा हो गया है। कुछ नालों में बदल गयी हैं, कुछ सूख चुकी हैं और कुछ को बिल्डरों द्वारा हथिया लिया गया है। 1960 में शहर में 262 झीलों की पहचान की गयी थी जो कि अब घटकर केवल 30 ही रह गयी हैं।

लगातार बढ़ती आबादी का दबाव इसका एक मुख्य कारण है, जिसके कारण इन झीलों पर लगातार अतिक्रमण किया जा रहा है। इसके अलावा बरसात के पानी को इन झीलों तक ले जाने वाले नालों में अवरोध, अलग-अलग प्रकार की ज़रूरतों जैसे सड़कों को चौड़ा करने आदि के लिये झीलों के बहाव क्षेत्र के साथ छेड़छाड़ भी प्रमुख कारण हैं। इन झीलों के अतिक्रमण, सीवेज और उद्योगों से निकले कचरे को बिना किसी ट्रीटमेंट के इनमें डालने की वजह से यह समस्या लगातार विकट हुई है।

इस पूरी परिस्थिति से पैदा हुए परिणामों से हमारा सामना आये दिन अलग-अलग घटनाओं के तौर पर होता रहता है। जैसे कभी हम बेलंदुर लेक में प्रदूषण के कारण बने फोम और उसमें लगने वाली आग की खबर सुनते हैं और कभी बहुत अधिक संख्या में मरी हुई मछलियों के किनारों पर आने की खबर। इन सब घटनाओं से समझा जा सकता है कि हमारे द्वारा पैदा की गयी ये परिस्थितियां जल श्रोतों के पारिस्थितिकी तंत्र (या इकोलॉजिकल सिस्टम) को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं। इसके साथ ही इन जलाशयों के खत्म होने से इनका प्रभाव यहां के भूजल स्तर और उसकी गुणवत्ता पर भी पड़ा है।

इस विषय पर काम कर रही संस्था biometrust.org के अविनाश इस पूरे मामले पर बात करते हुए बताते हैं, “इस समस्या को समझने के लिये हमें इसके सभी पहलुओं को समझना होगा। पहला तो यह कि जब हमने शहरीकरण की इस व्यवस्था को अपनाया है तो इन झीलों का इस नयी व्यवस्था में नागरिकों और समाज के साथ क्या संबंध हो, यह तय नहीं किया जा सका हैं।”

वो आगे वो कहते हैं “क्यूंकि इस नयी व्यवस्था में समाज का पानी के इन श्रोतों के साथ कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हो सका है। इस वजह से इनके रख-रखाव के लिये जो स्वतः स्फूर्त चेतना की आवश्यकता है वो समाज में दिखाई नहीं पड़ती। दूसरा यह कि इन जल श्रोतों के रख-रखाव के लिये बनाई गयी अलग-अलग संस्थाओं (जैसे कि BBMP, BWSSB, KLCDA तथा वन विभाग) की ज़िम्मेदारी किस तरह तय की जाये और उनके बीच में किस तरह समन्वय स्थापित किया जाए, जिस से कि हमें बेहतर परिणाम देखने को मिले।”

ऐसा नहीं है कि इनकी बेहतरी के लिये प्रयास नहीं किये जा रहे, कई नागरिक संगठन इस मुद्दे पर काम करने के लिये आगे आ रहे हैं और फिर से इन झीलों के साथ एक समन्वय स्थापित कर इन्हें जीवित करने की कोशिशें हो रही हैं। शहर में काम कर रही ऐसी ही एक संस्था Freinds of Lake के सह-संस्थापक राम प्रसाद इस दिशा में उनके संगठन द्वारा किये जा रहे प्रयासों पर बात करते हुए कहते हैं कि, “हम लोगों को प्रोत्साहित करते हैं कि वो अपने इलाके की झीलों की जिम्मेदारी लें और छोटे-छोटे समूहों में काम करें जिससे फिर से इन श्रोतों को काम में ले सके। इसके लिये वे इस समय स्कूल एवं कॉलेजों मे Save My Future नाम से अभियान चला रहे हैं जिसमे कि वो विद्यार्थियों से इस पूरे मुद्दे पर चर्चा करते हैं और उन्हें आगे आकर काम करने के लिये प्रोतसाहित करते हैं। इन कोशिशों के सकारात्मक नतीजे भी दिखने लगे हैं और बेन्निगानाहल्ली लेक इसका सबसे अच्छा उदहारण हैं।” 

पानी के इन श्रोतों को बचाना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इनका हमारे इकोलॉजिकल सिस्टम में अपना एक महत्व है। जहां एक और ये जलवायु पर सकरात्मक प्रभाव डालते हैं वहीं ये भूमि की उवर्रकता को बनाए रखने में भी उपयोगी हैं। इस पूरी समस्या में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम पानी के इन ऐतिहासिक श्रोतों से किस तरह से नागरिकों और समाज के सम्बन्ध को पुनः परिभाषित करें और आने वाली पीढ़ी को इस बारे में जागरूक कर पाएं और इन्हें सहेज पाएं।

हितेश  Youth Ki Awaaz हिंदी के फरवरी-मार्च 2017 बैच के इंटर्न हैं।

फोटो आभार: फेसबुक पेज गणेश तिवारी और फेसबुक पेज Save Agara Lake

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