Fate and bombay cinema’s first blockbuster

Posted by syedstauheed
March 9, 2017

Self-Published

 

सन चालीस दशक में रिलीज़ हुई ‘किस्मत’आज भी एक प्रासांगिक फिल्म है, हिन्दी सिनेमा में इस मिजाज की कथावस्तु कामयाबी की मिसाल है ।

ज्ञान मुखर्जी की ‘किस्मत’ खुशी और गम के पाटों में उलझे शेखर (अशोक कुमार) एवं रानी (मुमताज़ शांति) की बनती-बिगडती तकदीरों की दास्तां है । कथा एक तरह से शेखर और रानी की कहानियों का सुंदर संगम है । किस्मत को हिन्दी की पहली बडी ‘ब्लाकबस्टर’फ़िल्म होने का गौरव प्राप्त है। सन1943 में रिलीज़ होकर ,दो वर्ष से भी अधिक समय तक रजत पटल की शोभा बनी रही ।अभिनेता अशोक कुमार निगेटिव नायक ‘शेखर’की भूमिका में है । हिन्दी सिनेमा में इस मिज़ाज़ का ‘हीरो ‘किस्मत’में पहली बार देखा गया…अशोक कुमार का ‘शेखर’ चोर-उचक्का जैसा अस्वीकार्य सामाजिक तत्त्व होकर भी दया, करूणा,प्रेम, मित्रता की मिसाल है ।

शेखर (अशोक कुमार) एक मशहूर चोर है, अक्सर ही धंधे(चोरी) को अंज़ाम देने में कानून के शिकंजे में फ़ंस जाता है. हम देखते हैं कि कथा के आरंभ में वह सेंट्रल जेल से रिहा हुआ .पुलिस अधिकारी उम्मीद करता है कि इस लम्बी सज़ा के बाद शेखर फ़िर आगे चोरी न करेगा । पर कानून के लम्बे हांथों का हवाला देते हुए वह फ़िर न पकडे जाने का विश्वास खो चुका है । तात्पर्य यह कि वह आगे भी इस काम को करेगा,क्योंकि जब तक पुलिस होगी,चोर भी होंगे ।रिहा होकर, फ़िर से पुरानी राह( अपराध) पर चल देता है। एक सोने की घडी हांथ लग जाती है , जिसे दरअसल किसी चोर ने एक बुजुर्ग आदमी के हांथों से उडा लिया था । पर वह इस फन में शेखर से माहिर न था,बहरहाल घडी शेखर के पास आ गई । घडी की तालाश में एक बुजुर्ग आदमी उसके पास आता है,यह व्यक्ति घडी के बदले कुछ रूपए का इंतज़ाम कर स्टेज कलाकार रानी (मुमताज़ शांति) का कार्यक्रम देखना चाह रहा है । शेखर को जब मालूम हुआ कि घडी एक जरूरतमंद आदमी की है तो उसे लौटा दिया । अगले कुछ दृश्यों में शेखर की सहायता से वह बुजुर्ग थियेटर पहुंच जाता है, जहां रानी देवी आज एक कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही है ।
आज इस मौके पर वह एक सुंदर गीत :- ‘ दूर हटो अए दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा’ प्रस्तुत करती है, जिसे तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती माना जाना चाहिए। कार्यक्रम के माध्यम से यह बताया जाता है कि बुजुर्ग आदमी दरअसल ‘रानी देवी’ का अभागा पिता है, कार्यक्रम में आने की उसकी उत्सुकता का कारण समझ आता है । साथ ही एक बडा रहस्योदघाटन यह भी होता है कि एक समय में बुजुर्ग इसी थियेटर का मालिक हुआ करता था, भाग्य(किस्मत) के फ़ेर से अब इंद्रजीत बाबू (मुबारक) मालिक हैं । शेखर की आत्मीयता से वह काफी प्रभावित है,इतना कि वह शेखर को जीवन के गुजरे दिनों की बात कहता है । बीते दिनों को याद करते हुए उन खराब दिनों को नहीं भूला है जब उससे उसका सबकुछ छीन सा गया । गुजरे दिनों में जब अपना थियेटर स्टुडियो गंवा दिया, शराब के गम में अंधा होकर अपनी बिटिया रानी के लकवे का कारण बन जाता है, दरअसल नशे में धूत हो भूल जाता है कि उसकी धुनों पर कोई नृत्य कर रहा है। कहानी फ़िर से जब वर्त्तमान(आज) में आती है तो इस कार्यक्रम पर ठहरती है, जहां रानी देवी एक कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही । उस कार्यक्रम में इंद्रजीत बाबू की पत्नी का कीमती हार चोरी हो जाता है, शेखर वह हार गले से उडा लेता है । लेकिन चुराए गए हार को रानी के संगीत-बाक्स में छुपाकर वह पुलिस से बच निकलता है ।

चोरी हुए हार की तफ़्तीश के हवाले से इंस्पेक्टर (शाहनवाज़) इंद्रजीत बाबू के घर आता है, जहां तफ़्तीश के दौरान उसे मीना देवी( इंद्रजीत बाबू की पत्नी) घर से जुडे एक इतिहास का पता चलता है । कहानी थोडी देर के लिए फ़्लैशबैक में आती है, जिसमें दृश्य हैं कि इंद्रजीत बाबू की दो संतानों में से ‘मदन’ किसी बात पर रूठ घर छोड कर चला जाता है । इतने वर्षों के बाद आज भी परिवार आशावान है कि रूठा मदन एक दिन वापस ज़रूर लौटेगा । माता-पिता अब भी उसके इंतज़ार में हैं। कथा में इस बिंदु पर दो परिवारों की तकदीर समझ में आती है,एक ओर इंद्रजीत बाबू बचपन की खोई संतान पाने को आशावान हैं ,तो दूसरी ओर रानी पिता और परिवार के खोए सम्मान को वापस लाने हेतु संघर्षरत है ।

मोतियों की माला की खोज में शेखर, रानी (मुमताज़ शांति) के घर आता है । रानी की नज़रों में शेखर की एक ‘सकारात्मक छवि’ है , रानी के खोए हुए बुजुर्ग पिता को उस तक लाकर तथा पिता का एक तोहफ़ा उसे सौंपकर वह एक नेक, दयावान, मित्र व्यक्ति बन चुका है । शेखर का अच्छा(सज्जन) व्यवहार निस्संदेह उसे दूसरों के सामने नेक बता रहा है, किन्तु शेखर की ज़मीनी हकीकत उसके गलत पेशे ‘चोरी’ से जुडी है । रानी के घर मेहमान बनकर एक मंझे हुए चोर की माफ़िक वह उसके ‘संगीत बाक्स’ में छुपाए गए चोरी के हार को तालाश कर लेता है । घटनाक्रम में मोतियों की माला तो उसे मिल ज़ाती है, लेकिन रानी की सौम्य, सुंदर, दयावान, व संघर्षशील छवि का कायल होकर बदले में ‘दिल’ वहीं खो देता है । रानी को बिगडे खस्ताहाल हालात से उबारने के लिए शेखर उसके घर में किराएदार बन जाता है,ताकि मदद भी हो जाए और स्वाभिमानी रानी का मान भी बना रहे । शेखर घर में ‘पेइंग गेस्ट’ बन कर रहने लगा । निकटता का यह संयोग दोनों को एक दूसरे को करीब लाता है, रानी व शेखर प्रेम के जादू में बंधकर प्यार के तराने गुनगुनाने रहे हैं :- ‘धीरे-धीरे आ रे बादल आ रे मेरा बुलबुल सो रहा है’

रानी के निश्छल व सुंदर आचरण के संपर्क में आकर शेखर का एक तरह से हृदय- परिवर्तन हो जाता है । उसका मन ‘चोरी से हट गया, वह इस गलत काम से उदासीन सा होकर ‘पार्टनर’(मोती) को नया साथी तलाश करने की बात कह कर कथा-क्रम को नया मोड देता है। बदला हुआ शेखर गलत राह को छोड, रानी को सभी दुखों से उबारने का संकल्प लेता है । इसी क्रम में एक दिन रानी को उसका सच पता चल जाता है, सच जानकर वह बहुत दुखी है और उसके मुख से कवि प्रदीप का गीत:- ‘किस्मत एक दिन हंसाए, एक दिन रूलाए’ बरबस ही फ़ूट पडता है, जो कि दुखद परिस्थिति का मर्म है । सत्य ही है किस्मत के फ़ेर में ‘शेखर का सच’रानी और शेखर को एक ऐसे समय में पीडा देता है जब दोनों की ज़िंदगी सकारात्मक दौर से गुज़र रही है । यह बडा रहस्योदघाटन ‘प्रेम अंधा होता है’कथा को नया मोड देकर ‘इश्क आग का दरिया है’पर ले जाता है । शेखर इंद्रजीत बाबू की पत्नी का हार चुराने के इल्ज़ाम में पुलिस द्वारा पकड लिया जाता है, मन में एक अधूरे काम की चाह लिए वह इंस्पेक्टर
की गिरफ़्त से भाग जाता है । शेखर की चाह है कि रानी का लकवाग्रस्त पांव ठीक हो जाए, वह फ़िर से सम्पूर्ण जीवन को प्राप्त करे । रानी के इलाज़ की ‘सद इच्छा’मन में लिए वह अंतिम बार फ़िर इंद्रजीत बाबू के यहां चोरी अंज़ाम देता है . हम देखते हैं कि इलाज़ के बाद रानी पूरी तरह ठीक है, उसके स्वस्थ होने की खबर सुनकर इंद्रजीत बाबू उसके पास आते हैं । वह एक स्टेज़-शो का प्रस्ताव लेकर यहां तक आए हैं यह कार्यक्रम ‘कथा-क्रम’ की चरमसीमा( क्लाईमेक्स) द्वार समक्ष प्रस्तुत होता है । कुछ शर्तों के साथ रानी इंद्रजीत बाबू का प्रस्ताव स्वीकार करती है । कार्यक्रम का ‘प्रचार’ किया जाता है , रानी देवी के सभी प्रशंसक थियेटर को पहुंचते हैं । इंद्रजीत बाबू का परिवार तथा रानी के घर से भी लोग कार्यक्रम में आते हैं । पुलिस इंस्पेक्टर शेखर की तालाश में कार्यक्रम में मौजूद है, शेखर वहां भेष बदल कर आता है । परिस्थितियां और माहौल कुछ यूं है कि जैसे कोई बडा संदेश मिलने वाला हो। हुआ भी ऐसा ही कुछ: घटना दरअसल कथानक के ‘चरमोत्कर्ष’स्वरूप ही समक्ष आती है ।

कार्यक्रम में रानी देवी (रानी) कवि प्रदीप की एक मर्मस्पर्शी रचना:- ‘सब घर दीवाली , मेरे घर अंधेरा सुना रही है । वहां आए शेखर से रानी का दुख देखा न गया, भेष उतार कर रानी को सूरत दिखाता है । आनंद से वशीभूत रानी के स्वर बदलने लगते हैं, पुलिस समझ लेती है कि यह शेखर की मौजूदगी से ही यह संभव है । वह पकड लिया जाता है, मन में शेखर के भविष्य को लेकर विचार आते हैं । निर्देशक बडी सुंदरता से इंद्रजीत बाबू ‘संतान’ प्रसंग को उस विचार स्थल पर रख देता है । तालाशी के दौरान पुलिस को शेखर के पास से एक ‘लाकेट’मिलता है, लाकेट को इंद्रजीत बाबू अपने खोए लडके ‘मदन’से जोड कर शेखर की असलियत पूछते हैं । सुखमय व भाग्यवादी अंत में इंद्रजीत बाबू को ‘शेखर’ में अपनी खोई संतान ‘मदन’ मिलती है, एक समय में विरोधी रहे दो परिवार किस्मत व ‘संयोग’ के फ़ेर से सगे–सम्बंधी बन जाते हैं ।

समीक्षा : कथा, अभिनय,चरित्र चित्रण, संगीत के घटकों से हिन्दी सिनेमा की लोकप्रिय फिल्म ‘किस्मत’ निकलकर आई है । लोकप्रिय इसलिए क्योंकि बडे जनसमूह ने देखा और सराहना की ,नतीजतन टिकट खिडकी पर रिकार्ड प्रदर्शन किया जो आज भी एक विशेष उपलब्धि है । कथा को ‘तक़दीर’ के मनोवैज्ञानिक जज्बात में पिरोया गया, वही सम्प्रेषण की थीम भी है । सन चालीस के लिहाज़ से ‘कथानक’ समय से काफी आगे है, आज सिनेमा में यह थीम भले ही बेगाना हो चला हो लेकिन ‘तक़दीर’ का गम आज भी आमजन को उतना ही सता रहा जितना साठ-पैंसठ बरस पहले । प्रशंसा करनी होगी ज्ञान मुखर्जी के विजन की जिससे एक ‘दूरगामी’ थीम निकलकर आई ।

किस्मत में निगेटीव हीरो ‘शेखर’ और आदर्शवादी नायिका ‘रानी देवी’ में चरित्रों का सुंदर विभेद गढा गया है । शेखर का अवगुण रानी के सदगुण से अभिप्रेरित होकर सदगुण बन जाता है । किन्तु शेखर का मूल चरित्र भी पूरी तरह से ‘नकारात्मक’ प्रवृति की ओर नहीं झुका है , शेखर से पहले भला किसने एक नेकदिल,शरीफ,संवेदनशील चोर बारे में सोचा होगा । यह सामाजिक पूर्वाग्रहों पर प्रभावशाली प्रहार था । हिन्दी सिनेमा का ‘शेखर’ शायद इसलिए ‘मील का पत्थर’ कहा जा सकता है । अमिताभ बच्चन (परवाना), विनोद खन्ना (दयावान), शाहरूख खान( बाजीगर) जैसे नायकों(हीरो) की छवियों में ‘निगेटीव’ नायक की पुनरावृत्ति हुई । इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सिनेमा में ‘शेखर’ के मिजाज का पात्र वर्षों बाद क्यों प्रासंगिक बना हुआ है । इस संदर्भ में फिल्म की रिकार्ड कामयाबी का एक सूत्र समझ में आता है ।

लेकिन शेखर फिर भी केवल एक पक्ष है,दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘रानी देवी’(मुमताज शांति) का संघर्षशील,जुझारू,हौसलापरस्त पात्र है । पिता के गुम हो जाने बाद घर की जिम्मेदारी को बडे हौसले से संभाला । रानी देवी का किरदार सिनेमा में संघर्षशील, नारी की छवि प्रस्तुत करता है,शारीरिक रूप से कुछ अक्षम होने बाद भी कला साधना को जारी रखे हुए है । यह चरित्र महिलाओं को आत्मबल से कुछ कर दिखाने का हौसला देता है। कहा जा सकता है कि महिलाओं ने खुद को ‘रानी देवी’ की शख्सियत से रिलेट किया होगा । शेखर एवं रानी देवी के पात्र ‘किस्मत’ के प्रति विशेष रूचि जागृत करते हैं । कथावस्तु व चरित्र-चित्रण के प्रभावशाली पहलूओं बेहतरीन संगीत ने अच्छा सहयोग दिया है । कविवर प्रदीप का गीत ‘दूर हटो अए दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है’ तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती देकर ख्याति अर्जित की थी । भारत छोडो आंदोलन के दौर में रिलीज़ किस्मत(1943) लम्बे अर्से तक थियेटरों की शोभा बनी रही । तक़दीर के जिस परिवेश में पात्रों की रचना हुई, उसमें सुखात्मक अंत की उम्मीद नहीं थी। लेकिन ‘खोया-पाया’ के चरमोत्कर्ष में यह हुआ । ‘किस्मत’ हिन्दी सिनेमा में खोया-पाया फार्मूला के प्रारंभिक उपयोग का एक उदाहरण है,जिसे संयोग की ‘निकट सच्चाई’ आधार पर गढा गया । लेकिन यह मनमोहन देसाई के फार्मूले से आगे की फिल्म थी । सत्तर दशक की ज्यादातर फिल्मों को ज्ञान मुखर्जी की बीज अवधारणा से प्रेरणा मिली। लेकिन वह किस्मत जैसी कामयाब नहीं दोहरा पाईं । पुनरावृत्ति अतिवाद से ‘टाईपकास्ट’ हो चुकी थीं । कथा में ‘खलनायक’ पात्र की संकल्पना नहीं की गई ,यह फिल्म को फार्मूला फिल्मों की भीड से अलग करता है जोकि एक सुखद अनुभव रहा । वह शांतिप्रिय सिनेमा का दौर था, हिंसा-प्रतिहिंसा ‘समाधान’ नहीं बल्कि समस्या थी। आज का मुख्यधारा सिनेमा में शांति व अहिंसा की कीमत न बराबर है ।

संयोग पर हम सब की थोडी- बहुत आस्था रही है, जीवन में ‘संयोग’ मिलते हैं । सिनेमा को यदि समाज का अक्स मानें तो वहां ‘संयोग’ अनेक प्रयोग देखें गए हैं, तक़दीर का लिखा संयोग में प्रकट होता है। निदेशक ज्ञान मुखर्जी ने मानव ‘मनोविज्ञान’ के तारों को संतुलित प्रस्तुति से स्पर्श किया है । किस्मत की ‘तक़दीर’ विचारधारा को ‘पलायनवाद’ की ओर नहीं ले जाती है, यहां तक़दीर को परिस्थितियों एवं घटनाओं के प्रकाश में रखा गया है । भाग्य को ‘संयोग’ का प्रतिरूप मानते हुए फिल्म संदेश देती है ‘किस्मत कभी हंसाए,कभी रूलाए’ इसलिए कर्म मार्ग पर चलें ।

 

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