पुरबिया उस्ताद महेंदर मिसिर को उनके दीवानों का सलाम

Posted by Youth Ki Awaaz in Hindi, Media, Staff Picks
March 16, 2017

चंदन तिवारी:

आज ही के दिन चार साल पहले पुरबियातान अभियान की शुरुआत की थी, पुरबिया उस्ताद महेंदर मिसिर के गीतों के साथ। इन चार सालों के सफर में करीब 100 गीत रिकार्ड की। गांव के गलियों से लेकर स्टूडियो तक में। अलग—अलग सीरिज की। पुरबिया राग, निरगुणिया राग, नदिया धीरे बहो, जनगीत, गान्हीजी, बेटी चिरइयां के समान, बसंती बयार, सावनी बहार… और भी कई सीरिज। सभी गानों को प्यार मिला। सबको पसंद किया लोगों ने लेकिन ​महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर के गीतों के प्रति जो दिवानगी दिखती है उसका कोई ज़ोर नहीं है। कई दशक पहले ​उनके द्वारा लिखे गये गीतों को अब भी जब मंच से गाती हूं और श्रोताओं में जिस ताजगी का अहसास महसूस करती हूूं, वह शब्दों में बयां नहीं कर सकती।

आज महेंदर मिसिर का जन्मदिन है तो उन्हें शिद्दत से याद कर रही हूं। महेंदर मिसिर छपरा के थे। उस छपरा के, जिसने भोजपुरी को तीन ऐसे रत्न दिये, जिन्हें दुनिया ने जाना। बाबू रघुवीर नारायण सिंह, महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर। ये तीनों अपने तरीके के अनोखे रचनाकार हुए।भोजपुरी में अनपैरलल रचनाकार। उनमें महेंदर मिसिर की खासियत अलग रही। वे छपरा के एक मामूली गांव मिसरवलिया में पैदा हुए थे।

चार साल पहले जब उनके गीत को लेकर पुरबियातान अभियान शुरू करने की सोची तो मन में कई किस्म के डर के भाव थे। डर अकारण नहीं थे। भोजपुरी संगीत की दशा—दिशा बदल चुकी थी। भोजपुरी लोकगीतों की दुनिया में स्त्री की देह केंद्र में आ चुकी थी। स्त्री के अंगों के सौंदर्य के वर्णन से बात बढ़कर देह नोचने तक पहुंच चुकी थी। बाजार की दुहाई देकर गीतकार दनादन ऐसे ही गीत लिख रहे थे, गाने वाले गा रहे थे, श्रोताओं की बड़ी जमात उन्हें सुन रही थी। कहीं कोई रिएक्ट नहीं कर रहा था। शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास जैसे कलाकार अपनी जिद पर, अपनी शर्तों के साथ लगे हुए थे लेकिन बाजार की दुहाई देकर नयी अराजक ताकतें उन्हें उखाड़ने में लगी हुई थी। लेकिन शारदा सिन्हा या भरत शर्मा व्यास की नींव इतनी मजबूत है कि इनके चाहने से भी असर नहीं हो पा रहा था।

डर इस बात को लेकर था कि महेंदर मिसिर, भिखारी ठाकुर और गांव के गंवई गीतों को अब लोग सुनना चाहेंगे या नहीं? मुंबई से होकर आ चुकी थी और मुंबई में लोगों ने यह कहकर विदा किया था कि जा रही हो अपने घर वापस लेकिन अब इस लोकसंगीत की दुनिया में वापसी नहीं होगी। अगर लोकसंगीत की दुनिया में बने रहना है तो मुंबई रहना होगा, जो चल रहा है, उसके साथ चलना होगा, पब्लिक डिमांड के गीत गाने होंगे। लेकिन मैं सारी बातें सुनकर भी लौट आयी थी वापस। मुझे विंध्यवासिनी देवी, शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास आदि के बारे में पता था कि ये भोजपुरी और पुरबिया लोकसंगीत के पर्याय हैं और इनमें से किसी ने भी मुंबई की बादहशाहत को नहीं स्वीकारा है। इनके बनाए मार्ग से यह प्रेरणा मिल चुकी थी कि मुंबई लोकसंगीत का गढ़ नहीं हो सकता, लोकसंगीत का गढ़ लोगों का इलाका ही होगा।

वापस लौटी तो सबसे पहले महेंदर मिसिर के गीतों से ही गुजरना शुरू किया। उनके धुनों का जुगाड़ करना शुरू किया। अपने जमाने के मशहूर गायक कलाकार भरत सिंह भारती से मदद मिली। उनसे और गांवों से धुन का जुगाड़ हुआ, झारखंड की राजधानी रांची में बुलू दा के यहां रिकार्डिंग तय हुई। मुंबई से आकर सब कुछ जुगाड़ तकनीक से जुगाड़ रही थी। बजानवाले वादक कलाकारों का भी जुगाड़ ही करना पड़ा। कुछ तो पेशेवर मिले , आयोजनों में बजानेवाले लेकिन कुछ ऐसे भी जो पहली बार स्टूडियो का सामना कर रहे थे और स्टूडियो में दिन भर बैठकर वापस चले गये कि वे नहीं बजा सकते। कुछ शाादी ब्याह में बजानेवाले बैंड पार्टी के वादक कलाकार भी मिले।

हिम्मत टूटती जा रही थी लेकिन बार—बार आंखों के सामने महेंदर मिसिर के गीतों के बोल थे। अंत में जो वादक कलाकार मिले, उनके साथ ही पुरबियातान की यात्रा शुरू की, सिर्फ महेंदर मिसिर के गीतों के बोल पर भरोसा करते हुए। महेंदर मिसिर के गीतों के बोल जब से पढ़ी थी, तब से ही मन में विश्वास था कि उनके गीतों के बोल इतने ज़बर्दस्त है कि संगीत कमजोर भी रहे, गायकी थोड़ी कमजोर भी रहे तो लोगों को पसंद आयेगा और ऐसा ही हुआ। पहले गीत को इंटरनेट के ज़रिये छोड़ते ही दुनिया के कोने—कोने में फैले लोकसंगीत रसिया लोगों का रिस्पांस मिलना शुरू हुआ। एक और—एक और की मांग हुई और एक—एक कर महेंदर मिसिर के सात गीतों को रिकार्ड किया और साझा किया।

इसी में एक उनका मशहूर गीत अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया भी रहा, जिसे सुनने के बाद बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता मनोज वाजपेयी अभियान को समर्थन देने के लिए खुद पटना आये, प्रेमचंद रंगशाला में घंटों बैठे। यह महेंदर मिसिर के गीतों का ही जादू है कि चार साल में पुरबियातान के तहत महेंदर मिसिर के करीब एक दर्जन गीतों को अपने बहुत ही अल्प संसाधन में किसी तरह जारी की। उन गीतों का जादू यह रहा कि अभी सबसे हालिया गीत राधारसिया सीरिज नाम से जारी की और अब जब भी कहीं आयोजन में जाती हूं, सबसे पहली डिमांड उसी गीत की होती है—केहू गोदवा ल हो गोदनवा। लेकिन इसमें मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि कुछ नहीं। न ही मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर गर्व की बात है।

यह इसलिए बता रही हूं कि यह पुरबियातान अभियान की सफलता कम और महेंदर मिसिर के गीतों के जादू ज्यादा है। उनके गीत हैं ही ऐसे, जो कालजयी हैं, सदाबहार हैं। महेंदर मिसिर के गीतों को गाते हुए सहजता के साथ डूबती-उतरती रही। खुद ही सोचती कि गाने तो गाने होते हैं, गीत तो गीत होते हैं, फिर मिसिरजी के गीतों में मैं इस कदर डूबती क्यों जा रही हूं? जवाब भी खुद ही तलाशी। बतौर गायिका मुझे ऐसा लगा कि मिसिरजी गीतकार भी थे, संगीतकार भी थे और गायक भी थे, इसलिए आजादी के पहले यानि बरसों पहले जो गीत लिखे, उनके वाक्यों को ऐसे रखा कि भविष्य में कोई भी गाना चाहे तो वह सुगमता से गा सके। उन्होंने पुरबी को पुरबी की तरह ही लिखा, निरगुण को निरगुण की तर्ज पर ही और दूसरे गीतों को शब्दों के अनुसार। गाने से पहले उनके गीतों से गुजरते हुए हमेशा यही लग रहा था कि जैसे उन्होंने हम जैसे नये गायक कलाकारों को ध्यान में ही रखकर गीत लिखे होंगे कि सहजता से गाया जा सके। और जितना चाहे, उनके गीतों के साथ गायकी के प्रयोग भी किये जा सके।

इन सबके बाद महेंदर मिसिर के गीतों से गुजरते हुए सबसे ज़्यादा बेहतर जो बातें लगी, वह एक और बात है। वह यह कि उनके अधिकांश गीत स्त्री मन की अभिव्यक्ति के गीत हैं। वह स्त्री प्रधान रचनाकार थे। स्त्री मन के प्रेम—विरह को राग देनेवाले। सोचती हूं कि कितना कठिन रहा होगा उनके लिए। किस तरह वह स्त्री मन के अंदर की बातों को, एकदम से शब्दों में उतारते होंगे। कितनी गहराई में डूब जाते होंगे वे। स्त्री ही तो बन जाते होंगे, लिखते समय…

(फोटो आभार- फेसबुक वॉल, पुरबियातान)

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