“विपक्ष विहीन लोकतंत्र की ओर अग्रसर होता भारत”

Posted by gunjan goswami in Hindi, Politics, Society
March 24, 2017

अक्सर राजनीति एवं लोकतंत्र जैसे शब्द सुनने के साथ ही हमारे मन में जो पहली बात उठती है, वो है अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां। मज़ा भी आता है इनके कारनामों की चर्चा करने में। पर राजनीति केवल व्यवहारिक नहीं होती इसके इतर एक राजनीति होती है, सैद्धांतिक राजनीति। वो राजनीति जो आज लुप्त हो चुकी है। लोकतंत्र इसी सैद्धांतिक राजनीति रूपी स्तंभ पर खड़ा है। कहते हैं राजनीति में दिशा और दशा सदैव एक समान नहीं रहती। विशेष रूप से भारत जैसे विशाल देश में। यहां राजनीति का स्वरूप सदैव बदलता रहता है और यह ज़रूरी भी है।

हम अगर लोकतंत्र के जन्म अथवा औचित्य पर विचार करेंगे तो यह पाएंगे कि लोकतंत्र का जन्म राजतंत्र अथवा तानाशाही शासन को समाप्त कर जनता द्वारा चुने नुमाइंदों को शासन या सेवा के लिए नियुक्त करने को हुआ था। पर लगता नहीं कि लोकतंत्र राजशाही का सफल विकल्प था। लोकतंत्र बिल्कुल जनता द्वारा चुने गए तानाशाहों की तरह कार्य कर रहा है।

शुरुआती असफलताओं से लड़ते हुए भारत ने अपना संविधान बनाया। उम्मीद थी कि यह लोकतंत्र एवं संविधान देश को विश्व पटल पर एक नई उम्मीद के साथ उभारेगा। पर वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो यह एक चिंताजनक बिंदु है। आजादी के 70 साल बाद भी अगर देश में धार्मिक एवं जातिगत चुनाव, गोमांस, आजादी, मंदिर, हिंदूराष्ट्र अथवा वोट बैंक और घोटाले जैसे शब्दों एवं मुद्दों के आधार पर चुनाव हो रहे हैं या जीते जा रहे हैं तो निश्चित ही हम पतन की ओर जा रहे हैं।

इन सब के ऊपर जो मुद्दा सबसे चिंतित करने वाला है, वह यह है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सत्ता पक्ष से अधिक जिम्मेदारी विपक्ष की है और कभी भी देश को एक मजबूत विपक्ष नहीं मिल सका। ऐसा विपक्ष जो अलग-अलग मुद्दों पर सरकार की नीतियों की निंदा कर सके और देशहित के मुद्दों पर सरकार का साथ दे।

अब अगर वर्तमान चुनावों की बात करें तो कांग्रेस या भाजपा कहीं भी अपने एजेंडे या एक सोच के साथ सत्ता में नहीं आई। बल्कि पिछली सत्ता के विकल्प के रूप में आई। जनता वर्तमान सरकारों से त्रस्त थी इसलिए विकल्प के तौर पर इन पार्टियों को सत्ता सौंपी गई। इन सब बातों में वह विपक्ष कहां है जो खुद को इन सरकारों की नीतियों से बेहतर साबित कर सके। वह विकल्प कहां है? जिस पर जनता विचार करे।

हिंदू वोट, मुस्लिम-यादव वोट, ओबीसी वोट बैंक, दलित वोट बैंक। क्या इन्ही मुद्दों के दम पर चुनाव लड़े एवं जीते जाएंगे? क्या चुनाव तक ही संविधान सीमित है? चाहे राष्ट्रीय स्तर पर यूपीए हो या बिहार में बीजेपी, मध्यप्रदेश में कांग्रेस हो, या यूपी में बीएसपी/एसपी। सभी विपक्षी पार्टियां चुनाव हारने के बाद, खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में तैयार ना करके अगले चुनाव की तैयारियों में लग जाती हैं।

एक और विचार यूं ही आया, आपसे कह रहा हूं। वर्तमान में गठबंधन की सरकारों एवं साथ मिलकर चुनाव लड़ने की परंपरा खूब चली है। दिन प्रतिदिन यह स्थिति बढ़ ही रही है। बिहार में एक तरफ जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस एवं अन्य छोटी पार्टियां थी। तो दूसरी तरफ बीजेपी-एलजेपी-आरएलएसपी तथा अन्य छोटी पार्टियां थी। पर भविष्य में तब क्या हो, जब ये सभी पार्टियां अर्थात बीजेपी-एलजेपी-आरएलएसपी-जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस एवं अन्य पार्टियां भी आपस में शक्ति के हिसाब से सीटों का बंटवारा कर ले। सभी निर्विरोध चुनाव जीत जाएं। कोई चुनाव खर्च नहीं। कोई प्रचार नहीं। सुकून की सत्ता, सभी को सत्ता, कोई विपक्ष नहीं, जो करो सब सही।

हो सकता है आप में से कुछ लोग कहें कि यह संभव नहीं है। पर हुजूर ये राजनीति है। उम्मीद तो नीतीश-लालू के भी साथ आने की नहीं थी। उम्मीद तो एक वोट से बीजेपी की सरकार गिराने वाले रामविलास और बीजेपी के भी साथ आने की नहीं थी। ऐसी बहुत सी बातें, बहुत से समीकरण हैं ,जो यूं ही संभव हो जाते हैं राजनीति में। पर वो जो सबसे घातक है संविधान के लिए, लोकतंत्र के लिए, देश के लिए, हमारे लिए , तुम्हारे लिए, वह है विपक्ष विहीन लोकतंत्र की ओर अग्रसर होता भारत।

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