मिलिए नैशनल अवॉर्ड विनर बेंगलुरु की ट्रांस रेडियो जॉकी से

चिकमंगलूर में जन्मी, कुर्ग में पली-बढ़ी और बेंगलुरु की जैन यूनिवर्सिटी की ग्रेजुएट शिलोक 21 साल की एक ट्रांस-महिला हैं और एक बेहतरीन रेडियो-जॉकी हैं। इनके काम के लिये इन्हें नेशनल अवॉर्ड से भी नवाज़ा जा चुका है और इस साल ‘नम्मा बेंगलुरु अवॉर्ड’ के लिए भी शिलोक को नामांकित किया गया है। यूथ की आवाज़ के साथ एक ख़ास बातचीत के दौरान शिलोक ने बताया कि अपनी लैंगिक पहचान के कारण लगातार अलग-अलग चुनौतियों का सामना करते हुए वो कैसे लगातार आगे बढ़ रही हैं-

हितेश: आपको पहली बार इस तरह का बदलाव कब महसूस हुआ? और उस दौरान आपके मन में क्या चल रहा था? किस तरह की बातें आपको परेशान कर रही थी?

शिलोक: आप जब बच्चे होते हैं तो आपको जेंडर के बारे में जानकारी नहीं होती। शुरुआत में, मुझे महसूस होता था कि या तो मेरे साथ ही कुछ गलत है या मेरे आस-पास के लोगों के साथ। किशोरावस्था में मैं अपनी पहचान तय नहीं कर पा रही थी। मुझे मेरी क्लास के बच्चे लगातार परेशान किया करते थे। उस समय मेरे दिमाग में हमेशा यही चलता था कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है।

इन शुरुआती घटनाओं के बाद मैंने अपनी पहचान के बारे में सोचना शुरू किया। मुझे लगता था कि मैं एक लड़की ही हूं और मैं अपने शरीर के साथ कोई जुड़ाव महसूस नहीं कर पाती थी। जब पहली बार मैं बेंगलुरु आई तो मुझे इस संबंध में जानकारी मिली और LGBTQ समुदाय के लिये काम कर रही संस्थाओं ने मेरी मदद की। कभी-कभी मुझे यह भी लगता था कि मैं गे (समलैंगिक पुरुष) हूं, क्योंकि मैं पुरुषों की तरफ आकर्षित होती थी। लेकिन बाद में, मैं इस नतीजे तक पहुंची कि ऐसा कुछ नहीं है। मुझे हमेशा यही लगता था कि मैं एक औरत हूं।

इस पहचान को अपनाना मेरे लिए काफी मुश्किल था क्योंकि समाज में हिजड़ा या ट्रांसजेंडर समुदाय के लिये कई तरह के पूर्वाग्रह हैं। एक समय मुझे अपनी ही तरह के ट्रांस लोगों से डर लगने लगा था और मुझे अपनी पहचान सामने आने का डर था। लेकिन जब मैं ट्रांसजेंडर समुदाय की औरतों से मिली तो मुझे मेरे साथ जो भी चल रहा था उसे समझने का मौका मिला और मेरी पहचान को अपनाने का हौंसला भी मिला।

हितेश: इस दौरान आपके परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी उनकी तरफ से किस तरह का सहयोग आपको मिला?

शिलोक: मुझे मेरे परिवार से काफी सहयोग मिला। उन्हें काफी समय लगा समझने में, उनके लिये ये काफी अलग था क्योंकि वो जिस पृष्ठभूमि से आते हैं उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उनके लिये मेरी इस पहचान को अपना पाना काफी मुश्किल था क्योंकि इससे पहले उन्होंने मेरे छोटे भाई को खो दिया था और मैं अब उनकी इकलौती संतान हूं।

मुझे लगता है कि वो बेस्ट पेरेंट्स हैं, हालांकि यह बहुत कठिन है लेकिन फिर भी वो मेरे साथ हैं। मैंने अपने समुदाय के कई लोगों को देखा है जहां उन्हें घर से निकाल दिया जाता है। लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि मुझे पूरा प्यार और सम्मान अपने माँ-बाप से मिला। लेकिन हां, आज भी वो मेरी पहचान को सबके सामने बताने से डरते हैं।

हितेश: आप रेडियो-जॉकी कैसे बनीं ?

शिलोक: मैं पत्रकारिता की छात्र थी और मुझे लगता था कि मेरी आवाज़ काफी अच्छी है। इसलिए मुझे लगा कि रेडियो-जॉकी का करियर मेरे लिये बहुत अच्छा होगा।

मैं रेडियो एक्टिव बेंगलुरु में इंटर्नशिप के लिये आई थी और कुछ समय बाद मुझे मेंसट्रुअल हेल्थ पर कविताएं लिखने के लिए कहा गया। इससे पहले भी लिखा करती थी, तो ये मेरे काम से प्रभावित हुये और इस तरह से मैं इस संस्था से जुड़ी। इसके बाद मुझे यहां काम कर रही दूसरी रेडियो-जॉकी की जगह कुछ दिन काम करने का मौका मिला जिसका मैं हमेशा से इंतज़ार कर रही थी।

फिर मुझे अपना एक शो करने का अवसर मिला, मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं अपना शो करने जा रही हूं। हालांकि यह मेनस्ट्रीम रेडियो नहीं है, लेकिन कम्युनिटी रेडियो का भी समाज पर एक गहरा असर होता है। यह मेरे लिये एक सपना सच होने जैसा था।

हितेश: आपका यह काम किस तरह से आपकी ज़िंदगी को प्रभावित कर रहा है?

शिलोक: मुझे अपने काम में बहुत मज़ा आ रहा है। सबसे बड़ी बात है कि यहां मुझे अलग-अलग मुद्दों पर विभिन्न समुदायों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। हम यहां सबकी समस्याओं पर बात करते हैं। जब मैं लोगों से बात करती हूं, उनके इंटरव्यू करती हूं तो मैं जान पाती हूं कि किस तरह से लोग अपने जीवन की चुनौतियों का सामना करके आगे बढ़ रहे हैं, इन सबसे मुझे सकारात्मक ऊर्जा और एक नज़रिया मिलता है।

कुछ लोग समस्याओं से घबरा कर अपनी जिंदगियां ख़त्म कर लेते हैं, लेकिन कुछ के अन्दर उनसे लड़ने की इच्छाशक्ति होती है और वो अपनी ज़िंदगी बेहतर बना पाते हैं। मैं भी कई बार अपनी लैंगिक पहचान के कारण परेशान होती हूं लेकिन फिर मुझे इन सब कहानियों से आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। मेरा काम मेरे लिये एक थैरेपी के समान है जो कि लगातार मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहता है।

हितेश: इन सब के बाद भी आप में किसी तरह की असुरक्षा की भावना है या आप रोजमर्रा के जीवन में किसी तरह के भेदभाव अथवा बुरे व्यवहार का सामना करती हैं?

शिलोक: कई बार। क्योंकि मैंने अभी तक शारीरिक और कानूनी रूप से लिंग परिवर्तन नहीं कराया है, सिर्फ मानसिक तौर पर मैं अपने आपको एक औरत समझती हूं। आप कितना भी मजबूत हों लेकिन समाज में कई लोग आपको बार-बार नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं।

हाल ही में, मेरे पड़ोसी के साथ एक वाकया हुआ। जहां वो मेरे बारे में लगातार कुछ गलत बोलती जा रही थी। इससे पहले मैं एक PG में रहती थी जो कि जेंट्स PG था, वहां मेरे कई बार मज़ाक उड़ाया जाता था। आज भी कई बार मेरा रास्ता रोका जाता है और मुझे परेशान किया जाता है। मेरी पहचान की वजह से मेरे परिवार को भी काफी परेशानी उठानी पड़ती है, लोग उन्हें कई तरह की बातें सुनाते हैं और हर बार मुझे मेरी माँ को समझाना पड़ता है।

हितेश: जब भी इस तरह के वाकये होते हैं तो क्या पुलिस से किसी तरह की मदद मिलती है? आप आराम से जा पाती हैं उनसे मदद मांगने?

शिलोक: हमारी सरकारी संस्थाओं में इस पूरे विषय को लेकर समझ का अभाव है। मैं पुलिस के पास जाने का सोच भी नहीं पाती क्यूंकि मुझे लगता है कि वो मेरी परेशानी नहीं समझेंगे बल्कि वहां भी मेरा मज़ाक ही उड़ाया जाएगा। कुछ लोग हैं जो वाकई आपकी मदद करना चाहते हैं लेकिन उनकी संख्या बहुत कम हैं।

मैं भी परेशान करने वाले लोगों से लड़ सकती हूं और उनसे तेज़ आवाज़ में बात कर सकती हूं। लेकिन मुझे लगता है कि उनकी बातों पर ध्यान ना देते हुए शांत रहना ही सबसे अच्छा जवाब है, क्योंकि मैं किसी भी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहती।

हितेश: खाली समय में क्या करना पसंद हैं ?

शिलोक: वैसे तो मैंने अपनी हॉबी को ही अपना काम बना लिया है और यही मुझे सबसे ज्यादा पसंद है। काम के अलावा मुझे डांस करना बहुत पसंद है। मुझे किताबें पढ़ना और लिखना भी बहुत पसंद है।

हितेश: आपकी पसंदीदा किताब और मूवी?

शिलोक: मेरी पसंदीदी किताब हैं Truth About My Life By Revathi और Danish Girl मेरी पसंदीदा फिल्म है।

हितेश: छुट्टियों में क्या करती हैं आप? 

शिलोक: सिर्फ सोती हूं, क्योंकि सामान्य दिनों में मुझे सोने के लिये ज़्यादा समय नहीं मिलता। मुझे भविष्य की कल्पनाएं करना बहुत पसंद है, यह मेरा पसंदीदा खेल है। ऐसी बहुत सारी चीज़ें हैं जो कि मैंने कभी सोची थी और आज वो सच हो गयी हैं।

हितेश: किसी तरह के राजनीतिक विचार ? क्या आप राजनीति के बारे में जानना या पढ़ना पसंद करती हैं?

शिलोक: मैं ज़ीरो हूं इसमें। मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया हाउसेस से दिक्कत है और साथ ही मैं राजनीति के बारें में ज्यादा कुछ नहीं जानती। मैं जानकारियों के लिये सोशल मीडिया पर ज़्यादा निर्भर रहती हूं।

हितेश: आपकी ज़िन्दगी का सबसे खुशनुमा पल ?

शिलोक: ऐसे बहुत से पल हैं, लेकिन फिर भी मैं बताना चाहूंगी जब मुझे मेरे शो के लिये नेशनल अवॉर्ड मिला और मुझे बेंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल में आमंत्रित किया गया। इसके साथ ही इस वर्ष नम्मा बेंगलुरु पुरस्कार के लिये मुझे नामांकित किया गया है। सभी दिन मेरे लिये खुशियों से भरे हुए हैं क्योंकि मेरे आस-पास सभी लोग लगातार मुझे आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करते रहते हैं।

हितेश: सबसे दुखी करने वाला लम्हा ?

शिलोक: जब मेरे भाई की मृत्यु हुई।

हितेश: समाज से कुछ कहना चाहती हैं ?

शिलोक: उन सभी को जिन्होंने हमें प्यार दिया, हमारे अधिकारों के लिये लड़ाई लड़ी और हमें अपनी इस पहचान के साथ स्वीकार किया, मैं उन सभी को शुक्रिया बोलना चाहती हूं। और वो सभी लोग जो हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं उन्हें मैं बोलना चाहती हूं कि “we have been burnt by the humiliation and violence for long time. Now we will raise from those ashes and will fight back. We are going to live better and dignified life.”

हितेश  Youth Ki Awaaz हिंदी के फरवरी-मार्च 2017 बैच के इंटर्न हैं। 

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