और एक दिन BHU की लड़कियां डरना छोड़ देंगी

रोशन पांडे और दीपश्री तिवारी:

देश मंगल पर जाने का जश्न मना रहा है, अखबार बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ जैसी योजनाओं के इश्तेहारों से भरे पड़े हैं। चुनावी रैलियों से महिला सशक्तिकरण के वादों की बौछार हो रही है, वहीं प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी स्थित बीएचयू की छात्राएं अपने संवैधानिक तथा मानवाधिकारों से वंचित होकर जीने को मजबूर हैं।शैक्षणिक संस्थान समाज का आईना नहीं भविष्य होता हैं लेकिन बीएचयू प्रशासन, पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्यों के संरक्षक की भूमिका निभा रहा है।

कैम्पस में स्थित महिला महाविद्यालय (MMV) की छात्राओं और उनके अभिभावकों से प्रवेश के वक्त किसी विरोध प्रदर्शन या धरना में शामिल न होने का अंडरटेकिंग (undertaking) लिया जाता है। 800 करोड़ के सलाना बजट वाले इस संस्थान में MMV की छात्राएं शैक्षणिक सुविधाओं व अवसरों में घोर भेदभाव का शिकार हो रही हैं। डिजिटल इंडिया के इस दौर मे गर्ल्स हॉस्टलों में इंटरनेट की सुविधा नहीं है, कला व सामाजिक विज्ञान (स्नातक) में छात्राओं को मुख्य संकाय में दाखिला नहीं मिलता तथा छात्रों की अपेक्षा छात्राओं के पास Subject Combinaton के बहुत कम विकल्प मौजूद होते हैं।

UGC की गाइडलाइन के अनुसार कैम्पस में सुरक्षा कारणों से किसी छात्रा के साथ सुविधाओं तथा हॉस्टल के समय में भेदभाव नहीं किया जा सकता, लेकिन यहां 8 बजे के बाद इन्हें हॉस्टलों में कैद कर दिया जाता है। रात 10 बजे के बाद फोन से बात करने तथा अपने ही कम्पाउंड में एक हास्टल से दूसरे हास्टल जाने पर पाबंदी है। ऐसे प्रतिबंध छात्राओं के बीच संवाद खत्म करने के लिए लगाए गए हैं, जिससे उनके बीच विचारों का जन्म न हो सके और वो प्रशासन के भेदभावपूर्ण नीतियों पर सवाल न कर सकें।

दुनिया देखने और अपने सपनों को साकार करने के लिए एक छात्र के पास 24 घंटे होते हैं जबकि एक छात्रा के पास 14 घंटे क्योंकि हर रोज़ उसे 10 घंटे के लिए हॉस्टल की दीवारों के बीच मार दिया जाता है। गर्ल्स हास्टल में जहां मांसाहार पर प्रतिबंध है वहीं छोटे कपड़ों में अपने कमरे से बाहर निकलने की भी सख्त मनाही है। अर्थात सभ्यता और संस्कृति के नाम पर छात्राओं के जीवन पर पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण है।

आज यह मुद्दा राष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का विषय है। परिवार और प्रशासन के डर से परे जाकर जब कुछ छात्राओं ने इस सवाल को मीडिया के सामने लाया तो मर्दवादी बीएचयू प्रशासन उन्हें एंटी बीएचयू, संस्कृति के लिए खतरा इत्यादि बताकर कुछ अन्य मीडिया के माध्यम से भ्रामक प्रचार कराया। प्रशासन के द्वारा छात्राओं का करियर बर्बाद करने और अनुशासनात्मक कार्रवाही की धमकियां देकर मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा, सवाल करने वाली छात्राओं को बलात्कार जैसी धमकियां मिल रही हैं। मुद्दा प्रकाश में आने के बाद महिला महाविद्यालय की छात्राएं एक साथ आकर ऐसे पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण नियमों के खिलाफ अपने प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद कर रही हैं। MMV में लैंगिक असमानता के खिलाफ आवाज़ उठा रही मृदुला मंगलम के शब्दों में-

“और एक दिन हम डरना छोड़ देंगे, बहती हवाओं का रूख मोड़ देंगे
ये जो शोर मचा है आज पिंजरे में, यकीन मानो एक दिन ये पिंजरा तोड़ देंगे”

कुलपति जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे प्रो. जी.सी. त्रिपाठी के अनुसार “बेटी वो होती है जो भाई के लिए अपना करियर कुर्बान कर दे।” जिस संस्थान का प्रशासनिक मुखिया ऐसी संकीर्ण मानसिकता से ग्रसित हो उस संस्थान में छात्राओं की स्थिति का मूल्यांकन किया जा सकता है। भारतीय समाज में लड़की को घर से विश्वविद्यालय तक का सफर तय करने में न जाने कितने सवालों से गुज़रना होता है। तमाम सामाजिक सीमाओं को तोड़कर जब वह बीएचयू जैसे संस्थान में पढ़ने आती है, तो उसका सामना एक ऐसी विश्वविद्यालयी व्यवस्था से होता है जो उसे एक प्रगतिशील नागरिक बनाने के बजाए हमेशा किसी पुरुष पर निर्भर होना सिखा रही है।

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