अरे! सरदार जी हो और ‘खाते-पीते’ नहीं?

Posted by हरबंश सिंह in Hindi, Society
March 23, 2017

साल 2004 की दिवाली की रात अपनी टैक्सी चलाकर कुछ लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने के काम पर था, इनमें कुछ विद्यार्थी थे और शायद 1-2 नौकरीपेशा लोग। सुबह होते-होते हम दीव पहुंच गये, होटल में कुछ समय सोने के बाद खाने का समय हुआ। अब ड्राइवर को तो सवारी ही खाना खिलाती हैं, जहां ये कम ही पूछा जाता है कि आप क्या खाओगे? बस फ़रमान होता है कि इनके लिये ये ला दो। टेबल पर खाना आया तो उसमें मटन परोसा गया था, देखकर थोड़ा ताज्जुब हुआ कि किसी ने पूछा भी नहीं कि मैं मांस खाता हूं या नहीं। मैंने शाकाहारी होने का वास्ता देकर खाने से मना किया तो फिर उसके बाद सफ़ेद चने मंगाये गये। लेकिन मैं देख सकता था कि उनकी नज़रे सवाल कर रही थी सरदार जी हो और मांस नहीं खाते?

ऐसा ही कुछ 2-3 साल पहले हुआ जब पड़ोसी को बताया मैं शराब का सेवन नहीं करता तो सामने से जवाब आया “अरे, सरदार जी तो खाने-पीने वाले होते हैं तो फिर आप कैसे?” यहां खाने-पीने का तात्पर्य मांस खाने और शराब पीने से है। आप खाने-पीने वाले बन जाते हैं लेकिन एक सरदार जी अपनी मर्ज़ी से साधारण खाने में यकीन रखता हो इस बात को शायद समाज आसानी से पचा नहीं पाता। फिर चाहे नया होटल खुला हो जहां मुझे ये ज़रूर बताया जाता है कि यहां मांसाहारी खाना भी परोसा जाता है या रसोई गैस के लिये चिमनी ही क्यों ना खरीदनी हो जहां मुझे कहा जाता है “सर, आप ये खरीदिये, मीट बनाने में धुआं बहुत निकलता है जिसे निकालने में ये चिमनी कारगर रहेगी।”

मैं ऐसी कई जगहों पर रहा, जहाँ शराब के ठेके और मांस बेचने की दुकानें आम हैं। गुजरात यूं तो ड्राई स्टेट है लेकिन चोरी छुपे शराब यहां भी मिल ही जाती है। इस राज्य के लोगों को ‘खाने-पीने’ वालों में कम ही गिना जाता है। अब ऐसा क्या है कि लोग एक सरदार जी को देखकर, ये मानकर ही चलते हैं कि ये ‘खाने पीने’ वालों में से है। ये यकीन इतना पक्का होता है कि आप से बिना पूछे भी आप को खाने में मांस परोसा जा सकता है, लेकिन ऐसी धारणा क्यों हैं?

पंजाब में प्रति व्यक्ति शराब की खपत काफी ज़्यादा है, ये सरकारी आंकड़ों में भी होगा, लेकिन एक आम नागरिक कहां इन्हें पढ़ता है। तो ऐसा क्या है कि समाज में सरदार जी को लेकर यह धारणा बनी हुई है। मेरा मानना है कि इसके लिये पंजाबी भाषा में बनने वाले घटिया गीत और उनके विडियो सबसे ज़्यादा जिम्मेदार हैं। इनकी लोकप्रियता देश-विदेशों में तो है ही साथ ही उन जगह पर भी है जहां पंजाबी भाषा का ज्ञान बहुत मामूली है या बिलकुल नहीं है।

भाषा समाज का आइना होती हैं और इसे जिस तरह से प्रोत्साहित किया जाता हैं उसी तरह हमारे समाज का अक्स बनता है। अब एक नज़र कुछ पंजाबी गीतों पर- हनी सिंह गायेगा “5 बोतल वोडका, काम मेरा रोज़ का”।  गुरदास मान का मशहूर गीत “आपणा पंजाब होवे, घर दी शराब होवे” जहां ये घर में निकालने वाली शराब को प्रोत्साहित कर रहे हैं। ख्याति प्राप्त पंजाबी गायक बब्बू मान जिसके लगभग सारे गानों में नशा, हिंसा और प्यार में बेवफ़ाई को ही दिखाया जाता है। अब शराब और हिंसा का क्या ताल-मेल है इसे कहीं लिखने की जरूरत नहीं।

जहां गायक कलाकार तुरंत मशहूर होने की इच्छा रखता हो, वहां किसी ना किसी तरह के नशे पर गीत गाना आम है। पंजाब में इन गायक कलाकारों की दीवानगी अपने चरम पर रहती है। लोग इनकी तरह बनना चाहते हैं और कभी-कभी इनके गीतों में कही गयी बातों को अनुकरण भी दीवानगी की हद तक करते हैं। लेकिन, ये भी एक हकीकत है कि आज भी पंजाब के समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शाकाहारी या साधारण भोजन करने में ही यकीन रखता हैं और शराब से कोसों दूर है।

एक तरह से तो शराब या मांस का सेवन व्यक्तिगत आज़ादी की बात है, इसी तर्ज़ पर मैंने भी शाकाहारी रहने और शराब ना पीने का फैसला किया है। मेरे लिये शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही साधारण इंसान हैं। इस लेख के माध्यम से में इतना ही कहना चाहता हूं कि हमें किसी समुदाय या नागरिक के आचार-विचार के बारे में अपनी राय उन्हें ठीक से जाने बिना नहीं बनानी चाहिये।

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