क्या हम अब ग्रामीण पत्रकारिता करना भी चाहते हैं?

Posted by Abhay Pandey in Media, Society
March 21, 2017

देश में हज़ारो की संख्या में न्यूज़पेपर और टीवी न्यूज़ चैनल की भरमार है। इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी के अनुसार भारत में 62,000 समाचार पत्र हैं। इनमें से 90 प्रतिशत यानी लगभग 55,000 स्थानीय भाषाओं में छपते हैं और 50,000 की प्रसार-संख्या 10,000 से कम है। फिर भी न जाने क्यों आज सबसे बड़ा सवाल ये है कि जो अबादी में सबसे ज़्यादा हैं, वो मीडिया में सबसे पीछे कैसे? क्या वो टीवी की टीआरपी में फिट नही बैठ पाते? क्या हमारे देश में ग्रामीण पत्रकारिता मर सी गई है? क्या इस क्षेत्र में पी.साईनाथ के अलावा कोई बड़ा नाम आता है आपके सामने?

इन सब सवालो से मैं रोज़ अपने आप से जूझता और लड़ता पाता हूं कि ऐसा क्यों है? ये सवाल खत्म क्यों नही होते या हम करना नही चाहते? हमारे शिक्षक कहा करते हैं कि सवाल में ही जवाब है तो इसी में दूसरा सवाल मीडिया करता क्या है और किसके लिए? आज मीडिया ऐसे विकास की आवाज़ बन चुका है जिसमें शायद ग्रामीण पत्रकारिता कहीं फिट नहीं बैठती। हम या तो ग्रामीण पत्रकारिता को खेतों से आगे समझ नही पाये या हम समझ कर भी नासमझ बन रहे हैं।

मीडिया में आज के विकास की आवाज़ के पीछे की बात किसी से नही छुपी है। मीडिया आज दिन-रात खेती को घाटे का सौदा बता रही है, क्या मीडिया कभी ये बता पाएगा कि इसे घाटे का सौदा बनाया किसने?

मीडिया दिन भर लोगों के लाइफ स्टाइल दिखाता है, क्या वो कभी किसी किसान का लाइफ स्टाइल दिखायेगा जो अपना पूरा दिन दो रोटी कमाने में लगा देता है। आज देश की पत्रकारिता आबादी के महज 30-35 फीसदी हिस्से को ही कवर करती है। गांव, देहात और दूर-दराज क्षेत्रों में आबादी किन हालातों में जीवन यापन कर रही है, उनके दुख-दर्द, समस्याएं और परेशानियां देश और दुनिया तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। सरकारी फाइलों और आंकड़ों में गांवों का मौसम गुलाबी ही दिखाया जाता है लेकिन वास्तविकता से किसी छिपी नहीं है।

किसान आत्महत्या कर रहे हैं, टीवी पर ये दिखाया जाता है वो भी कभी-कभी। लेकिन ये क्यों नही बताया जाता साफ़-साफ़ कि ये आत्महत्याएं 1990 के बाद से बढ़ती क्यों जा रही हैं? क्या इसके पीछे आपके विकास का हाथ है जिसकी आवाज़ आज की मीडिया बनी हुई है। सवाल क्यों नही पूछता मीडिया सरकारों से कि किसान को आत्महत्या की चिता पर देख कर नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को? हमारी मीडिया के पास इतना गुस्सा है कि वो दो देश लड़वा सकते है, क्या यही गुस्सा वो ग्रामीण पत्रकारिता में दिखा कर इसके स्तर में कोई सुधार कर सकते है? या वो गुस्सा भी दिखावटी है?

कुछ एक चैनलों ने इस क्षेत्र में कुछ करने की कोशिश की जैसे कि गांव कनेक्शन। लेकिन ये बस किसानों तक ही रहा। क्या गांव में केवल किसान ही रहते हैं या हमारी समझ ये है कि जो गांव में रहते हैं वो किसान ही हैं? ये हमारी या आपकी गलती नहीं हमारी ये सोच बनाई जा रही है मीडिया के माध्यम से। गांव की घटना क्यों नही बाहर आ पाती? हमे यह समझने के लिए ग्रामीण पत्रकार के हालात समझने होंगे कि वह किस हाल में पत्रकारिता कर रहे हैं?

आज ग्रामीण पत्रकारों की हालत तो ग्रामीण पत्रकारिता से भी खराब हो चली है, अनियमित या मामूली तनख्वाह और बिना किसी पहचान के काम करते जाना उनकी नियति बन गई है। ग्रामीण पत्रकारों के लिए दो जून की रोटी जुटाने के साथ पत्रकारिता के प्रति अपना जुनून बरकरार रख पाना मुश्किल साबित होता जा रहा है। ग्रामीण पत्रकारों में से अधिकांश 100 से 200 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर करते हैं। इसलिए वे खेती जैसे आजीविका के दूसरे साधनों पर भी निर्भर रहते हैं। मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त और भारत में ग्रामीण पत्रकारिता के जाने-पहचाने नाम पी. साईनाथ भी इस बात से सहमति रखते हैं। उनके अनुसार, “ग्रामीण पत्रकारों को बहुत ही कम वेतन पर गुजारा करना पड़ता है, जिसकी वजह से उन पर दबाव ज़्यादा होता हैं। पत्रकार संगठनों की कमी और कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) आधारित नौकरी के चलते पत्रकारों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है।”

आखिर में कुछ सवाल और, क्या हम अब ग्रामीण पत्रकारिता करना भी चाहते हैं? आज मीडिया में आने वाले छात्र बस पैसे कमाना चाहते हैं, क्या हम इस पैसे की दौड़ में हम ग्रामीण पत्रकारिता को बचा पाएंगे? मैं पूछना चाहता हूं उस चिल्लाने वाले एंकर से कि नेशन वांट्स टू नो कि आप कब ग्रामीण पत्रकारिता के लिए चिल्लाने वाले हैं? मैं सवाल करना चाहता हूं डीएनए वालों से कि वो कब ग्रामीण पत्रकारिता पर डीएनए करेंगे? मैं 9 बजे में आने वाले प्राइम टाइम के एंकर से पूछना चाहता हूं कि कब वो इसको जगह देंगे अपने प्राइम टाइम में? क्या कोई विकास से आगे नही सोच पा रहा है या सोचना ही नही चाहता?

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