आज भी अस्तित्व पर सवाल क्यूँ है विधवा होना?

Editor’s note: ये लेख हमें  Youth Ki Awaaz के इस हफ्ते के विषय #WomensDay के तहत मिला है। मकसद है एक बहस शुरु करना कि हम समाज में कैसे लिंग आधारित समानता/जेंडर इक्वॉलिटी ला सकते हैं। अगर आप भी लिंग आधारित हिंसा, लिंग आधारित भेदभावपूर्ण टिप्पणियाें के शिकार हुई/हुए हैं और चाहती/चाहते हैं किसी पॉलिसी में बदलाव आए या परिवार, दोस्तों, दफ्तरों में कैसे लिंग आधारित भेदभाव को रोका जा सकता है, इसपर है कोई सुझाव तो हमें लिखने के लिए यहाँ क्लिक करें।

ये बात कहने का ख्याल मेरे दिमाग में पहली बार तब आया था, जब 2013 में मैंने एक 21 साल की विधवा लड़की को देखा जिसने तीन महीने पहले ही केदारनाथ आपदा में अपना पति खोया था। वो एक सरकारी कार्यक्रम में मुआवजे का चेक लेने देहरादून आई थी और भीड़ में सबसे पीछे बैठ कर अपने पर्स से निकाल कर बिंदी लगा रही थी। अचानक जब उसका नाम आगे से पुकारा गया, उसका हाथ सबसे पहले उस बिंदी पर गया और उसे हटाकर वो सरकारी चेक लेने आगे गयी। मेरे दिमाग में पहला सवाल यही था कि क्यूं उसने वो बिंदी हटाई? क्यूं वो बिंदी लगाकर स्टेज पर या यूं कहें समाज के सामने नहीं गयी? मैं ये सवाल उससे नहीं पूछ पाया क्यूंकि उस कार्यक्रम के बाद मैंने उसे नहीं देखा, सच कहूं तो मैंने उसे खोजा ही नहीं क्यूंकि ये सवाल पचाने में मुझे काफी वक़्त लगा।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों पर बातचीत हो रही है। हर क्षेत्र में महिलाओं की बढती भागीदारी, आगे बढ़ते समाज का एक अच्छा पक्ष हमारे सामने रख रही है। ऊपर लिखी घटना की छाप मेरे दिमाग में काफी गहरी थी तो मैंने पड़ताल को इस मुद्दे पर केन्द्रित किया। वर्तमान समाज में अकेली महिला एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिसपे बहुत कुछ आजकल लिखा जा रहा है, पर अकेली महिलाओं में भी विधवा महिलाओं पर आज भी खुल कर बात नहीं की जाती है।

महिला अधिकारों पर कई वर्षों से कार्यरत दीपा कौशलम ने बताया कि “अगर बात करें दुनिया की तो सन 2015 की ग्लोबल विडो रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में विधवाओं की संख्या 258,481,056 बताई है जो की 2010 के मुकाबले 9% अधिक है। उत्तराखंड के आंकड़ों की बात करें तो 2011 में हुई जनगणना के अनुसार 30 से 79 वर्ष तक की विधवाओं की संख्या 337295 है। यह आंकड़ा 2011 का है उस के बाद हम केदारनाथ आपदा झेल चुके हैं और भी कई तरह की घटनाओं के हम गवाह हैं जिससे यह आंकड़ा और बढ़ा है। उत्तराखंड राज्य से काफी लोग सेना में हैं तो यहां पर शहीदों की विधवाएं भी काफी ज़्यादा है।

हमारे समाज में विधवाओं को एक अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। शास्त्रों में कही बातों के अनुसार उनके पापों की वजह से वो विधवा हुई हैं। विधवा होना सबसे पहले उसकी सामाजिक पहचान को ख़त्म करता है क्यूंकि पुरुष प्रधान समाज में उसकी पहचान का केंद्र पुरुष ही है। अगर वही ख़त्म हो गया तो कैसी पहचान? विधवा होना उसकी ज़िंदगी का हर रंग छीन लेता है। शादी या अन्य सामाजिक कार्यक्रमों से उसकी उपस्थिति ख़त्म हो जाती है।

राज्य महिला आयोग उत्तराखंड की सचिव रमिन्द्री मन्द्रवाल ने बताया कि, इस तरह की स्थिति किसी भी महिला को अलग-अलग स्तर पर तोड़ देती है जैसे कि भावनात्मक, आर्थिक तथा सपोर्ट सिस्टम। भावनात्मक रूप से देखें तो किसी भी महिला के लिए कठिन होता है इस स्थिति को समझ पाना क्यूंकि बच्चों का भविष्य और खुद का भविष्य उसे धुंधला नज़र आने लगता है। आर्थिक स्थिति बहुत ज़्यादा प्रभावित होती है, क्यूंकि उत्तराखंड में भी अधिकांश महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। ऐसे में उन्हें अपनी ज़रूरतों के लिए आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। तीसरा अगर सपोर्ट सिस्टम की बात करें तो उन्हें न सास-ससुर से मदद मिल पाती है और न ही माँ-बाप ही अच्छे से सपोर्ट कर पाते हैं। विधवा होना एक तरह से उनके अस्तित्व की ही लड़ाई है। दुबारा शादी का सवाल भी आसान नहीं है, क्यूंकि शादी तो हो जाए पर सवाल बच्चों का भी है। ये असमंजस की स्थिति हमेशा बनी रहती है कि पता नहीं कोई दूसरा पुरुष बच्चों को अपनाएगा या नहीं, ऐसे में वो अकेले ही रहना ज़्यादा सही समझती हैं।

केदारनाथ आपदा के बाद उत्तराखंड के चमोली जिले के करीब 150 परिवारों वाले देवलीभणी गांव में लगभग 50 विधवाएं हैं। जिसमें करीब 20 की उम्र बहुत कम यानि 25 साल के करीब है। वहीं की एक लड़की रचना कपरवाण ने कहा कि मुझे दुःख होता है जब मैं देखती हूं कि शादी पार्टियों में इन्हें शामिल नहीं होने देते, मेकअप नहीं करने देते। उसने हँसते हुए बताया कि, “मेरी एक हमउम्र दोस्त विधवा है, उसके बारे में मैंने एक सपना देखा कि उसकी दुबारा शादी हो रही है। पर सच में यह एक सपना ही है, मैं चाहती हूं उन्हें इज्ज़त मिले, वो स्वतंत्र हो और किसी एन.जी.ओ के सहारे ज़िंदगी न काट दें या किसी के दबाव में न आयें। वो अपनी अधूरी ज़िंदगी को पूरा जियें और जो कमी है उसे भरने की कोशिश करें।”

उत्तराखंड में अकेली महिलाओं पर एक ग्रुप ‘स्वयं सिद्धा’ कार्य कर रहा है। ‘स्वयं सिद्धा’ की संचालिका शोभा रतूड़ी ने बताया कि “अधिकारों पर बात करना बहुत ज़रुरी है। विधवा पेंशन को बढ़ाने की बात हमने सरकार के सामने रखी थी जो मुख्यमंत्री ने मानी भी थी। जनसुनवाई हमारा एक तरीका है अकेली महिलाओं तक पहुंचने का जिसमें शहर और गांव की महिलाओं की अलग-अलग समस्याओं से हम रूबरू होते हैं।”

विधवा महिला को डायन कह देना या पति की मौत के लिए उसे जिम्मेदार ठहराना पूरे भारत में आम है। ऐसी महिला का चरित्र हमेशा शक के दायरे में डाल दिया जाता है, चाहे वो किसी से भी 2 मिनट बात भी कर ले। किसी पुरुष की पत्नी की मौत हो जाने पर साल दो साल में हम बच्चों के नाम पर उसकी शादी करवाने पर तुल जाते हैं, पर उसी स्थिति में जब किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाए तो हम समाज की दुहाईयां देने लगते हैं। एक और बात यह भी है कि बच्चों के नाम पुरुष की शादी करा के उसे सेक्स लाइफ को आगे बढ़ाने की छूट है पर महिलाओं के साथ ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नजदीक जनजातीय क्षेत्र जौनसार में नज़रिया थोड़ा अलग है। अगर कोई लड़की विधवा हो जाती है तो उसे हीनता से नहीं देखा जाता और अगर वो अपने माँ-बाप के घर लौटना चाहे तो उसे पूरे अधिकार मिलते हैं। रहने की जगह खेती-बाड़ी के साथ-साथ उसके बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी उसके नजदीकी रिश्तेदार अच्छे से निभाते हैं। कुछ अन्य जनजातीय क्षेत्र भी इस तरह के भेदभाव से परे हैं। ऐसे में एक सवाल मेरे मन में आता है कि जिन जनजातीय क्षेत्रों को हम पिछड़े हुए और जंगली कहते हैं, क्या वो हमारे मुख्यधारा के समाज से सोच में कई सदी आगे नहीं हैं? जो एक दुर्घटना से किसी की ज़िंदगी की मुस्कान नहीं छीन लेते।

कोई एक घटना या दुर्घटना किसी की ज़िंदगी की मुस्कान नहीं छीन सकती न रंग छीन सकती है। आप भी अपने आस-पास हो रही ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रियाएं ज़रूर दें। दुनिया बदलने की पहली कड़ी हम हैं और इस तरह के भेदभाव को हमें ही रोकना होगा।

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