रावघाट खदान के लिए आदिवासियों के गांव उजाड़ रही है छत्तीसगढ़ सरकार

Posted by Tameshwar Sinha in Environment, Hindi
March 24, 2017

रावघाट, जिला कांकेर छत्तीसगढ़,  रावघाट में आयरन ओर (लौह अयस्क) की खदान बनने से इस इलाके के वन, प्राकृतिक परिवेश, जीव-जानवर, नदी-नाले-झरने आदि सब नष्ट हो जाएगा। साथ ही उक्त पहाड़ में युग-युगांत से रह रहे आदिवासी-मूलनिवासी ग्रामीणों का जीवन भी तहस-नहस हो जाएगा। इसे देखते हुए दायर की गयी रिट पिटीशन (पीआईएल) क्र. 26/2017 के संदर्भ में 23/03/2017 को माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ ने भारत एवं राज्य सरकार के सम्बंधित मंत्रालयों, विभागों और भिलाई इस्पात संयंत्र को इस सम्बन्ध में नोटिस भेजा है।

बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता तिरु. अरविन्द नेताम के साथ कांकेर जिले के अंतागढ़ क्षेत्र के दो साहसी और अनुभवी आदिवासी नेता तिरु. रामकुमार दर्रो और तिरु. राईपाल नुरेटी ने मिलके छत्तीसगढ़ के मुख्य न्यायालय बिलासपुर में जनहित याचिका दायर की है। यह याचिका NMDC (National Mineral Development Corporation) तथा भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा कांकेर एवं नारायणपुर जिले की रावघाट घाटी के 883.22 हेक्टेअर इलाके में निर्माणाधीन आयरन ओर खदान के खिलाफ की गई है। उक्त याचिका में भिलाई इस्पात संयंत्र के साथ-साथ छत्तीसगढ़ सरकर के वन विभाग, भारत सरकार के पर्यावण एवं वन मंत्रालय और मिनिस्ट्री ऑफ़ ट्राइबल अफेयर्स को भी पार्टी बनाया गया है।

इस खदान की एनवायरनमेंट असेसमेंट रिपोर्ट में लिखा गया है कि उक्त खदान के इलाके में कोई गांव है ही नहीं। लेकिन ताज्जुब की बात ये है कि एक राइट टू इनफार्मेशन (RTI) के जवाब में अंतागढ़ के तहसीलदार ने स्वयं 10 गांवों का नाम दिया है जो इस खदान के इलाके में आते हैं।

आपको शायद याद होगा कि सन 2013 में बी.एस.एफ. (बॉर्डर सिक्योरिटी फाॅर्स) द्वारा बलपूर्वक रावघाट घाटी के दो गांव – आंजरेल एवं पल्लाकसा को खाली करवाया गया था। अभी पूरे रावघाट पहाड़ी क्षेत्र में 30 से भी ज़्यादा बी.एस.एफ. और सशस्त्र सीमा बल के कैंप मौजूद हैं और रावघाट अंचल की विस्तृत जगहों में हर 2 किलोमीटर की दूरी पर एक फौजी कैंप है। इनके लिए इलाके के आदिवासी-मूलनिवासियों से किसी भी तरह की सहमति नहीं ली गयी है।

सिर्फ ये ही नहीं, रावघाट घाटी में 20 से भी ज़्यादा गांवों के वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के अनुसार सही प्रारूप में सामूहिक, उपचारिक एवं व्यक्तिगत वनाधिकार पत्रक के आवेदन भी अंतागढ़ की तहसील, साब-डिविज़नल ऑफिस आदि में पड़े हुए है। ऐसी स्थिति में, भारत सरकार के आदिवासी मंत्रालय द्वारा दिए हुए गेजेट नोटिफिकेशन के अनुसार वनभूमि के खदान, कारखाना और तथाकथित ‘डेवलपमेंटल’ प्रोजेक्ट्स के लिए डायवर्जन के पहले, वनाधिकारों का सेटलमेंट हो जाना ज़रूरी है। ऐसे में रावघाट घाटी में स्थित 20 से भी ज़्यादा गांवों के वनाधिकारों का सेटलमेंट नहीं होने के बावजूद भी भिलाई इस्पात संयंत्र को खदान के लिए कैसे सम्पूर्ण फारेस्ट क्लीयरेंस मिल गया?

माननीय सुप्रीम कोर्ट के नियमगिरि जजमेंट, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि आदिवासियों के धार्मिक महत्व के किसी भी इलाके को, पंचायत (एक्सटेनशन) टू शिड्यूल्ड एरियास एक्ट 1996 के अनुसार ग्राम सभाओं के माध्यम से और गांववालों की सहमति लिए बिना किसी भी कारण से हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद गोंड आदिवासियों की धार्मिक घाटी रावघाट में माइनिंग की परमिशन कैसे मिल गयी? याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की है कि रावघाट खदान के इलाके में सहमति लेने के वास्ते ऐसा कुछ भी नहीं किया गया।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 हर इंसान को उसके धार्मिक विश्वास के साथ जीने का मूलभूत अधिकार देते हैं। याचिकार्ताओं की शिकायतों के अनुसार, रावघाट पहाड़ी में खदान बनने से उक्त अंचल के गोंड एवं अबुझमड़िया आदिवासियों के उक्त अधिकारों का हनन हो रहा है। एक और ज़रूरी बात ये भी है कि उक्त खदान के लिए प्रस्तावित और निर्माणशील रेल रास्तों के कारण भी वनभूमि और आदिवासियों के महत्वपूर्ण देवस्थलों, मरघटों, सामूहिक एवं व्यक्तिगत ज़मीनों को चपेट में लेते हुए तथाकथित ‘विकास’ का काम किया जा रहा है।

सरकार द्वारा इस दौरान दल्ली-राजारा से भानुप्रतापपुर हो के अंतागढ़ हो के रावघाट पहाड़ी के गहन वन में स्थित कुरसेल-ताड़ोकी-तुमापाल हो के खदान के कोर इलाके भैंसगांव तक की वनभूमि में जंगलों के कटान, समतलीकरण और कुछ कंस्ट्रक्शन का काम भी हो चुका है। इसके खिलाफ दिल्ली के पर्यावरण कोर्ट (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) की मुख्य बेंच में भी प्रकरण चल रहे हैं। बस्तर जिले में जगदलपुर से रावघाट पहाड़ी की ओर बढ़ता हुआ निर्माणाधीन रेलमार्ग के लिए भी आदिवासी मरघट, देवस्थल आदि को नष्ट किए जाने का आरोप है। कुल मिलाकर, रावघाट पहाड़ी में माइनिंग के चलते वहां की स्थिति बहुत ही गंभीर है।

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