क्या अब BJP ही मंडल और कमंडल दोनो राजनीति का इकलौता चेहरा है?

Posted by Abhishek Naman in Hindi, Politics, Society, Staff Picks
March 30, 2017

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान ने उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव नतीजे आने से पहले ही कहा था कि, इस चुनाव में बीजेपी के पास मंडल भी है, कमंडल भी है और नोटबंदी के बाद उसके पास कार्ल मार्क्स भी हैं। इस विश्लेषण पर राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे ने उन्हें टोकते हुए कहा कि इस तर्क से तो बीजेपी की लगभग 300 से भी ज्यादा सीटें आने चाहिए। कमाल खान ने मुस्कुराते हुए उन्हें नतीजों का इंतज़ार करने को कहा। आज जब नतीजे आए 15 दिन से भी ज़्यादा बीत चुके हैं और बीजेपी भारी बहुमत से सरकार बना चुकी है, तो ये सोचना लाज़मी है कि क्या कमाल खान का विश्लेषण ठीक था?

90 के दशक में मंडल कमीशन के आने के बाद जब सामाजिक न्याय की राजनीति उफान पर थी, उस समय बीजेपी आडवाणी जैसे फायरब्रांड नेता के दम पर हिंदुत्व की ताल ठोक रही थी। राम मंदिर आंदोलन इसी कमंडल की राजनीति का परिणाम था और लगभग 20 सालों तक आरएसएस और बीजेपी मुख्य तौर पर इसी कमंडल की राजनीति को ही प्रतिबिंबित करते रहे। लेकिन अन्दर ही अन्दर आरएसएस ने विशाल हिन्दू समुदाय में गहरी पैठ बनाने की रणनीति भी जारी रखी। इस रणनीति की सफल परणीति 2014 के लोकसभा चुनावों में हुई जब अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में डेरा डाला और सफलतापूर्वक अनेकों जातियों को बीजेपी से जोड़ा। इसी क्रम में न जाने कितने जातिगत सम्मेलन आयोजित किये गए और नतीजा रहा उत्तर प्रदेश में 73 सीटें।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या बीजेपी से पिछड़ी जातियों का जुड़ाव बीजेपी को मंडल की राजनीति का भी चेहरा बनाता है? या फिर ये मंडल के कमंडल में विलीन हो जाने की प्रक्रिया की शुरुआत थी? अगर उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो ये निश्चित तौर पर मंडल के कमंडल में विलीन हो जाने की शुरुआत थी क्योंकि न तो अब 90 के दशक जैसा मंडल आंदोलन रहा न ही उसके नायकों में वैसा दम। दूसरा आरएसएस ने भी पिछड़ी जातियों को, मुस्लिम विरोधी भावनाओं के आधार पर ये काफी हद तक यकीन दिला दिया है कि एकीकृत विशाल हिन्दू समुदाय ही उसके हितों की अंतिम शरणस्थली है।

मार्क्स पर जाने से पहले यहां बसपा के वोटबैंक समझे जाने वाले दलित समुदाय की बात करना भी प्रासंगिक होगा, क्योंकि गरीबों का एक बड़ा तबका इसी दलित समुदाय से आता है। दरअसल नरेन्द्र मोदी और आरएसएस ने बीते कुछ सालों में  जिस तरह से अम्बेडकर को अपनाया है उसके बाद यह कहना मुमकिन न होगा कि दलितों की एकमात्र मसीहा मायावती ही हैं। वर्तमान युग में आज की दलित नौजवान पीढ़ी को अम्बेडकर तो पसंद हैं लेकिन उस तौर पर नहीं जिस तरह दलित चिन्तक उन्हें पेश करते हैं। आपको दलित मंदिर जाते हुए भी मिल जायेंगे। उनके अपने अनुभव भी ‘सवर्णों’ को लेकर बदले हैं। एक बड़ा दलित तबका अपने आपको हिन्दू समुदाय से अलग मानने के लिए बहुत उत्साहित नहीं है जैसा की कट्टर अम्बेडकरवादी चाहते हैं। इसके पीछे भी व्यापक तौर पर आरएसएस द्वारा चलाई गयी मुहिम का हाथ है। जिसका निष्कर्ष है कि दलित नौजवानों का एक बड़ा तबका अपना नेता, पुराने तौर तरीकों वाली मायावती के बजाय अपने आपको दलितों और गरीबों का मसीहा बताने वाले नरेन्द्र मोदी को मानने लगा है। साथ ही अगर ये कहें कि अम्बेडकर की बहुजन राजनीति का भगवाकरण शुरू हो चुका है तो गलत नहीं होगा और मंडल की तरह दलित अस्मिता की राजनीति भी कमंडल में ही शरण लेगी।

अब बात आती है मार्क्स की, जो आम समझ के आधार पर गरीबों और मजदूरों को रिप्रेजेंट करते हैं। इस सन्दर्भ में नोटबंदी के दौरान दिया गया उमा भारती का बयान महत्वपूर्ण है कि, “नरेन्द्र मोदी ने वह कर दिखाया है जो कार्ल मार्क्स डेढ़ सौ साल पहले करना चाहते थे।” भले ही कार्ल मार्क्स एक उत्तर प्रदेश की ज़मीनी राजनीति में एक नामालूम नाम हों लेकिन जिस तरफ इशारा उमा भारती कह रही थीं उस बात से ये स्पष्ट हो रहा था कि नोटबंदी से ये सन्देश देने की कोशिश की जा रही थी कि, नरेन्द्र मोदी ही गरीबों के असली मसीहा हैं। गंभीर आर्थिक विमर्शों से इतर नोटबंदी से बीजेपी ये सन्देश देने में सफल रही कि आम गरीबों के लिए नरेन्द्र मोदी की सरकार ही जोखिम भरे कड़े फैसले कर सकती है। बात साफ कही जा रही थी कि असली उद्देश्य तो बड़े सेठों का पैसा लेकर गरीबों तक पहुंचाना है और आम गरीब इस बात से संतुष्ट नज़र आ रहा था कि थोड़ी दिक्कतों के बावजूद बड़े उद्देश्य की पूर्ति होगी।

यहां यह स्पष्ट करना ज़रुरी हो जाता है कि ये मानना एक भूल होगी कि उत्तर प्रदेश में बीता चुनाव जातिगत गोलबंदी पर नहीं लड़ा गया, अपितु यह घोर जातिगत चुनाव था। महत्वपूर्ण ये रहा कि गैर यादव और गैर जाटव का बहुसंख्यक तबका कमंडल की शरण में जा चुका है। अब देखना ये होगा कि क्या अपने पिता की राजनीतिक शैली से दूरी बना के रखने वाले अखिलेश यादव जो केवल यादव और मुस्लिम वोट ही प्रमुखता से पा सके, इस जुगलबंदी को तोड़ने का कोई रास्ता निकाल पाते हैं। समाजवादी पार्टी के एक विधायक जो कि चुनाव जीते हैं कि टिपण्णी गौर करने लायक है “ये चुनाव कैसा भी रहा हो, विकास का तो नहीं था” वे आगे कहते हैं कि “इस बार बीजेपी के पास मुस्लिम बनाम हिन्दू के साथ साथ यादव बनाम अन्य पिछड़ा का भी कार्ड था।”

अंत में ये कहा जा सकता है कि निश्चित तौर पर बीजेपी के साथ एक बड़ा समुदाय था तभी उसे इतनी बड़ी जीत हासिल हुई और अब उसे बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी कहना बड़ी गलती होगी। भले ही बीजेपी की केंद्र में नीतियां उस हद तक गरीबों के हित में न हों जितना वो दावा करती है लेकिन अब वह निश्चित तौर पर गरीबों के एक बड़े तबके की भी आवाज़ है।

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