अपने ही घर के चौकीदार की लाठी छीन रहे हैं हम

Posted by Vivek Upadhyay
April 18, 2017

Self-Published

हम शुक्रगुजार हैं, इस भारत के और हमारे रक्षक सैनिकों के। जब भारत का नाम आता है और उसमें एक सैनिक का भी नाम जुड़ जाए तो खुद-ब-खुद हर भारतीय का सीना फक्र से चौड़ा हो जाता है। बस शर्म तो तब आती है, जब अपनी जान पर खेल कर हमारी रक्षा कर रहे इन सैनिकों पर हम में से कुछ भारतीय ही लात-घूसे चलाते हैं। वो भी महज इस वजह से क्योंकि इस देश को तबाह करने वाले आतंकवादी उन्हें इस काम के लिए चंद रुपए देते हैं। हमारे ही देश के खिलाफ नारे लगा देते हैं, झंडा जला देते हैं। उन रक्षकों को बीच सड़क पर पीट दिया जाता है। फिर भी वे बस इसलिए ही चुप रहते हैं, क्योंकि वे हमारे रक्षक हैं। उन्हें न तो किसी ने रोका है और न ही वे इस बंदीश में है कि हमारी मार खाये। ऐसे भारत देश और रक्षकों के हम शुक्रगुजार हैं। क्योंकि वे सैनिक हाथ उठाते हैं तो भी हमारी मदद के लिए, तब जब हम बाढ़ में डूब रहे हैं, तब जब वही आतंकवादी हम पर हमला कर देते हैं। तब जब हमारा परिवार उन आतंकवादियों द्वारा फेंके गए बम और गोलियों के बीच फंसा हुआ हो। तब सिर्फ उन रक्षकों का ही हाथ होता है जो उठता है, हमारी मदद के लिए।

पिछले चंद दिनों में हमारे देश में सब बहुत कुछ घट गया है कि हमें हमारे भारतीय होने तक पर शर्म महसूस होने लगी है। भारतीय सैनिकों पर हमला करने वाले कोई और भाई नहीं होते हैं। वहीं लोग होते हैं जिसकी सुरक्षा के लिए आठों पहर कड़कती गर्मी और तेज ठंड में भारतीय सेना आप लोगों से कई ज्यादा गुना हथियार थाम कर खड़े रहते हैं। उन पर हमला करने वाले वही लोग हैं जब कभी प्राकृतिक आपदा होती है और जब प्रकृति अपना रूद्र रूप दिखाती है तो उसी बीच यह भारतीय जवान उनकी सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देती हैं। इनकी इतनी गिरी हुई हरकतों के बाद भी भारतीय सेना के जवानों के चेहरों पर बस मुस्कुराहट रहती है क्योंकि वह जानते हैं कि जब हमारे ही घर के अपने ही लोग गलत राह पर चले जाएं तो उन्हें प्यार की भाषा से ही समझाया जा सकता है। पर यह बात भी बिल्कुल सही है कि किसी की सहनशीलता का ज्यादा फायदा भी नहीं उठाना चाहिए क्योंकि लंबे समय से सहनशील व्यक्ति की सहनशीलता जब टूटती है तो एक रूद्र चेहरा सामने आता है जो कि विनाश की ओर जाता है। आश्चर्य तो तब होता है जब इसी देश की राजनीतिक विचारों के लोग बड़ी-बड़ी डिबेट में अपने देश के लिए कुछकर गुजरने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं पर जमीनीस्तर पर संप्रदायवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर देश की जनता को आमने सामने खड़ा कर देते हैं। इन सब जोड़ों के बीच जब फिर कभी सुरक्षा की बात आती है तो संप्रदायवाद की लगाई आग में जलने के लिए भारतीय सेना को लाकर खड़ा कर दिया जाता है, जब देश के रखवालों की सुरक्षा पर सवाल खड़े होने शुरू हो जाएंगे तो फिर आप सोच सकते हैं कि वह दिन दूर नहीं हम फिर उसी गुलामी की राह पर कदम बढ़ा रहे हैं।

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