आखिर क्यों सिर्फ एक शब्द !!!!!!!! किन्नर

Posted by Shippra Mishra
April 6, 2017

Self-Published

कुदरत भी वाकिफ थी उसके बनाये इस संसार में हो रहे भेदभाव और  अन्याय से, उसे भी इस बात का अंदाजा हो रहा था की जो मिट्टी के पुतले उसने बनाये हैं, उनमें कुछ कमी रह गयी, उसने औरत बनायीं तो मर्द  होने का दबदबा लेकर पुरुष आ गये….और पुरुष बनाया तो बलिदान की मूरत के रूप में औरत आ गयी….

 

जब कुदरत से हुयी इस भूल को उसने समझा तो अपनी भूल सुधारने के  लिए उसने किन्नरों के अस्तित्व को गढ़ना शुरू किया, जिसमे ना तो वो पूर्ण रूप से पुरुष है और ना ही महिला. उसमे दोनों की शक्तियां  विद्यमान हैं, उसमे पुरूषों की पौरुषता भी है तो महिला होने का गौरव भी है,
एक औरत पर हो रहे अत्याचार का अंदाज़ा मरदानगी दर्शाने वाले  पुरुषों से ज्यादा उस किनारे को है इसिलए किसी भी औरत के अपमान में किन्नर का नाम कभी नहीं आता. ठीक वैसे ही एक पुरूष के परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी निभाने का जज़्बा एक महिला से ज्यादा किन्नरों को पता है तभी वो एक पुरुष की तरह खुद ही अपनी रोज़ी कमाने निकलते हैं. 

कुदरत के इस तोहफे को स्त्री और पुरुष के बीच के भेद को मिटने के  लिए ही गढ़ा गया है, फिर भी इस वरदान का जगह जगह तिरस्कार ही होता आया है. उन्हें ऐसा होने की सज़ा हर पल भुगतनी होती है, समय  बदल रहा है और कुछ लोगों की सोच भी, पर “हम अकेले क्या बदलाव लाएंगे” इसी मानसिकता के कारण आज भी उस किन्नर को ज़िल्त भरी ज़िन्दगी जीनी पड़ती है. 

पुरुषों और महिलाओं की जिन खूबियों को उभारने के लिए और कमियों को ढकने के लिए जो किन्नरो के रूप में हमारे समक्ष है उसका सम्मान करने की जगह उसको दुआओं और बदुआओं की पोटली समझा जाता है, कोई भी शुभ अवसर हो किन्नरों को बधाई गाने के लिए बुला लिया जाता है और अंत में कुछ कीमत अदा करके उसे विदा कर दिया जाता है, क्या यही इंसानियत है की जो आपके शुभ अवसरों में अकार दुआओं की पेटियां भर के जाते हैं उन्हें सिर्फ इसी काम के लिए बनाया गया है ऐसा नक्की कर दिया है हमने…..
पैसा से ज्यादा ज़रूरत उन्हें सम्मान की है, जो उन्हें कहीं नहीं मिलता. 

“शक्ति….” जैसे धारावाहिक और “कंचाना” जैसी फिल्में हमारे सामने इसिलए लायी गयी कि हम उस कहानी से सबक लेकर किन्नरों के स्वाभिमान को समझे और ये जाने की एक किन्नर भी अपनी ज़िन्दगी हम साधारण लोगो की तरह जी सकते है उन्हें भी अपने सपने पूरे करने का हक़ मिलना चाहिए….क्यों हमारे देश में सिर्फ एक्के दुक्के किन्नर ही आज किसी मुकाम पर हैं उसमें भी वहां पहुँचने के लिए उन्हें अपनी सहनशक्ति की सीमा को बेशर्मी के चरण तक ले जाना पड़ा होगा, ना जाने कितनी जिल्लत और ठोकरों का सामना करना पड़ा है, हम सभी आम लोगों को पता है की हमे अपनी ज़िन्दगी में क्या बनना है, पर क्यों कोई ये सवाल एक किन्नर से नहीं पूछता। 

अफ़सोस की बात है की इतनी जागरुकता फैलाने के बाद भी आज किनरों की वही दशा है वो आज भी मजबूरी से अपनी गुजर बसर कर रहे हैं…..इसमें गलती किसकी है उन किन्नरों की जो अपनी खूबियां जानने के बाद भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पा राहे या हम जैसे लोगो की जिनकी हीनभावनाये एक किन्नर के हौसले और विश्वास को तार तार कर देती है…. 

एक बार सोच के देखें वो किन्नर है इसलिए मजबूर है या हम हीनभावनाओ से घिरे है इसलिए मजबूर है…… 

अरे छोड़िए!!!! लानत है हम पर, हमने उन्हें इंसान भी कहा रहने दिया ….उनके भविष्य के लक्ष्यों को जानना तो दूर की बात है, सड़क से गुजरने वालों पर तो हम पलट पलट कर टिप्पणियां करते नहीं थकते ….और बात करते है किन्नरों के जीवन सुधरने की….. 

ये भी किसी माँ की आँखों के तारे रहे होंगे….किसी पिता के कंधो चढ़े होंगे, लेकिन ये जानने के बाद की उनकी आँखों के नूर उम्र बढ़ने के साथ साथ किंनर में तब्दील हो रहे है तब जन्म देने वाले माता पिता भी शर्म खाने लगते हैं तब उनकी नज़र में समाज में उनकी मान मर्यादा उनकी ममता से ऊपर हो जाती है और वो अपने जिगर के टुकड़े कहे जाने वाले मासूमो को छोड़ देते है दुनिया की ठोकर खाने के लिए……. 

किन्नरों की दुआ खरीदत्ते हैं न हम सब 10 -10 रूपए में…..ज़रा संभल जाइये ….कही पैसे से खरीदी दुआएँ मजबूरो के दिल से निकलने वाली आह!!! के नीचे दबी न रह जाये….. 

माफ करना पर यही सच है…….अभी भी समय है ज़रा सोच के देखिये…… 

 

 

 

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