आदिवासियों के अधिकारों की बात कौन करेगा ??

Posted by Abhilash Sapre
April 15, 2017

Self-Published

भारत में आदिवासीयों की आबादी पुरे विश्व में दुसरे स्थान पर है । भारत में इनकी कुल जनसँख्या 8.6% है । जंगल और पहाड़ी शेत्र में रहने वाले इन लोगो की पहचान भौगोलिक स्थान,विभहिन्न संस्कृति,आर्थिक पिछड़ापन और समाज से दुरी है । आदिवासियों की जीवन पद्ध्हती,संस्कृति,प्रकृति से जुड़ाव उन्हें आधुनिक समाज और जीवन मुख्यधारा से अलग करता है । भारतीय संविधान आदिवासियों को शिक्षा,आरक्षण,रोज़गार,संपत्ति और किसी भी प्रकार के शोषण के लिए विशेष अधिकार और प्रावधान देता है । भारत में लगभग हर शेत्र में आदिवासियों की आबादी है । आधुनिक समाज और शेहर की दुरी की वजह से ऐसी कई मुख्य और मूलभूत सेवायों जैसे स्वास्थ,शिक्षा,बिजली से वंचित रह जाते है । तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट के मुताबिक आदिवासियों की साक्षरता दर मात्र 55% है । कई बुनयादी सवाल है जिन पर सरकार अपनी जवाबदेही नही लेती है ।आदिवासी शेत्र में विकास के नाम पर लोगो को सरकार,साहूकार,जमींदार,नौकरशाह,पुलिस,ठेकेदार द्वारा शोषित किया जाता है । मानवाधिकार आयोग के मुताबिक हर साल आदिवासियों पर अपराध की वारदातें बढ़ी है । पुलिस द्वारा गरीब महिलायों पर अत्याचार ,आदिवासीयों का शोषण, क़त्ल और ज़मीन अधिग्रहण किया जाता है । कानून व्यवस्था का बुरी तरह से दुरूपयोग करना और आदिवासियों को नक्सली समझ कर उनपे कई तरह के ज़ुल्म
करना आम बात हो गयी है । कई ऐसी संस्थाएं है जो आदिवासियों की सामाजिक,आर्थिक और न्यायिक रूप से मदद करती है और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने में प्रयत्न करती है । छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर जिले में हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया को बस्तर छोड़ने की लिए धमकी भरा ख़त भेज गया । बेल भाटिया 2007 से बस्तर में आदिवासियों को सामाजिक और न्यायिक मदद दे रही है । नक्सल प्रभावित शेत्रो में आदिवासियों के विकास,अधिकार और सुविधायों पर गहरा असर पड़ा गई । आदिवासियों के लिए आवाज़ उठाने वालो पर लगातार हमले किये जा रहे है । इससे छत्तीसगढ़ के आई.जी कलूरी और पुलिस विभाग पर भी कई सवालियाँ निशान खड़े हुए है । वही गत वर्ष पहले मालिनी सुब्रमनिअम के साथ भी यही हुआ था ।
सरकार की कई नीतियाँ,कल्याणकारी योजनाये इन इलाको में विफल रहीं है । पेसा क़ानून 1996 के अंतर्गत आदिवासी शेत्र के ग्राम सभायों को कई अधिकार दिए गये है जिसमें स्वराज,प्रकृति की सुरक्षा,ग्रामीण योजना,जमीनी अधिकार,प्रथा और रीतिरिवाज की सुरक्षा,वन उत्पाद पर अधिकार और कई ऐसी ताकत और अधिकार दिए गये जो आदिवासियों को मजबूत करें परन्तु इस कानून का पूर्ण रूप से उल्लंघन हुआ और कई प्रकार के शोषण के मामलें सामने आये ।
केंद्र और राज्य सरकार के कई नीति और योजनाए के बावजूद दोनों पूर्ण रूप से इन शेत्र में विकास करने में असफल रही । सरकार की इच्छा शक्ति ,प्रशासनिक कार्यविधि की कमी और नीतियों का कमज़ोर कार्यान्वित होना विफलता का मुख्य कारण रहा ।
सरकार को अपनी जवाबदेही तय कर वहा शिक्षा,कल्याणकारी योजनायें,न्याय और स्वास्थ सेवाएं को मज़बूत बनाना होगा ताकि वे आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ पाएं ।
अभिलाष सप्रे,
24,भारतीविद्यापीठ,पुणे

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