आरक्षण और जातिय भेदभाव

Posted by Pushkar Kashyap
April 23, 2017

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आज बहुत दिनों के बाद कुछ लिखने का मन हुआ तो सोचा की लिख ही डालूं, और जब से लिखने लगा हूँ ऐसा लगने लगा है के लिखना बहुत अच्छी बात है और आपका मन हल्का हो जाता है।
बचपन की यादों में गोते लगा रहा था और सोच रहा था के क्या दिन थे वो। कोई चिंता नहीं, एक अलग भारत और एक अलग दुनिया थी हमारी। चिल्ला चिल्ला कर राष्ट्रगान गाते थे स्कूल में और किसी को भी वो 52 मिनट बोझ नहीं लगता था। मुझे ही नहीं अबू शमीम, जसप्रीत सिंह, पंकज पासवान और रणजीत त्रिपाठी भी बहुत ही चिल्ला चिल्ला कर गाते थे। साथ में बैठ के टिफ़िन की घंटी बजते ही सबके डब्बे एक जगह खुल जाया करते थे और खूब चाव से खाना शेयर होता था और पीटी के समय खूब खेल कूद और धमाल भी होता था और जब छुट्टी होती थी तो गलबहियां कर के सारे दोस्त एक साथ निकलते थे। उस समय अगर आइसक्रीम मिल जाता किसी के पास तो छिना झपटी भी हो जाती थी, कोई जूठा नहीं,कुछ नहीं। दोस्त दिखा के बोलता था के जूठा हो गया है खायेगा और हम कहते थे हम ये सब नहीं मानते हैं लाओ आइसक्रीम।

समय बीतता चला गया 12वी का इम्तेहान और स्कूल ख़त्म, मन साफ़ था तब तक। लेकिन जैसे ही ये फॉर्म वॉर्म का झंझट शुरू हुआ पता नहीं कहाँ से मैं दोस्तों के नाम में जाति ढूंढने लगा। उस समय पता नहीं था कि ये मेरे मन में दीमक लगने की शुरुवात हो चुकी है। सरकार ने नियम कानून तो खूब बनाये हैं जाति पाति के भेद भाव को मिटाने के लिए, लेकिन एक उम्र आते आते वो बता देता है कि तुम ऊँची जाति से हो या नीचली जाति से, क्योंकि तुमको भी पता होता है कि तुमको दुगुनी मेहनत करनी है उसी चीज को पाने के लिए। सवाल है के क्यों, क्यों करूँ मैं इतनी मेहनत? सिर्फ इसलिए के मेरे पूर्वजों ने उनके साथ गलत किया था या फिर इसलिए क्योंकि जातीय आरक्षण दे दे कर सरकार का खाता वोट से भरता है। अगर गलत किया था पूर्वजों ने तो उसकी सजा के 70 साल काफी नहीं और वोट बैंक के लिए हमारा शोषण क्यों?

मैं एक दिन बिहार के एक दलित नेता का भाषण सुन रहा था के क्या नीचली जाति वालों ने कोई अर्जी दी थी भगवान् को की मुझको चमार बना दो, मुझको कहार बना दो, तेली बना दो, मुसहर बना दो, कोई भी अर्जी देकर नहीं आता। सौ टके की बात थी उनकी, लेकिन कृपया एक बार नजर घुमाएं और सोचें की क्या हमने अर्जी दी थी के हमको पंडित बना दो, हमको ठाकुर बना दो, लाला बना दो या वैश्य बना दो? नहीं न? तो फिर?सवाल थोड़े कठिन हैं क्योंकि दबी जुबान में ही सही सब मानेंगे के 70 साल बहुत होता है किसी जाति का उत्थान करने के लिए, सबको पता है के ये आरक्षण बस वोटबैंक का जरिया है। तो फिर आवाज़ क्यों नहीं उठाते सब मिल कर? चमार, दुषात, पंडित, राजपूत, कहार क्यों नहीं आते एक जगह?
कोई नहीं आएगा, क्योकि लालच है। लालच सत्ता का, लालच नौकरी का, लालच अपने जाति वालो को ऊँचे पदों पर देखने का। करो लालच और मन लगा कर करो लेकिन फिर इस खबर पर गुस्से वाला इमोजी भी नहीं देना फेसबुक पर जिसमे लिखा हुआ हो की फलाना गाऊँ में फलाना जाति के लोगों को फलाना जाति वालों ने अपने साथ बैठने नहीं दिया या फिर हत्या कर दी या फिर भेदभाव किया। क्योंकि गुस्सा तो तुमलोग ही भर रहे हो न जी, लाख पढ़ा लिखा दो आने वाली नस्लों को लेकिन वो भी जब ये फॉर्म भरेंगे न एक कीड़ा लगेगा उनके दिमाग को और वो ऐसी सड़न फैलायेगा न जिसकी बदबू इस देश को रहने लायक नहीं छोड़ेगी।

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