उलझता बचपन

Posted by Ravi Rathore
April 28, 2017

Self-Published

आज का आधुनिक दौर तकनीकी प्रधान चीजों का दौर है | इस तकनीकी प्रधान समय में रोजमर्रा के जीवन के संचालन के लिए साधन के तौर पर कई तकनीकी चीज़ों ने हमारे बीच अपनी गहरी पैठ जमा ली है | संचार तकनीक की तेज रफ़्तार प्रगति ने आज मोबाइल फोन की विकसित किस्म स्मार्टफोन को ज्यादातर लोगों के हाथों तक पहुंचा दिया है | इन स्मार्टफोनों का इस्तेमाल अब केवल बात करने तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि अब इसके द्वारा मनोरंजन से लेकर कई अन्य कार्यों को भी इन्टरनेट के माध्यम से पूरा किया जा सकता है | लेकिन जितनी तेजी से यह बड़े लोगों के हाथों में पहुंचा है उतनी ही आसानी से अब इसकी पहुँच छोटे बच्चों के नन्हें हाथों तक भी हो गई है |

एक दिन अपने मित्र के नंबर से आई हुई मिस कॉल पर जब मैंने उन्हें वापिस फोन मिलाया तो पता चला कि फोन उनके छोटे लड़के के पास था जिसकी उम्र ढाई साल है और वह कॉल उसी के द्वारा की गई थी | आगे की बातचीत में उन्होंने मजाक में मुझसे कहा कि उनके बच्चे अपने चाचा से (मुझसे) आईफोन की फरमाइश कर रहे हैं | जवाब में मैंने भी कहा कि ठीक है मैं उनके लिए फोन ला दूंगा, अभी उन्हें कौन सा आईफोन की पहचान ही होगी | लेकिन उनके ये कहने पर कि अब ये बच्चे फोन वाले खिलौने जिसमें बटन दबाने पर धुन बजने लगती है उससे बहलने वाले नहीं है, उन्होंने बताया कि उनका बड़ा लड़का जो अभी केवल पांच साल का है वो फोन में यूट्यूब (इन्टरनेट द्वारा वीडियो देखने का प्रचलित माध्यम) न होने पर अपने आप ही गूगल प्लेस्टोर से यूट्यूब डाउनलोड कर वीडियो प्ले कर लेता है | इस से ये बात साफ़ हो जाती है कि ये बच्चे भले ब्रांड की प्रतिष्ठा से वाकिफ़ न हो, लेकिन जाने अनजाने उनके हाथों में स्मार्टफोन की पहुँच ने उसकी कुछ कार्यप्रणालियों जैसे गेम्स और वीडियो प्लेटफार्म से अवगत करा दिया है | जिसे अब वह किसी फोन के अन्दर बुनियादी जरूरत के तौर पर देखते हैं और उसके इस्तेमाल के लिए लालायित भी रहते हैं |

स्मार्टफोन के प्रति छोटे छोटे बच्चों की ये लालसा जब आदत में तब्दील हो जाती है तो वह उनके सर्वंगीण विकास में बाधा उत्पन्न करती है | यह समस्या हमारे बीच पहले से ही कंप्यूटर, इन्टरनेट और वीडियोगेम्स के माध्यम से मौजूद थी लेकिन तब इसके दायरे में सीमित घरों और परिवारों के बच्चे थे | लेकिन स्मार्टफोन के अवतार ने इस समस्या को एक व्यापक रूप दे दिया है | अब एक सिम के माध्यम से (बिना केबल तार के झंझट के) इन्टरनेट और ऐसी स्क्रीन जो पहले के मुकाबले एक बड़ी आबादी के हाथ में किफायती कीमत पर हर जगह मौजूद होती है | इसके मेल ने जहाँ हमें बहुत सी सहूलियतें दी हैं, वहीँ इसने छोटे बच्चों को अपनी गिरफ्त में लेते हुए उनके शारीरिक और मानसिक विकास को अवरुद्ध करने का काम किया है | अक्सर बड़े अपने किसी काम में छोटे बच्चों द्वारा बाधा उत्पन्न करने के बचाव के विकल्प के तौर पर उनके हाथ में फोन थमा देते हैं, जो धीरे-धीरे उनकी दिनचर्या का अंग बन जाता है | ऐसा होने पर खेल कूद की शारीरिक और सीख सकने की विभिन्न मानसिक गतिविधियों से वह दूरी बनाने लगता है जिसकी बचपन के इस दौर में बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत होती है | घर पर बड़ों की बाइक या कार होने पर वैधानिक उम्र से पहले ही बच्चे उसे चलाने का प्रयास करते हैं | लेकिन भले ही अभिभावक उस पर रोक न लगाते हों पर अपनी मौजूदगी में उनके सीखने के इस प्रयास पर निगाह बनाए हुए साथ अवश्य रहते हैं क्योंकि जरा सी भी गलती होने पर दुर्घटना के कारण चोट आ सकती है | यह चोटें शरीर पर साफ़ तौर पर ही तुरंत हमें नजर आ जाती है | इसी वजह से हम उसके प्रति सचेत रहते हैं | लेकिन स्मार्टफोन के साथ बच्चों की इस नजदीकी का उनके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या नकारात्मक असर पड़ता है, इसे तत्काल साफ़-साफ़ देख पाने में हम असमर्थ रहते हैं | जिस कारण हम बच्चों को बिना निगरानी के ही फोन का इस्तेमाल करने देते हैं | बच्चे बढ़ती उम्र के साथ इंटरनेट के इस अथाह मायाजाल भरे संसार में रूचि लेने लगते हैं और बिना किसी मार्गदर्शन के वह इसमें डूबते हुए कहीं खो जाते हैं |

हमें तकनीक का लाभ लेते हुए इसके प्रति सतर्क भी रहना चाहिए | क्योंकि अविवेकपूर्ण तरीके से इसका इस्तेमाल सभी के लिए वरदान की जगह अभिशाप बन सकता है | तो फिर छोटे बच्चे जिनके विवेक को बनाने की जिम्मेदारी बड़ों पर होती है, उनके मासूमियत भरे इस नाजुक दौर में जब उनका विवेक विकास (जानने और सीखने) की शुरूआती प्रक्रिया में होता है, तब जाने अनजाने स्मार्टफोन नामक यह बाधक यंत्र हमारे द्वारा उनके करीब पहुँच जाता है | इससे ज्यादा से ज्यादा दूरी ही बच्चों के विकास के लिए लाभदायक है |

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