कश्मीर

Posted by Adarsh kumar
April 18, 2017

Self-Published

कश्मीर चलें  हम.
पिछले कुछ दिनो से मेरे दिल मे भी बाँकी देशवासियों की तरह दर्द और दुख की एक लहर सी उठी है ! माफी के साथ मै कुछ कहना चाहता हूँ क्युँकि मेरे समझ से अब कहने सुनने को कुछ बचा नही है ! पिछले कई वर्षों से अखबार और tv  देख देखकर बहुत उदास सा हो गया हूँ ! दरसल बात अखबार की नही है ; बात तो उन गणमान्य लोगों की है जो उसमे अपने वक्तव्य देते हैं ! रोजाना.. हफ्ते के पाँच दिनो तक सालों से रात 9 बजे से लगभग सभी पत्रकार मित्र अपने कुछ साथियों को लेकर ; वातानुकूलित कमरे मे बैठकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक का सफर तय कर लेते हैं ! ये सफर 10 बजे समाप्त होता है ! शनिवार और रविवार को और भी बड़े बड़े कर्यक्रम होते हैं ! इन कार्यक्रमों का अपना महत्म्य है ; एक दूसरे पर व्यंगात्मक प्रहार करना खूब सीखने को मिलता है ! एक दूसरे की खिंचाई भी खूब होती है ! इतना सब कुछ होने के बाद समस्या पर चर्चा प्रारंभ होती है. समस्या की व्यख्या भी अपने अपने तरीकों से सभी करते हैं! कोई शोर करता है तो कोई चुटकी लेता है ! ये सब सब करके खुद को लोकप्रिय बनाने का प्रयास भी धीमे धीमे होता है. और हो भी क्यू ना !!  सभी अपने अपने जगह खुद मे एक नेता हैं ! समस्या पर हर तरह की चर्चा होती है और एक हद तक ये होना भी चहिये ; भले ही उसका मकसद कुछ भी हो. लेकिन ये 9बजे के प्राइम टाइम ने हम लोगों को समस्या मे ही उलझा कर रख दिया ! समस्या की चर्चा होनी चहिये लेकिन समस्या से ऊपर समाधान होता है !  समस्या तो प्रकट है..सबके सामने है. साक्षात है.. उसकी चर्चा कर के खुद को काबिल कहने वाले लोग ये समझ ले की उनके इतने सालो की चर्चा का परिणाम है की किसी भी समस्या से निकलने का परिणाम शून्य मात्र है ! समस्या की जितनी वृहद चर्चा होती आ रही है  ;उतनी ही चर्चा समाधान की हुई होती तो शायद देश की दिशा और दशा कुछ और होती ! हम एक दूसरे पर रोज़ तंज़ न कस रहे होते और उस समय क सदुपयोग कर कुछ  समाधान ढ़ूंढ़ा होता तो आज ये हालात ना होता .
जब लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने अपनी पुस्तक लिखी y socialism ; तो उस पुस्तक मे उन्होने गाँधी जी पर कई तंज़ कसे जो आज हम सब रोज़ 9 बजे देखते हैं. उस पुस्तक के जवाब मे गाँधी जी ने लोकनायक को पत्र लिखा जिसमे उन्होने जय प्रकाश जी की तारीफ करते हुए कहा की आपका मेरे कार्य को लेकर किया गया विश्लेषण बहुत खूब है . बस इसमे कमी है तो एक बात की कि आपने कुछ दूसरा रास्ता नही सुझाया है. ! इस एक मात्र पत्र ने जय जी को सोचने पे मजबूर कर दिया ! आखिर पढ़ा लिखा व्यक्ति भी केवल समस्या कि गिनती करे तो समस्या और भी जयदा फैल जाती है . भारत जैसा देश जहाँ  3% लोग ही स्नातक या उससे ऊपर तक शिक्षित  हैं वो भी अपना वक्त समाधान नही बल्कि समस्या गिनने मे लगायेंगे  तो समस्या और भी बड़ी होगी. उसकी बीज वटवृक्ष बनते देर नही लगेगी !
आज कि पीढी को तय करना होगा कि जो चंद लोग जिन्हे शिक्षा लेने का सुनहरा अवसर मिला है. वो समस्या को समस्या के रूप मे चर्चा करना पसंद करेंगे या समाधान ढूंढना  पसंद करेंगे.दरसल बात पसंद नापसंद की नही है  ;बात तो देश और इंसानियत की है.

कश्मीर के हालात पर कई तरह के तंज़ और व्यंग सुनने को मिलते हैं. लेकिन समाधान इनमें से किसी के पास नही है. कोई केहता है चुप हो जाओ तो कोई कहता है पूरा मामला ही ख़त्म करदो ! क्या 125करोड़ लोगों मे एक भी भगत सिंघ या अम्बेडकर पैदा नही हुआ जो समाधान बताये ! बस इतनी सीमित है हमारी होशियारी !!?? सालों से व्यंग करने मे तो हम अव्वल हैं लेकिन सालों से कोई समाधान नही सोच पाया !! लालत ऐसी शिक्षा जो समाधान न सुझा पायी ! जो भगत सिंह ना पैदा कर पायी.. अगर 3% शिक्षित लोगों का ये स्तर है तो ये कहने मे कोई संकोच नही है की हम अभी भी अशिक्षित हैं या गुलामी मानसिकता से जकड़े हुए हैं  ! भगत सिंघ ने इँकलाब का नारा दिया ताकि कोई भी समूदाये अपने आपको छूटा हुआ मेहसूस न करे  ! वो तोड़ना नही जोड़ना  चाहते थे ! लेकिन आज का युवा न जोड़ना चाहता है ना तोड़ना चाहता है वो तो इन सब चीजो से खुद को मोरना चाहता है. अम्बेडकर जी ने बहुत पढाई की ;लेकिन वो पढाई क्या जो देश के काम न आये ! उन्होने धरातल पर अपने पढाई को उतारा !

कश्मीर कि समस्या भी समाधान कि गुहार लगा रही है. वक्त और वर्तमान  ; इतिहास और भविष्य दोनो ही हमे माफ नही करेगा. हमे अपने निजी लाभ हानि छोड़ वहाँ के लोगों को अपना कान देना होगा… सुनना होगा. निदा फाज्ली जी क शेर है – मुँह कि बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन..आवाजों के बाज़ारों मे खामोशी पहचाने कौन..

ये शेर कश्मीरी भाई और मेरे फौज के भाई दोनो के लिये सटीक है. कुछ हुक्मरान 10% मत पाकर  कश्मीरियों कि आवज़ बने हुए हैं. लेकिन कश्मीरियों के वास्तव दर्द को कोई समझा नही.
उसी प्रकार कुछ नेता कहते हैं सेना ये करेगी वो करेगी  ..लेकिन उस मेरे सैंकिन का  भी परिवार है.उसके दर्द का क्या ??
दो गुट जब दर्द मे होते हैं तो नफरत फैलती है. नफरत हिंसा का रूप लेती है. जो आज हो रहा है.
मै तो 18वर्ष कि आयु मे इतना ही समझ पाया हूँ लेकिन मै समाज के गणमान्य सभी लोगों से कहना चाहता हूँ कि आप बहुत सौभाग्यशाली हैं जो आप उन 3% शिक्षित लोगों मे हैं.. कृप्या कुछ सोचें  ! अब तो ये समस्या भी समाधान कि गुहार लगा रही है. तो कट पीट के रातों मे जलने लगेगी सम्भलो ये दुनिया (पियूष मिश्र।)
अंत मे यही कहूँगा अपने कश्मीरी भाइयों बहनों से और अपने सभी सैनिक बालों के जवानों से –  अब जो कुछ भी हुआ उसे भुला देना है अब से दुश्मन को भी दुआ देना है.. आ मेरे यार अब गले से लग जा फ़िर देखेंगे क्या लेना है क्या देना है.(munnawar rana )

धन्यवाद !

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