कृष्ण संवाद

Posted by Gaurav Pandey
April 4, 2017

Self-Published

पहली जॉब छोड़ने के बाद इधर-उधर घूम रहा था, नयी जगहें देख रहा था, पुराने दोस्तों से मिल रहा था और नए दोस्त बना रहा था। जॉब छोड़ने के निर्णय को लेकर कॉम्प्लिमेंट्स भी मिल रहे थे तो कहीं-कहीं आलोचना भी हो रही थी। पहले जैसा स्टेटस नहीं रहा था, मनमाफिक खर्च नहीं कर पा रहा था। एक बार ऐसा ही आक्षेप सुनकर लक्ष्मीनगर मेट्रो स्टेशन पर बैठा था। एक के बाद मेट्रो आ जा रहीं थीं। मेट्रो के दरवाजों पर नजरें गड़ाये सोच रहा था कि कहीं सच में गलत निर्णय तो नहीं ले लिया। तभी एक मेट्रो रुकी, दरवाजा खुला, प्रभु मुस्कुराते हुए बाहर आए-
-किस चिंता में डूबे हो पार्थ?
-कुछ नहीं प्रभु, जॉब छोड़ के कहीं गलत कदम तो नहीं उठा लिया, बस यही सोच रहा था।
-इसमें सोचने वाली क्या बात है पार्थ?
-क्या प्रभु? मेरे अपने मित्र सवाल करते हैं दूसरों से कि मैं कुछ करता क्यों नहीं।
-पार्थ, तुमसे इतनी बार मिला, सब बेकार कर दिया तुमने।
-अरे, ऐसा क्यों कह रहे हैं भगवन?
-देखो, जॉब तुम कर रहे थे न?
-हाँ।
-जॉब छोड़ी भी तुमने खुद?
-हाँ प्रभु।
-किसी के कहने से जॉब शुरू की थी क्या?
-नहीं, वो तो मेरा खुद का निर्णय था, लेकिन क्यों पुरानी बातें दोहरा रहे हैं, वर्तमान की समस्या सुलझाइए न।
-पार्थ, कई बार मुश्किल सवालों के जवाब प्रश्न की शुरुआत में ही मौजूद होते हैं। याद रखो अपने जीवन के मालिक स्वयं तुम हो, अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ तुमको है।
-विस्तार से समझाइये प्रभु।
-विलियम अर्नेस्ट हेनली की एक कविता है इंविक्टस, उसे पढ़ो, सब समझ जाओगे, गीता तो तुम पढ़ने से रहे।
-क्या प्रभु, आप भी।
-गूगल करो और पढ़ो, हम चले हौज खास, एक पार्टी है।
-सही है प्रभु, आप भी मजे लीजिये।

अगले पल प्रभु फिर मेट्रो में सवार हो चुके थे और मैं इंविक्टस सर्च कर रहा था। अंतिम दो लाइन्स पढ़ते ही सब क्लियर हो चुका था, सब बेहतर लग रहा था।

I am the master of my fate
I am the captain of my soul.

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