क्या हम खुद है ?

Posted by Jay Shukla
April 7, 2017

Self-Published

कल शाम राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के बाहर बैठी उन आँखों को फिर देखा जो रोज अपनी एक नयी कहानी कहती हैं। पर कल उन आँसूवो में उंगली पकड़े उस बच्ची के माँ का अस्तित्व बह रहा था। और उसकी बनवाती मुस्कराहट उस बच्ची से उसके ही पिता का सच छुपा रही थी जो किसी शराब के ठेके में बोतल से लिपटा अपनी मेहबूबा की तलाश कर रहा था।
राजीव चौक से बोटेनिक गार्डन के सफर में मैं सोचता रहा , की आजादी के बाद भी ये कैसी आजादी है ? जंहा पहचान खो चुकी एक पत्नि को माँ बनने के लिए खुद के ही अश्तित्व से लड़ना पड़ रहा है। सवालों के पिजड़े में मैं कैद हो ही रहा था की मेरे खेत में आयी वो गेंहू की बालियाँ याद आ गयी जो पुरवाई हवा चलने पे ऐसे लहराती है जैसे मनो किसान की मेहनत की नुमाईंदिगी कर रही हो। वंही बगल से बहती वो नहर जिसके पानी की दिशा मोड़ दी गयी थी पर बहाव इतना तेज था की मैं अंदर जाने की हिम्मत न कर सका। क्या यही आजादी है ?
हाल ही में हमारे उत्तर प्रदेश , पँजाब समेत पांच राज्यों के चुनाव सम्पन हुए है। ऐसा माना जाता है की उत्तर प्रदेश और पंजाब कृषि के केंद्र है पर क्या यंहा के किसानो के पास वो खेती करने की आजादी है ? उसे अपने एक ही ही बच्चे को कोटा या किसी अन्य बड़े एजुकेशन हब में पढ़ाने के लिए माँ मानने वाले अपने ही खेत को किसी से बेचना क्यों पड़ता है ?
चुनाव के दौरान सारी पार्टियां हर बार कुछ नया करने की कोशिश करती है इस बार भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला पर चुनाव के इस दंगल में राजनीती आजादी का ऐसा मोड़ लेगी मैंने कभी नहीं सोचा था।
विकास के नाम पे वोट मांगने वाली पार्टियां लुभाने में लगी थी कोई लैपटॉप बटाने की बात रहा था तो कोई कर्ज माफ़ करने की , और हाँ हर बार की तरह जातिगत मुद्दा चरम पे था।
मुझे आज भी याद है जब हमे स्कूल के अस्सेम्ब्ली में तिरंगे को देखते ही जोश और गर्व की ऐसी भावना बहती थी की स्कूल से देश के हर सीमा तक मेरा भारत महान लिख दू।, पर वो मैथ्स और फिजिक्स के किताबो से क्या थी आजादी ?
मेरे साथ के नवजनो का खून तो आज खौलता है पर तिरंगा देख के नहीं जिम देख के ,देश बनाने का जोश के बजाये खुद की बॉडी बनाने का। ..

अब तक ये बात समझ में आ चुकी थी की हमारे बुजर्गो ने देश तो आजाद करा दिया , हमारे कानून में हर सही काम करने की आजादी है।
बस हम सब ने खुद को ही पिछड़े में कैद कर के रखा है खुद को आजाद करने की जरुरत है ,
सोच को हवा के साथ उड़ने दो न
यार , बारिश में खुल के नाचो तो वो दूर जो खड़ा है वो भी डर रहा है घर की छत से देखो तो चाँद बुला रहा है!
मायूसी कब की ख़त्म हो गयी है , चारो तरफ बस खुद से इश्क़ हो रहा है।
जय शुक्ला (हिमांशु)

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