खेत खलिहान: सूखती ज़मीन और मरता किसान

Posted by Rana Ashish Singh in Environment, Hindi
April 28, 2017

देश के इतिहास में सबसे कष्टकारी सूखे में से एक के रूप में वर्गीकृत, 2015-16 में सूखे भारत में 11 राज्यों के 266 जिलों के 2.5 लाख से अधिक गांवों में 330 मिलियन से अधिक लोगों को प्रभावित किया है। इससे आम जनमानस के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है क्योंकि इससे पानी की उपलब्धता, कृषि, आजीविका, खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधन और सरकारी खजाने पर भारी भरकम बोझ पड़ गया है।

सूखे को मौसम संबंधी स्थिति के रूप में वर्गीकृत करने के बजाय, हमें सूखे के कुछ और पहलुओं को अधिक समग्र तरीके से देखने की ज़रूरत है, जैसा कि अमर्त्य सेन ने गरीबी और अकाल (1981) पर काम करते हुए फसल की विफलताओं और कटौती जैसे कारकों के बगल में तर्क दिया। खाद्य आयात आदि में सामाजिक व्यवस्था निर्धारित करती है कि समाज का भोजन कैसे वितरित किया जाता है। भारत में सूखे की स्थितियों पर चर्चा करते हुए इस महत्वपूर्ण कारण पर फ़ोकस करने और उसके निवारण के प्रयासों पर ध्यान देना ज़रूरी है।

भारत एक देश कृषि प्रधान देश है जिसका एक बड़ा हिस्सा सूखे, पानी की कमी व पलायन से जूझ रहा है। सूखे से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर लोगों के द्वारा कई प्रयोग किए जाते हैं। इन्हें बढ़ावा दिए जाने की ज़रूरत है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा फायदे जमीनी तौर पर लोगों को मिल सके। भारत में लगभग तीन चौथाई खेती बरसात के पानी के भरोसे है। जिस साल बरसात कम होती है किसान के जीवन का पहिया पटरी से उतर जाता है और यह पहिया एक बार जब पटरी से उतरा तो इसे पटरी पर आने में बरसों बरस लग जाते हैं।

मौसम विज्ञान के मुताबिक किसी क्षेत्र में बारिश (भारत में औसत बारिश की) यदि 19 फ़ीसदी हो तो इसे #अनावृष्टि कहते हैं, मगर जब बारिश इतनी कम हो कि औसत बारिश 19% से भी नीचे चली जाए तो इसको #सूखे के हालात कहते हैं। सूखे के कारण जमीन बंजर हो जाती है, कड़ी हो जाती है। खेती में सिंचाई की कमी से रोज़गार घटे हैं, रोजगार घटने से पलायन बढ़ता है और जानवरों के लिए चारे व पानी के भी संकट निकल कर सामने आते हैं।

भारत में बारिश की जो औसतन सीमा 110 सेंटीमीटर है जो दुनिया के बहुत सारे देशों से बहुत ज़्यादा है। यह बात और है कि भारत में बरसने वाले कुल पानी का महज 15% ही पानी संचित कर पाते हैं, बाकी पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में जाकर मिल जाता है जो बेकार हो जाता है। ज़रूरी है कि आम जनमानस को यह संदेश देने की सख्त ज़रूरत है कि बरसात का पानी पोखरों में या अन्य तरीकों से संचित करके किसी और रूप में इस्तेमाल किए जाने के कार्यों को बढ़ावा दिया जाए।

सरकार की तरफ से चल रही विभिन्न योजनाओं का ज़मीनी स्तर पर क्रियान्वयन बहुत जरुरी है। इनके सुचारु क्रियान्वयन से ही सूखे जैसी आपदाओं से निपटा जा सकता है। पक्के टैंको का निर्माण, पुराने तालाबों की मरम्मत और पानी के मौजूदा श्रोतों के बचाव के साथ अनाज की उपलब्धता और मनरेगा जैसी योजनाओं से मिलने वाला काम सूखा राहत के महत्वपूर्ण कदम हैं।

फोटो आभार: getty images  

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