दम तोड़ता लोकतंत्र और धूंध में राष्ट्रीय विकल्प

Posted by Jayvant Prakash
April 10, 2017

Self-Published

भारत के आधा से अधिक भू-भाग पर भाजपानीत केंद्र सरकार का प्रभुत्व है। पिछले चुनावों में मिली भारी जीत से भाजपा का मनोबल ऊँचा हुआ है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मिली विशेष जीत से भाजपा के समर्थक-कार्यकर्त्ता ख़ुशी से फूले नहीं समाते और सर्वत्र चर्चाओं में दम्भ भरते दिखते हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को राजनीती का अतुलनीय शिखर-पुरुष की संज्ञा दे दी गई है। शोहरत की नयी उपलब्धि से गदगद मोदी जी अब नवीन भारत बनाने की कल्पना करने लगे हैं।

नवीन भारत कैसा होगा? कब होगा? इन सवालों के जरिये सोंचने वालों की कल्पना में दो संभावनाएं- 1.) नोटबंदी से जिस तरह 6%कालाधन बैकों में आ गया है,उसी तरह शेष 94% कलाधन (जमीन, आभूषण, विदेशी बैंकों में जमा कलाधन, और N.P.A के खातों में जमाधन ) उपराया जायेगा और सचमुच हर खाता-धारी के खातों में 15 लाख रुपय आ जाने की घोषणा सत्य साबित होगी। प्रतिवर्ष 2 करोड़ बेरोजगारों को रोजगार मिल जाएगा। इसके अतिरिक्त प्रयास बढाकर हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर घर को बिजली एवं शौचालय, पिने का स्वच्छ पानी उपलब्ध हो जाएंगे। ‘ हम न खाएंगे न खाने देंगे ‘ के तर्ज पर सत्ता एवं सत्ता के अन्य प्रहरी यथा- न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा मिडिया भ्रष्टाचारमुक्त हो जाएंगे। किसान के सारे ऋण माफ़ हो जाएंगे। उनकी पैदावार की लागत खर्च का डेढा मूल्य उन्हें उपलब्ध करा दिया जाएगा। तमाम जल स्रोतों को स्वछ करते हुए शहरों एवं गावों को स्वच्छ कर ‘ स्वछ भारत अभियान ’ को सफल बना दिया जायेगा। ‘ मेक इन इंडिया ’ के जरिये स्वदेशी उत्पाद पर बल देकर निर्यात को बढ़ाया जाएगा तथा आयात घटा-घटा कर शून्य कर दिया जाएगा। देश के भीतरी और बाहरी खतरे से सजगता एवं सख्ती से निपटा जाएगा। देश के युवा वर्ग को R S S के घटकों से जोड़कर पार्टी को सशक्त एवं सुदृढ़ बनाया जाएगा। इस तरह पार्टी एवं देश दोनों के लिए ‘ अच्छे दिन ’ अवश्य आ जायेंगे। ऐसे ‘ अच्छे दिन ’ आने के लिए कम से कम 5 या 7 वर्ष तो चाहिए ही, बस धैर्य रखने की जरुरत है।

संभावना-
माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के स्थापित हो रहे सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व के साथ पलती उनके महत्वाकांक्षा में एकाधिकारवादी सत्ता हिटलर आदि की तरह के अंकुर का भय एवं शंका पैदा हो रही है। इस शंका की पृष्ठभूमि में इसके पिछले लगभग तीन वर्षों के शासन को मूल्याङ्कन किया जा सकता है।
मोदी जी की दूर-दर्शिता काबिल-ए-तारीफ़ है। भूमि आवंटन के जिस हथियार से माननीया ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में लंबे अरसे से राज कर रहे कम्युनिस्टों को किसान-विरोधी साबित कर धराशायी कर दिया, उसी हथियार का इस्तेमाल कर गुजरात में आपने 45 हजार एकड़ भूमि टाटा समूह को कारखाना खोलने के लिए देकर देश के बड़े उद्योगपतियों की नजर में पूंजीवाद के संरक्षक के रूप में सरवोत्तम व्यक्ति बने और उन बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने संघ प्रमुख को प्रभावित कर पार्लियामेंटरी चुनाव में आपको भाजपा की पार्टी के अंदर सर्वमान्य उम्मीदवार P.M पद के लिए घोसित करा दिया। संघ के इशारे पर चलने वाली भाजपा में किसी अन्य नेता को संघ के फैसले का प्रतिकार करने का साहस नहीं ही पाया और आप सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे। यही नहीं देश के बड़े उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों ने तन-मन-धन से आपकी पार्टी को अजेय बहुमत के साथ पार्लियामेंट भेज दिया। पूंजीपतिगण कांग्रेस पार्टी में अपने को असुरक्षित महसूस करते थे तथा नवोदित युवा नेता राहुल जी के संसद में कागज फाड़ आचरण से भयभीत थे,और घोटालों को उजागर होने से कांग्रेस के गिरते साख के कारण कांग्रेस के लिए उनके भयभीत नेताओं में जंबोलबंदी में अरुचि बढ़ गई और इस तरह जनता से इस पार्टी का लगाव क्षीण होता गया। तीसरा कोई विकल्प तो था नहीं।
सत्ता की महक आते ही अपनी पार्टी के बड़े अनुभवी एवं भाजपा को मजबूत आधार देने वाले कद्दावर नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी एवं श्री मुरली मनोहर जोशी जैसे वयक्तित्व को एक तरह से राजनीती के सान्यास में भेजकर उन्हें मोदीजी ने किनारे लगा दिया ताकि उनके वयक्तित्व पर हावी होने वाला कोई शख्शियत न रहे।

सत्ता में आते ही माननीय मोदी जी ने देश में कई राज्यपालों की जगह संघ समर्थित नेताओं को नियुक्त किया ताकि राज्यों पर केंद्र का मजबूत नियंत्रण रहे। आज इसी का प्रतिफल उनको गोवा तथा मणिपुर मिला। वर्तमान 2017 के विधानसभा चुनावों में दो राज्यों गोवा और मणिपुर में राज्यपालों ने बहुमत वाली पार्टी कांग्रेस को पहले सरकार बनाने का निमंत्रण न देकर भाजपा को अल्पमत संख्या रहते हुए भी पहले निमंत्रण देकर हार्स ट्रेडिंग का अवसर प्रदान किया। संविधान के जानकार की नजर में संवैधानिक लोकतंत्र पर यह चोट है।
इसी कड़ी में बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व जाति संतुलन बैठाते हुए अति प्रतिक्रियावादी हिंदुत्व एवं संघीय विचारों के पुरोधा योगी आदित्य नाथ को मुख्यमंत्री का बागडोर देकर राममंदिर के निर्माण का आधार मजबूत किया है। यहाँ ध्यातव्य है कि 403 विधानसभा सदस्य वाले इस प्रदेश में मुस्लिम समुदाय से एक भी भाजपा उम्मीदवार का न होना केंद्र की हिंदूवादी छवि को उजागर करने का प्रयास किया गया है। यहाँ भी देश के संविधान की आत्मा सभी धर्मों की एकता विशेषकर हिन्दू-मुस्लिम एकता को भारी चोट पहुंचाई गई है। दुनिया की वर्तमान परिस्तिथि में भारत के धर्मनिरपेक्ष राज बने रहने पर ठेस पहुंची है और एकता की भावना आहत हुई है। दलित समुदाय भी भाजपा के इस एकाधिकार वाले चरित्र से खिन्न हैं और इस तरह राष्ट्रिय अखंडता प्रश्न के घेरे में आ गया है। इन तथ्यों से हिन्दू प्रभुत्व वाले हिन्दुवादी नवीन भारत निर्माण करने वाली प्रधानमंत्री जी की कल्पना को बल मिलता है।
मोदी जी का नारा है- ‘ कांग्रेस मुक्त भारत को नवीन काया देना ’। अर्थात भाजपा के विरुद्ध राष्ट्रिय विकल्प को ध्वस्त करना। इससे पूरे भारत में प्रबल हिंदुत्व धारा के बहाव में कोई बाधा न रहे और धर्मनिरपेक्षता वाली विकल्प समाप्त हो जाय। विविध धर्म और विविध मान्यता वाले देश भारत में क्या एकल धार्मिक हवा बह जायेगी? सभी धर्मों के खान-पान, रहन-सहन, रीती-रिवाज अलग अलग हैं। फिर भी अख़लाक़ के घर में रखे मांस को गो-मांस करार देकर जबरन उसकी हत्या कर दी जाती है। क्या यह राजधर्म एवं संविधान के अनुकूल है? हिंदुत्व की असहिष्णुता पर मुस्लिम समाज क्या भारत में शांति से रह पाएगा? लगभग 18 करोड़ जनसँख्या वाले मुस्लिमों को धरती के किस कोने में बसने को मजबूर करेंगे? क्या इससे देश की अखंडता पर आंच नहीं आएगी? इलास्टिक लिमिट से ज्यादा दबाव होने पर बैलून भी फूट जाता है। धार्मिक नेता स्वामी विवेकानंद जी का कथन क्या भुला दिया जाने वाला है? जिसमे उनका बल था- “ हमें हिन्दू होने का गर्व है, क्योंकि हम सभी धर्मों को बराबर सम्मान देते हैं ”। क्या वह हिंदुत्व गलत था? नवीन भारत के निर्माण में क्या एकल हिंदुत्ववादी विचार पर स्थिर रहना अवैज्ञानिक नहीं होगा? विचार स्वतांत्र्य से सभी सामाजिक व्यवस्था की अवधारणा प्रबल होती है। स्पष्टतः सामाजिक ऐतिहासिकता के विकासवाद के सिद्धांत को रोका नहीं जा सकता।
आज मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर या अन्य किसी धार्मिक स्थानों में साम्प्रदायिकता, अन्धविश्वाश और एक खास किस्म के समझ निर्माण के विद्वेषात्मक विचार पैदा किये जाते हैं। अगर वैसे किसी एकल विचार पर स्कूल, विश्वविद्यालय चलाये गए तो रोहित वेमुला जैसे छात्र को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ेगा। किसी कन्हैया, गुरमेहर कौर, रजनी, सुमधुर आवाज वाली असामी लड़की नाहिद आफरीन आदि को समाजद्रोह, देशद्रोह का दंश झेलते-झेलते जीवन से हाथ धोना ही पड़ेगा। इस सन्दर्भ में विचारणीय है कि क्या जे.एन.यू. जैसे विचार स्वातंत्र्य वाली विश्वस्तर पर लब्ध प्रतिष्ठित संस्था पर विचार पाबन्दी लगाते-लगाते उसे नष्ट कर दिया जाय? क्या नवीन भारत निर्माण की यही प्रक्रिया होगी? क्या राष्ट्रपिता महात्मागांधी को नीचा दिखाते हुए उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करना उचित होगा। ऐसे में एकाधिकार राष्ट्रवाद का एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी विकल्प तैयार होना अत्यावश्यक है, पर यह अभी धुंध में घिरा दीखता है। वर्तमान में राष्ट्रिय विकल्प के तौर पर तीन केंद्र हैं। पहला केंद्र है-कांग्रेस और तीसरा केंद्र है वामपंथी पार्टियां। इन तीनो की दशा-दिशा पर स्थिर चर्चा समीचीन है।
कांग्रेस पार्टी एक ही नेहरू परिवार केइ इर्द गिर्द जीवित है, परंतु जीवित होते हुए भी वह अपना प्रभाव दिनों दिन खोती जा रही है। इससे जुड़े नेतागण में से कइयों पर घोटाले का आरोप मढ़ता गया और कई ऐशो आराम में चिपके नेता जनता से दूर होते चले गए, आंदोलन विमुख हो गए, कई राज्यों में अलोकप्रिय और दिशा विहीन शासन देने के कारण आलोचना के शिकार हो गए और इसलिए दिनों-दिन पराजय का मुख देखते हुए हाशिये पर चले गए हैं। निकट भविष्य में इनके राष्ट्रिय पुनरोदय की कल्पना पत्थर पर दूब जमाने जैसा है।
क्षेत्रीय पार्टियों में बी.एस.पी. , एस.पी. , अकाली दल, शिवशेन, अन्ना द्रमुक, गोमांतक, तृणमूल कांग्रेस, राजद, राजग, मुस्लिम लीग आदि अनेक पार्टियां हैं और नित नए-नए घटक बनते जा रहे हैं। ये सारी पार्टियां जाति-विशेष और धर्म-विशेष पर आधारित हैं। जिनमे से कुछ पूर्व तो कुछ वर्तमान के प्रभावशाली नेताओं के नाम पर जीवित हैं। इनमे से कुछ परिवारवादी भी गिने जाते हैं जैसे राम विलास जी, मुलायम जी, लालू जी आदि। इन भानुमति के पिटारों में राष्ट्रिय एकता की कल्पना दिवा स्वप्न है। इनमे एकता के नेता के लिए किन्हें चुना जाये? मायावती बहन जी पर दलित छाप है, और हाल ही में उनका दलित मुस्लिम एकता का प्रयास विफल हो गया। मुलायम जी अपनी कुनबे में ही पछाड़ खा कर छविहीन हो गए हैं। ममता जी की तृणमूल पश्चिम बंगाल तक ही सिमित है। उनका स्नेह अगर नितीश भैया के लिए है तो उनके भैया भ्रस्ट नेताओं एवं अफसरों के दबाव में रहते हुए कुर्सी मोह के कारण दिन-व-दिन छविहीन हो रहे हैं। ऐसे में सर्वमान्य राष्ट्रीय नेतृत्व का विकल्प कौन दे सकता है? अब कोई नया जय प्रकाश नारायण पैदा नहीं हुआ है जो सभी कुनबे को एक सूत्र में बांध कर एक विकल्प की तैयारी कर सके।
विकल्प का तीसरा केंद्र वामपंथ है जो सशक्त तो है जो एक ही लाल झंडा हसुआ-हथौड़ा धारण किया करते हैं, परंतु सी.पी.आई. से टूटकर सी.पी.आई.एम. बना लिए। फिर अन्य घटक सी.पी.आई.एम.एल. , एस.यू.सी.आई. बने, फॉरवार्ड ब्लॉक बने, आर.एस.पी.आई.एम.एल. बने और उससे तो कम्युनिस्ट माओवादी भी बन गए हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि ये पार्टियां मेहनतकश एवं उत्पादक कामगारों के सगे भाई जैसे लगते हैं; उनके दुःख दर्द को मिटाने के लिए उनके अधिकार की रक्षा के लिए आंदोलन करते हैं, संघर्ष करते हैं। कई यातनाएं भी सहते रहते हैं पर अपने अस्तित्व को अलग-अलग रखने में कम स्वाभिमानी नहीं हैं। इनमे से प्रत्येक एक-दूसरे पर उंगली उठाने से नही चूकते और अपने को श्रेष्ठतर सिद्ध करने का अदूरदर्शी प्रयास करते हैं। कहने से तो ये सब-के-सब इंटरनेशनल है पर वास्तव में नेशनल प्रभाव से वंचित हैं और क्षेत्रीय बनकर रह गए हैं। निर्विवाद रूप से अन्य बुर्जुआ एवं पूंजीवादी पार्टियों से भिन्न चरित्र वाले हैं, इनमे मानवता एवं राष्ट्रभक्ति है, पर दुर्भाग्य है कि ये बंटे हैं। अगर आज भी ये सब एकजुट हो जाएं और सह-निर्णय एकजुट संघर्स करें तो धीरे धीरे जनता का विश्वास इनके प्रति पैदा होगा और ये स्वछ राष्ट्रीय विकल्प दे सकेंगे।
दुर्भाग्यवाश ईनमे से कोई लेनिन, माओत्से तुंग, हो-ची-मिन्ह कोई फिदेल कास्त्रो या ह्यूगो शावेज पैदा नहीं हो रहा है जो इनमे एकता स्थापित कर सके और इक्कीसवीं सदी का लाल इतिहास बना सके।
मुझे विश्वास है कि वामपंथी एकता से भारत का राष्ट्रीय विकल्प बन जाता तो धार्मिक कट्टरपंथ पैदा न होता, शोषणमुक्त विकासवाद वैज्ञानिक समाज बनता, देश की अखंडता बनी रहती, मैत्रीपूर्ण विदेश नीति फलीभूत होती और धर्म, शोषण आदि की जड़ों में पलने वाला आतंकवाद का खौफ सदा के लिए मिट जाता।

वामपंथी विकल्प हो सकता है, जब पार्टी पदों पर चिपके अपनी जवानी की मात्र एक दो घटनाओं का लगातार हवाला देते हुए पार्टी के बड़े पदों पर चिपके वर्तमान असमर्थ सीनियरों को ठेलकर युवावर्ग आगे आवे। वैसे युवा वर्ग जो धर्म, जाति, निहित स्वार्थ, कुत्सित भावनाओं से दूर राष्ट्रहित में मानवता के उच्च मूल्यों के लिए कुर्बानी देने को तैयार हो।
परिस्थितियां अनुकूल होती जा रही है क्योंकि आज की सत्ता में अफसर और नेताओं में अधिकांश भ्रष्ट हैं। भाई भतीजा करने वाले है, रिश्वतखोर हैं, ऐसे में योग्य मेधावी युवा आर्थिक पिछड़ेपण के कारण सरकारी नौकरी से वंचित किये जा रहे हैं तथा बंद होते उद्योग धंधों के कारण रोजगार के अवसर से पिछड़ते जा रहे हैं। हत्या, अपराध, लूट को संरक्षण देने वाली सत्ता को उखाड़ फेंकने में क्या युवा वर्ग का नैतिक कर्तव्य नहीं है? क्या वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहकर निराशा की बदहाल जिंदगी जीते रहेंगे? ऐसे में स्वामी विवेकानंद की वाणी स्मरणीय है-“जागो, उठो और तब तक नहीं रुको जबतक लक्ष्य नहीं पा लो”। मुझे अटूट विश्वास है कि एक-न-एक दिन युवावर्ग धूँध फाड़कर नया सुखद राष्ट्रीय विकल्प अवश्य लावेंगे।

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