देवी या अबला

Posted by Rêęmå Ámbâñį
April 5, 2017

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कई दिनों बाद फ़्रेंड से मुलाक़ात हुईं बातों बातों में उसकी उदासी कीं वजह पूछने पर उसने बोला की कल ही मेरे पापा ने मेरे और माँ से मारपीट की।उसकी सच्चाई जानने के बाद लगता है कि घरेलू हिंसा की जड़े हमारे समाज में गहराई तक जम गई है।प्रायः देखा जा रहा है कि एसे मामले दिनो- दिन बढ़ते जाँ रहे है।

हमारे पुरुषप्रधान समाज में औरतों पर हाथ उठाना जेसे मर्दानगी की बात मानी जाती है और औरतों की एसे मामलों में चुप करा दिया जाता है इससे एसे गुनाहों को ज़्यादा समर्थन मिलता है।
एसी बाते मुझे हमारे समाजव्यवस्था के बुनियादी ढाँचे पर सोचने को मजबूर करती है।जैसे की हम लड़कियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि लड़की हो तो सहन करना सिख लो।जब भी कोई लड़की बचपन में ही कोई कृत्य के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाती है तो उसे ‘ तुम लड़की हों ‘ का बहाना बनाकर उसकी आवाज़ को दबा दिया जाता हैं। और बात शादी के बाद की हो तो जेसे हमारे समाज में औरतों पर हाथ उठाने का अधिकार शादी के साथ ही मिल जाता है। एसे हालतों में पहली बार ही कोई हिम्मत बनाकर ही शिकायत कर दे तो लड़की के नाम पर उसे चुप रहने की भयंकर सलाह देकर उसकी हिम्मत को ही तोड़ दिया जाता है और इसी मर्दानगी दिखाने वालों को  ज़्यादा हिम्मत को सहारा मील जाता हैं। और बात हाथ उठाने से मारपीट तक पहुँच जाती है तब औरतें समाज में बदनामी के डर से या तो अपने बच्चों के लिए चुप रहती हैं तब इसी बात का फ़ायदा उठाकर फिर उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है या फिर हत्या ।
प्रकृति ने पुरुष और स्त्री की संरचनाएँ की है उसमें औरतें नाज़ुक और कोमल रही हैं। कई बार एसी घरेलू मारपीट या हिंसा के शिकार बच्चें और बुज़ुर्ग औरतें भी बनती हैं। तब ये सोचना महत्वपूर्ण रहता है कि लड़कियों के नाम पर सहन करने की सलाह देना सही है या अपने लड़कों को ही बचपन से ही औरतों की इज़्ज़त करना सिखना। सिर्फ़ हम लड़कियों को सलाह देने की जगह लड़कों को सम्मान करना क्यूँ नई सिखा सकते !
हमारे देश में जहाँ एक ओर प्रतिमा में देवी बनाकर पूजा जाता है वहीं दूसरी ओर हत्या , मारपीट , आत्महत्या, दहेज और आगज़नी जेसे 27.5 मिलियन क़िस्से ये सोचने पर मजबूर करते है कि क़ानूनव्यवस्था तो बाद में अपना काम कर सकती है पहले हमारा समाज औरतों के सम्मान की किस नींव पर टिका हैं।

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