धर्म अफीम है क्या..?

Posted by Jayvant Prakash
April 7, 2017

Self-Published

हमारे जीवन में धर्म की जितनी व्यापक और निर्णायक भूमिका है, उसे देखते हुए यह सवाल उठना वाजिब है कि धर्म, धर्म के लिए या धर्म आदमी के लिए. जब हम वे कपड़े नहीं पहनते जो हजार साल पहले पहने जाते थे, जब हम वह खाना नहीं खाते जो हमारे पूर्वज खाया करते थे, जब हर पंद्रह-बीस साल बाद भाषा तक बदल जाती है, तब इस जिद का क्या अर्थ हो सकता है कि धर्म के मामले में हम वहीं चिपके रहेंगे, जहां कई हजार साल पहले हमारे पूर्वज अपने अज्ञान और पूर्वग्रहों के साथ खड़े थे. बेशक धर्म के क्षेत्र में भी परिवर्तन होते रहे हैं, कई बार क्रांतियां तक हुई हैं. इससे कुछ चीजें बदलती जरूर हैं, लेकिन उसका मूल आधार बना रहता है कि कोई बात इसलिए सही नहीं है क्योंकि वह सही है, बल्कि इसलिए सही है कि किसी संत, गुरु , आचार्य ने ऐसा कहा है या अमुक पुस्तक में ऐसा लिखा हुआ है.

जब यह बताया जाता है कि धर्म ने मानव समाज को क्या-क्या दिया है, तो वह पूरा गलत नहीं होता. मनुष्य के विकास में धर्म की भूमिका अकाट्य है, लेकिन इससे ज्यादा बुद्धिमानी की बात यह कल्पना करने की है कि धर्म न होता और आदमी ने बुद्धि के रास्ते पर चलते हुए समाज का निर्माण किया होता, तब क्या होता? क्या वह आज की अपेक्षा ज्यादा न्यायपूर्ण और सुखी समाज न होता, जिसमें लोगों की जिंदगी उनके अपने हाथ में होती और वे दुख से बचने और सुखी होने के लिए वैज्ञानिक तौर पर सोचते और एक-दूसरे की बातों को काटते नहीं, बल्कि सुधारते?

परंपरा की सबसे शक्तिशाली, परंतु सबसे ज्यादा बोझिल विरासत धर्म ही है. जन्मते ही हमें इस जेल में बंदी बना दिया जाता है ताकि हम और विषयों में तर्क-वितर्क करें या न करें, पर धर्म पर विचार-पुनर्विचार न करें. स्पष्टत: यह जीने की एक खास शैली है, जिसके केंद्र में तर्क नहीं, अंधविश्वास है. ठीक ही कहा गया है कि धर्म ने आदमी को नहीं बनाया है, आदमी ने धर्म को बनाया है. यहां धर्म की जगह ईश्वर रख दें, तब बात और स्पष्ट हो जाएगी.

धर्म खतरनाक इसीलिए है क्योंकि यह समाज में अपनी सत्ता बना लेता है और अपनी सुरक्षा के लिए समाज की मानसिक प्रगति को रोकने का प्रयास करता  है. यह आश्चर्य की बात नहीं है कि धर्मसत्ता ने हमेशा राजसत्ता की अधीनता स्वीकार की है और धर्मसत्ता को न्याय तथा विषमता के विरुद्ध आवाज उठाने वाली ताकत के रूप में नहीं देखा जाता है. पहले वह सामंतवाद के साथ थी, अब पूंजीवाद के साथ उसका गठबंधन है. जब भारत में ब्रिटिश सत्ता कायम हो गई, तब ईसाई पादरी साम्राज्यवादियों को यह समझाने नहीं आए कि तुम जो कर रहे हो वह ईसा मसीह की सीख के विपरीत है, बल्कि वे खुद ही भारतवासियों को ईसाई बनाने लगे. धर्मसत्ता में बदल कर धर्म में शेर की ताकत आ जाती है और आदमी मेमना हो जाता है.

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.