नए जमाने के युवा और पत्रकार

Posted by Vikram Singh
April 19, 2017

Self-Published

कुछ दिन पहले एक युवा पत्रकार से मुलाकात हो गयी। पत्रकार महोदय ने बताया कि उन्होंने किसी संस्थान से पत्रकारिता का कोर्स किया है। चूंकि थोड़ी सी पत्रकारिता हमनें भी सीखी थी तो बातचीत कुछ यूं बड़ी कि उन्होंने पत्रकारिता के बारे में बहुत कुछ बता दिया । उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि आज की पत्रकारिता बड़ी संघर्ष पूर्ण हैं । पत्रकारिता को ऐसे ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं कहा जाता । आज की पत्रकारिता से सरकारों को पलटा जा सकता है। पत्रकारिता के माध्यम से समाज को एक नई दिशा दी जा सकती है।पहले भी पत्रकारों ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से लोकतंत्र की रक्षा की है। पत्रकारिता का उद्देश्य रुपये कमाना नहीं होता जो पत्रकार रुपये पैसे के लालच में पत्रकारिता में हेर फेर करते हैं और लोगों को गुमराह करतें हैं वे पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं।

मैं उनकी बातों से काफी प्रभावित हुआ। मैंने उनमें एक आदर्श पत्रकार की झलक देखी। और महसूस किया पत्रकार साहब आगे जरूर देश एवं समाज के बदलाव के लिए कुछ करेंगे।
उन्होंने बताया कि जल्द ही वे एक ऑनलाइन वेब पोर्टल में अपनी पत्रकारिता शुरू करने वाले हैं।मैंने भी उन्हें बधाई दी।
कुछ दिन बाद जब मैंने वह ऑनलाइन वेब पोर्टल खोल कर देखा तो मैं हैरान रह गया । उस पोर्टल पर ऐसी अश्लील खबरों की भरमार थी कि उनकी हेडिंग पढ़ने का भी मन नहीं कर रहा था । और तो और उन खबरों को खुद उन पत्रकार साहब ने लिखा था जो अपनी पत्रकारिता से देश दुनिया बदलने की बात कह रहे थे। मैंने उन पत्रकार महोदय को मैसेज के द्वारा पूछा कि सर आप तो अपनी पत्रकारिता से देश दुनिया बदलने की बात कर रहे थे और आज आप यह सब अश्लील खबरें लिख रहे हैं।
पत्रकार साहब ने बताया कि आज के अधिकतर युवा देश दुनिया की खबरों में रूचि नहीं दिखाते। वो इस तरह की अश्लील खबरों को ज्यादा पढ़ना पसंद करते हैं। जिसकी बजह से हमारी देश दुनिया और सामाजिक खबरों से ज्यादा इन अश्लील खबरों को ज्यादा पढ़ा जाता है जिसका हमें उस खबर में विज्ञापन के माध्यम से आर्थिक लाभ अधिक होता है।
फिर मैंने पूछा आपके वो सिद्धांत कहां गए जब आप कहते थे कि वो पत्रकार जो रुपये पैसों के लिए लोगों को गुमराह करता है वो पत्रकारिता के नाम पर कलंक है।
तो वे बोले.. “बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया” आज के जमाने अपना खर्चा चलना बड़ा मुश्किल है। जिंदा रहने के लिए रुपये की आवश्यकता है और “रुपये” के लिए ये सब करने की।
मुझे उन साहब की बात सुनकर एक फ़िल्म का डायलॉग याद आ गया
“कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बढ़ा कोई धर्म नहीं होता”
वैसे भी आज के जमाने में पत्रकारिता ने भी धंधे का रूप ले लिया है।
धन्य हैं आज के युवा , धन्य हैं आज के नए पत्रकार और धन्य है उनका धंधा।

—-विक्रम

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