पिछड़ती दिल्ली

Posted by Sunny Raj Vats
April 8, 2017

Self-Published

ताज़्जुब की बात है , जिस दिल्ली की सैंकड़ो-हजारों वर्षों से तोड़ा जा रहा है, बसाया जा रहा है, जो दिल्ली बड़े बड़े रजवाड़ो और सल्तनतों की शान रही है, जिस दिल्ली में आज़ादी की लड़ाई ने सबसे ज्यादा आग पकड़ी और जहाँ सबसे ज़्यादा देश के संविधान की समीक्षा हुई, वो दिल्ली आज सबसे आधिक उपेक्षित है। जी हाँ! सही पढ़ा आपने, “सबसे अधिक”।

एक समय था जब दिल्ली की Elite Class बहुत तंग रहती थी, सिर्फ इसलिए कि हमारे मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय समाज के लोग पिछड़ रहे हैं, पर अब वो भी दक्षिण दिल्ली में बैठकर हार मान चुके हैं और अब बस इतना ही कहते हैं, “we really can’t bring a revolution, it’s over”. बाकी कुछ गिने चुने फिर भी गाड़ियाँ घिस रहे हैं।

बहरहाल, जो क़स्बे पूर्वी दिल्ली और उत्तर-पश्चिमी दिल्ली की पहचान थे वो अब प्रदूषण और अपराध के चलते अंधकार की दलदल में धँसते जा रहे हैं। आउटर एरिया, जो कि अधिकतर रेलवे स्टेशनों के इर्द-गिर्द हैं, वह गंदगी से भरे नालो और कचरो के ढेर से अटे पड़े हैं। इस बात की पुष्टि पिछले चालीस साल के इतिहास का ब्यौरा मांगते हुए मैंने अपने पिताजी से भी की। लोग बीमारियों से धीरे-धीरे सड़कर मर रहे हैं और बाकी चंद बचे हुए नशे में धुत्त रहते हैं, फिर उनमें से कुछ लोग किसी महिला का बलात्कार कर देते हैं और उसपर सब राजनेतिक पार्टीयाँ अपनी-अपनी सियासत कर लेती हैं। सवाल यह है कि अगर ये ढांचा ही सुधर जाए तो हमारी बहन बेटियाँ खुद-ब-खुद सुरक्षित हो जाएंगी। पर करे कौन?

गौर की जाए तो दिल्ली से बेहतर तो देशभर के अधिकतर शहर हैं जिनमें से 4-5 को इंगित भी किया जा सकता है। खैर मुद्दा ये है कि सरकारें कर क्या रहीं हैं, देश की राजधानी की स्तर की न सही मगर एक पिछड़े कस्बे के स्तर से तो ऊपर हो यह दिल्ली, दिल वालों की दिल्ली, मंत्री व् सांसदों की दिल्ली, हम सब की दिल्ली।

पर करे कौन? सिर्फ लोग, या सरकार? या फिर दोनों मिल-जुलकर?

जवाबो का सिलसिला बना रहे।

Sunny Raj Vats

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