बदलती शिक्षा व्यवस्था

Posted by adity agrawal
April 4, 2017

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भारत की शिक्षा व्यवस्था तकरीबन 5000 बी सी पुरानी है। या हम ये कहें कि ये भगवन श्री राम के जन्म के पहले से ही चली आ रही है।

उस समय छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग गुरुकुल हुआ करते थे। छात्राओं  को शिक्षा ऋषिकस और ब्रह्मवादिनीस देती थीं, और छात्र ऋषियों से शिक्षा प्राप्त करते थे।

उस समय वेद को श्रुति भी बोला जाता था। और हमारे हिन्दू शास्त्र की सबसे अच्छी बात तो ये है कि इसे आज तक संभल कर रखा गया है वो भी उसमें बिना किसी बदलाव के।

हमारी गुरुकुल शिक्षा इतनी धनी थी कि उसका आज तक कोई भी शिक्षा मुख\अबला नहीं कर पायी। गुरुकुल में हर विषय को पढ़ाया जाता था अब चाहें वह भौतिक विज्ञानं हो या खगोल शाश्त्र। और गुरुकुल में कभी किसी जाती या धर्म के लोगों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाता था। सबको सामान शिक्षा दी जाती थी। पहले के छात्र किताबी कीड़े नहीं होते थे उन्हें भौतिक शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक शिक्षा का भी प्रचुर ज्ञान था।

भारत अपनी शिक्षा व्यवस्था की वजह से धनी माना जाता था, और ऐसी शिक्षा व्यवस्था जिसकी नींव को हिलाने के लिए लोगों ने हर संभव प्रयास किये पर हिला नहीं पाए। ऐसी शिक्षा व्यवस्था देखकर गवर्नर जनरल लार्ड मैकॉले ने 1835 में ब्रिटिश संसद में कहा कि “मैंने भारत की लंबाई और चौड़ाई तक का सफर तय किया लेकिन मैंने वहां एक भी व्यक्ति ऐसा  नहीं देखा जो भिखारी हो या चोर हो। मैंने इस देश में ऐसा धन देखा है, ऐसी उच्च शिक्षा देखी है और लोगों में ऐसी बुद्धि का विस्तार देखा है कि हम चाहकर भी इस देश पर कभी विजय प्राप्त नहीं कर पाएंगे जब तक कि हम उसकी पीठ पर वार नहीं करते जो कि उसकी सांस्कृतिक विरासत है। हमें उनकी पुरानी और मजबूत शिक्षा प्रणाली तोड़नी होगी और अंग्रेजी का प्रचार प्रसार करना होगा तभी हम उस देश पर राज कर पीएंगे।”

24 जनवरी 1857 को  कलकत्ता विश्विद्यालय जो कि कोलकाता में ब्रिटिशर्स के द्वारा खोला गया  यह एशिया का पहला विश्वविद्यालय था जो कि आधुनिक शिक्षा पर आधारित था। उसके बाद बॉम्बे विश्विद्यलर और मद्रास विश्वद्यालयों का गठन हुआ।

ऐसे करते करते  पाश्चात्य संस्कृति हमारी सांस्क्रतिक पर इस धावा बोल बैठी है कि आज के युवा उसी की तरफ भाग रहे हैं आज मैकॉले के शब्द सच नज़र आने लगे हैं परंतु अभी भी थोड़ी गुंजाइश है वो चाहकर भी हमारी संस्कृति को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाए हैं तभी तो आज भी कहीं न कहीं गुरुकुल शेष हैं परंतु पहले जितने नहीं रहे। पहले प्रति 400 व्यक्तियों पर एक गुरुकुल हुआ करता था जिसकी आज संख्या घाट कर प्रति 5000 व्यक्तियों पर 1 गुरुकुल हो गया है।

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