बेग़मजान

Posted by Nikhil Chandra
April 19, 2017

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#बेग़मजान
रंडी शब्द, वर्तमान दिखावटी सभ्य समाज के चरित्र पे एक काला धब्बा जैसा प्रतीत होता हैं। इसलिए जहाँ भारतीय पुरुष प्रधान समाज मे स्त्री को वेद्वो में पूजा जाता है, वहाँ हम रंडी को इज्जत से संबोधित करते हुए ‘वैश्या’ पुकारते हैं। जैसे हमने बहुत बड़ा अहसान किया है। आखिर इतनी इज्जत दी है हमने रंडी से वैश्या जैसे कर्णप्रिय नाम देकर।
लेकिन रंडी कहें या वैश्या ये शब्द हमेशा आंखों के सामने दुःख, दुर्दशा, अत्याचार का प्रतिबिम्ब ही दिखाता है जिसे विलासिता ,उपभोग के लिए इस्तेमाल करते है और फिर मांस का बेकार लोथड़ा समझ फेंक देता है। हम रंडी कह कर गाली तो देते है लेकिन उसी रंडी के साथ सोने वाले को इज्जत से स्वीकारते है। हमारे सभ्य समाज का न्याय ही पक्षपातपूर्ण है।
हर पल उनके सपने को थरौंदता समाज उस वैश्या के लिए बस कांटो का रास्ता छोड़ता है और कदम कदम पर तानों के पत्थर से वार भी करता रहता है लेकिन फिर भी जिंदगी जीने का एक सबक सीखा जाती है वो वैश्या।
आखिर उसे इस दहलीज पे धकेलने वाले भी हम है और इस नाम से नवाजने वाले भी हम, लेकिन दुनिया की गिद्ध भरी नजरों में सबसे ज्यादा गिरी हुई वो वैश्या ही है जिसे हम इस्तेमाल करना तो जानते है,लेकिन अपनाना नही।

“वैश्याओं के खरीददार होते है, शौहर नहीं
वैश्याओं के शौहर न हों, लेकिन बेटियां होती हैं”
अगर आपके दिल और दिमाग की नजर पारखी है तो इन शब्दों में वैश्याओं की सारी असल दुनिया दिख जाएगी।

हिन्दू, मुस्लिम या अछूत अगर वो स्त्री है तो “बली का बकरा” वही होगी, उसकी अहमियत इंसान से ज्यादा उपभोग की वस्तु तक ही सीमित रह जाती है।

विभाजन और स्त्री के विषय पे बनी “बेग़मजान” अंदर से झकझोड़ देने वाली फिल्म है। बहुत अच्छी तो नहीं लेकिन सभी पहलुयों को छूती ये फ़िल्म आपके मन में कौतूहल जरूर पैदा कर देगी। हिंदू मुस्लिम के बीच जो अंग्रेज़ो ने दरारें बनाई गई थी वो आज के समय में खाई बनती जा रही है।
ऐसा लगता है जैसे आजादी के इतने सालों बाद भी स्त्री बदहवास हालत में खड़ी है। जैसे कह रही हो-

‘ज़िन्दगी से बड़ी कोई सज़ा ही नही
और जुर्म क्या है पता ही नही
इतने हिस्सों में बंट गयी हूँ मैं
कि मेरे हिस्से कुछ बचा ही नही’

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